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Tuesday, December 23, 2014

पुरुष मन और ये मछलियाँ


ओये ! सुनो !
पता है, कल की रात हुआ क्या ?
था, सोया
तभी कान के पोरों पर
लिपिस्टिक का दाग बन गया !
उठा चिंहुक कर !!
इस्स! चारों ओर से,
था घिरा, तैर रही थी मछलियाँ !!

तैरते हुए सो रहा था मैं
ठंडी जलधारा में !
चारों और घूम रही थी
मछलियाँ !
हाँ, सिर्फ मछलियाँ
फैशनपरस्त मछलियाँ !!

सबने लगा रखी थी लिपिस्टिक
गलफड़े थे हलके रंगीन
कुछ ने पहने थे जींस
जो थे घिसे हुए, स्टाइल वाले जींस
तो कुछ थी, अधोवस्त्र में, ऐसे कहो स्विमिंग सूट में
कुछ थीं, बुर्के और साड़ियों में भी !!

समझ नहीं आ रहा था
मैं था, उनके उदरपूर्ति का साधन
या वो थीं
मेरे मनोरंजन का साथन !!
तैरती हुई मछलियाँ
कर रही थी कैट-वाक
कर रही थी अठखेलियाँ !!

पानी के अन्दर भी
खुल चुकी थी मेरी सपनीली आँखे
मेरा पुरुष मन
हो रहा था अचंभित और उत्तेजित !
मुझे दिखने लगी थी
मसालेदार तली हुई मछलियाँ
मेरी ही नजरें तलने लगी थी उनको !!

नजर के अलाव ने
आखिर पका ही दिया था उनको
अठखेलियाँ करती मछलियाँ
कब परिवर्तित हो कर दिखने लगी
प्लेट में सजी मछलियाँ
ये पता न चला ....... !!
और भोर हो गया !!
_____________
ये पुरुष मन और ये मछलियाँ !!


Tuesday, December 16, 2014

सुन रहे हो पकिस्तान !


वर्षों का अंतहीन दर्द झेला
माँ रूपी भारत वर्ष ने
और तुम कपूत 'पाकिस्तान'
जन्मे थे न 1947 में ...

जन्म के समय ही दी थी  तूने
असहनीय दर्द और पीड़ा
जिसको ता-जिंदगी झेल रही
तेरी माँ !! ये भारत माता !!

तुम्हारा जन्म नहीं था
एक सामान्य प्रक्रिया
सिजेरियन सेक्शन ही कहेंगे न
इस नए देश के बनने की प्रक्रिया को

सर्जरी से बनी
एक माँ की नाभि के पास
उस समय बनी रेडक्लिफ लाइन
आज तक दे रही दर्द व दंश

और तुम पाकिस्तान
आवारा, बदतमीज बच्चे की तरह
माँ के दर्द पर खिलखिलाते हो
तोड़ते हो हर पल
माँ का विश्वास और  गुरुर

धर्मान्धता की आड़ में
पता नहीं क्यों खेलते हो खेल
छलते हो,  करते हो
तोड़ने की कोशिश अपने ही भाई का हाथ

स्वर्ग जैसे कश्मीर पर
करते हो खून के छिंटो की बौछाड़
फिर भी कहाँ रहता है तुम्हे चैन
हर दिन दिखाते हो नया खेल

लो, अब भुगतो ! करो बर्दाश्त !
झेलो
समझो !!
कितना असहनीय होता है
वह दर्द
वह कराह
जब जाती है जान
नन्हो की,
सोचो उन माओं के लिए, जिनकी औलादें थी
इस सब का कारण तुम हो पाकिस्तान !!

पाकिस्तान !!
अब भी तेरी माँ, नहीं देगी बद्दुआयें !
बस संभल सकते हो तो संभल जाओ
नहीं तो ...
मरोगे तुम, नम होगी आँखे हमारी !!
सहोदर हो तुम, पाकिस्तान !!

पाकिस्तान !!
सुन रहे हो !
जियो और जीने दो !! प्लीज !!
अच्छा लगेगा !!
________________________
दिल से श्रद्धांजलि उन नन्हों के लिए .......... !!

पेशावर के एक स्कूल मे नन्हें बच्चों पर आतंकवादियों ने हमला कर सैकड़ों बच्चो की हत्या कर दी थी, ये कविता उन्हे समर्पित है !


Sunday, December 7, 2014

समझिये, आप प्यार में हैं !!


कभी अगर
ड्रेसिंग टेबल के सामने
उल्टा जैकेट पहन कर खुद को निहारें
और ढूंढें स्मार्टनेस
तो समझिये आप प्यार में हैं !
कभी, जब
मेट्रो का वेट करते हुए स्टेशन पर
सामने आ कर मेट्रो लगे, दरवाजा खुले
फिर बंद हो जाये
और आप सिर्फ हलके से सर खुजाएँ, और मुस्काएं
तो समझिये आप प्यार में हैं !
कभी खाने के टेबल पर अगर
खूब तीखें खाने को खाते हुए भी
लाल डबडबाते आँखों के साथ मुस्कुराते हुए,
कह दें, लाजबाब खाना, सामने वाले के आँखों में झांकते हुए
तो समझिये आप प्यार में हैं !
कभी कॉलेज में
मैडम पढ़ा रही हो केमिस्ट्री
और आप एक दम से चिल्ला कर कहें
यस सर, प्रेम पर कविता लिख कर दिखाऊं
तो समझिये आप प्यार में हैं !
आखिर प्यार व पागलपन
एक ही रास्ते में पड़ने वाला
है दो लगातार पडाव
पागल कहना, करेगा अचरज
इसलिए मान लीजिये
या समझिये आप प्यार में हैं !!!



Thursday, November 27, 2014

वर्चस्व की लड़ाई


कुछ बातें अचंभित करती है
जैसे कहते है,
जंगल में, होता है एक शेर!
बेवकूफ बनाते हैं, देखा है मैंने
गिर वन में, कुछ दुरी पर 
दो !! अलग अलग शेर
वैसे फारेस्ट ऑफिसर भी बता रहा था
होती है, वर्चस्व की लड़ाई उनमें !!
गुर्राते हैं, एक दुसरे पर, भाव खाते हैं
ऐसे जैसे, कोई एक ही है
है उस जंगल का शहंशाह
ये भी बताया उन्होंने
कई बार उनके बीच के झगडे में
लगा कोई एक मारा जायेगा !!
आखिर उन्हें बहुत रखना पड़ता है ध्यान
संरक्षित जीव जो हैं !!
पर घटनाएँ, आश्चर्यचकित करती हैं
लड़ाई शेरों के बीच होती है
लेकिन मारे जाते हैं
बारहसिंघा, खरगोश या बकरे भी
आखिर हर बड़ी लड़ाई की परिणति
ख़त्म होती है
दावत और राउंड टेबल पर
फिर परोसे जाते हैं 'नरम मांस'
और हाँ! शेर क्या सियार भी नहीं मरते
आखिर कोई समझौता करवाने वाला भी तो हो
हमारे राजनितिक शेरों के बिसात में भी
होता है, ऐसा ही न !!
_____________________
मैंने अपने में खरगोश देखा है !!
(पुनश्च : शेरों के वर्चस्व की लड़ाई जारी रहेगी, ताकि लोकतंत्र कायम रहे )
यश-ऋषभ हमिंग बर्ड के साथ 

Saturday, November 15, 2014

खुली आँखों से देखा सपना


मेरे कुछ ज्यादा चलते दिमाग ने
एक दिन, लगाई घोड़े सी दौड़
होगा एक दिन
स्वयं का ख़्वाबों सा घर
खुद के मेहनत के पैसों से
ख़रीदे हुए ईंट, रेत व सीमेंट का !
आभासी, ह्रदय के आईने में
देखा, उसमें कहाँ होगा दरवाजा
कहाँ होगी खिड़कियाँ, रौशनदान भी
गमले रखूँगा कहाँ
ये भी पता था मुझे !!

घर के लॉन में
हरे दूब पर नंगे पाँव चलते हुए
कैसे ओस के बूँद की ठंडक
देगी सुकून भरा अहसास
और तभी, एक गिलहरी पैरों के पास से
गुजर जायेगी
इस्स !! ऐसा कुछ सोचा !

उस आभासी घर के
डाइनिंग टेबल पर बैठ कर
चाय की सिप लेते हुए
खिड़की से दिखते दरख्तों के ठीक पीछे
दूर झिलमिलाती झील के कोने पर
बैठी सफ़ेद फ्लेमिंगो, एक टांग उठाये
कौन न खो जाए उसके खूबसूरती में
आखिर वो मेरे से ही मिलने तो आएगी
माइग्रेट कर के, बोलीविया के तटों से !!

मुझे पता नहीं और क्या क्या सोचा
जैसे बालकनी में
मनीप्लांट के गमले के
हरे पत्ते पर हल्का सफ़ेद कलर
मैं भी उस पत्ते को प्यार से थपकी देते हुए
महसूस रहा था
छमक कर आ रही
बारिश की बूंदों को !!

बहुत सोचने से अच्छी नींद आती है न
फिर ख़्वाबों में खोना या बुनना किसको बुरा लगे
पर, ये प्यारा सा ख़्वाब
फिर, नींद टूटते ही
- पापा!! स्कूल फीस !! आज नहीं दिए, तो फाइन लगेगा !!
______________________________
जिंदगी में कितने सारी उम्मीदें, सोच जवान होती रहती है ....... है न !!

Tuesday, November 4, 2014


धरती पर कहीं स्वर्ग है 
तो सिर्फ यहीं हैं, यहीं है, यहीं है
ऐसा जपने वालों
ए कश्मीर के निवासियों 
पहली बार देखा व झेला तुमने 
भीषण दर्द और विभीषिका बाढ़ की 
पुरे देश की हेड लाइंस में 
फिर से आ ही गए,
चौतरफ़ा छा ही गये
चौकुठे कैमरे के साथ 
गंभीर बैठा मीडीया
उधेड़ रहा अब तुम्हारे
ज़ख़्मों की बखिया
दर्शाते हुए चिंता
घोषित किया गया
इसे राष्ट्रीय आपदा
और तुरंत फुरंत ही पूरा देश
खड़ा है अब तुम्हारे पीछे
हर भारतीय को प्यारा है कश्मीर
आख़िर हमारा है कश्मीर
हमें दिली हमदर्दी है कश्मीर !
आखिर दिल में बसते हो यार
सुन रहे हो न ए-कश्मीर !!
बेशक घाव देते रहे हो, तुम
फिर भी हमें चिंता है तुम्हारी !!

पर कभी तुमने
उस बिहार की बाढ़ विभीषिका पर
हलकी अधमुंदी नजर भी डाली
वही बिहार, जो इस देश का कभी सिरमौर था
वहां हर वर्ष होता है त्राहिमाम
नेपाल से निकलती नदियाँ
लीलती है लाखों जानें
मूक..बिना अखबारों की सुर्खियां बने
लाखों लाशें बह.. गल.. जल जाती हैं
फिर भी बिहार, नहीं होती हकदार
किसी खास पॅकेज का
अनुदान का, संवेदना का
आंसू तक नहीं मिलते, टपकाने वाले
फिर भी ये बिहार, मजबूती के साथ
तुम्हारे साथ खड़ा है, कश्मीर !!

याद रखना कश्मीर
हर बिहारी के दिल में, बसते हो तुम !!
वैसे भी हर बदमाश बच्चे का ध्यान
माँ बाप ज्यादा ही रखते हैं
ऐसा सुनते आये हैं हम .....
करते भी आए हैं हम...
सच ही है न .......!!
कश्मीर!! कभी दिल में बिहार को
बसा कर देखो न .......प्लीज !!
शायद दिख जाए कभी
एक हल्की झलक तुम्हारी,
पीर कहाँ मेरी-तेरी
एक ही तो है हमारी !
---------
काश हम रहे साथ जिए साथ 
हरदम साथ साथ 




Monday, October 27, 2014

बिग बॉस


पता नहीं,
था गहरी नींद में सोया
या कि
था किसी ख्बावो में खोया
यूँ कि एकदम से कड़कती आवाज
कानों में गूंजी

बिग बॉस चाहतें हैं कि
कॉन्फेशन रूम में आयें मुकेश
इस्स चिहुंका मैं
ठिठका मैं
याद नहीं उठा भी की
एवें आँख खुली
या उठा तो किस कमरे में गया मैं?
तभी फिर से वही रौबदार आवाज
गूंजी या समझो चीखी
"मुकेश"
बिग बॉस आपके "हमिंग बर्ड" के
बेस्ट सेलर बनने की बधाई देते हैं...

थैंक यू - बिग बॉस!!
मीठे नींद में सोये - खोये
मुकेश की होंठ बुदबुदाई!
फिर से वही कौंधती आवाज
आप खुश हैं, संग्रह के प्रदर्शन से
हमिंग बर्ड की उड़ान से ?
क्या आपको लगता है
जिन हाथों तक चाहते थे पहुँचाना
उन हाथों तक ये बुक पहुंची...?

एक दम से उड़ गयी नींद
खुद ब खुद आवाज रुंध गयी
भरे गले से मेरी आवाज निकली
जी, उम्मीद से बढ़ कर
मिला रेस्पोंस
पर उम्मीद फिर भी है कायम!!

अब आप जा सकते हैं मुकेश !
मेरे नींद की ठुमकती चिरैया को
एक अनूठे सपने ने उड़ा दिया
पर, मुस्कराहट तैरा दी होंठो पर
इस प्यारी सी हमिंग बर्ड ने...

काश ये सपना भोर का होता
ये सपना सच्चा होता :-)
--------------------
मोरल ऑफ़ द पोएम : जो भी इस बेवकूफी भरी रचना को पढ़े वो मेरी हमिंग बर्ड को जरुर पढ़े, जरुर आर्डर करे  :-)
इंतजार रहेगा...... :-)


Tuesday, October 21, 2014

वो आयी थी ......


चाय की ट्रे
दो रखे थे कप
चाय की अंतिम बूंद थी नीचे
एक कप के कोने पर
थी लिपिस्टिक 
एक आध टूटे बिस्किट
और बच गए थे कुछ मिक्सचर
समझे न .
वो सच में आयी थी !

कई बार सोचा
वो जा चुकी
इनको होना चाहिए अब सिंक में
पर हर बार
अलग अलग सोफे पर बैठ कर
महसूसना
अच्छा लग रहा था
वो सच में आयी थी !

उसके जिस्म से
या शायद परफ्यूम जो लगाया था
उड़ने लगी थी उसकी सुगंध भी
फिर से कमरे की वही पूरानी
जानी पहचानी बास
लगी थी छाने
पर मन तो अभी भी
वही उसके
केविन क्लेन के इटरनीटी में
था खोया
अच्छा लग रहा था
वो सच में आयी थी !

मैंने कलेंडर
घडी की सुइयां
मन का कंपन
सोचा सबको रोक लूं
कर दूं स्थिर
ताकि हो सबूत
खुद को समझा पाने का
वो सच में आयी थी ........... न !!

मेरी कविता संग्रह जो हर ई स्टोर पर उपलब्ध है 

Sunday, October 5, 2014

बदलाव की बयार



सबने न सही
अधिकतर ने कहा
रुको थमो देखो
रखो सब्र
करो इंतज़ार
बदलाव की बयार बहने ही वाली है !

हाँ दिखने लगा है सब
चीखने लगे है आज कल
जरुरत से
थोडा ही ज़्यादा
चमकेगा-दमकेगा
दूर से ही देख लेना
बदलाव की बयार बहने ही वाली है !

हो रही है कोशिश
समझौतों की
रंग बदलते कुर्तों के साथ
बेशक हो रहें हैं असफल
तो भी ढोलक की थाप
बदलाव तो लाती है
हाँ कानो में रुई लगाने का
है न आप्शन
ताकि फ़िल्टर ध्वनि
दे पाए सुकून
बदलाव की बयार बहने ही वाली है !

बदलेगी आबादी
बदल जायेंगे गुनाह
होगी एक लम्बी फेहरिश्त
बदलेंगे वादे
बेशक वो हो झूठे व फर्जी
पर उम्मीदें बनी रहेंगी
ताजा! टटका!! मासूम!!!
बदलाव की बयार बहने ही वाली है !

मिल गया मंगल
अब आज मंगल
कल मंगल
मंगले मंगल
बस...
हम सबकी शुभिच्छा
हमारी सारी कामनाएं
बदलते सोच के साथ
होने लगीं हैं तृप्त!!
चिंता न करो
बदलाव की बयार बहने ही वाली है !
------------------
बस ऐसे ही सिर्फ एक कविता !!



Tuesday, September 23, 2014

यश का जन्मदिन


पिछले कुछ दिनों से 
मेरा बेटा 'यश'
कभी कभी 
पहन कर चल देता है 
मेरा चप्पल !!
बढ़ रहा है उसका पैर !!

कभी कभी 
जब खड़ा होता है 
यश मेरे साथ
मेरी ही नजर रहती है
उसकी लम्बाई पर
सोचता हूँ, कब करेगा मुझे पार !!

जब भी उसके प्लेट्स में
रोटियां होती है कम
कह ही उठता हूँ
बढ़ रहे हो,
खाया करो, मेरे से ज्यादा !!

उसके स्कूल्स की कोपियाँ
जहाँ करने होते हैं
पेरेंट्स के हस्ताक्षर
हर बार उसके नाम
"यश कीर्ति सिन्हा" में
'कीर्ति' शब्द पर ठहर जाती है नजर !!

हर बाप की तरह
मेरी भी इच्छा, मुझे भी है इंतज़ार
मेरा बेटा करे नाम
फैले उसका और उसके कारण मेरा यश
चारो तरह हो उसकी कीर्ति !!
सुन रहे हो न रहबर !!
____________________
खूब सारी आशीष !!
(आज मेरे बेटे यश का जन्मदिन है,, जरुरत है आप सबके शुभकामनाओं का )

Thursday, September 18, 2014

प्रेम कविता ....



मोटी !! मत खाया करो भाव
मांसल भरे देह के साथ
हो गयी उम्र तुम्हारी
थोड़ी खुबसूरत  ही तो हो
तो, तो क्या हुआ
मुझे तो अभी भी
तुमसे आती है भीनी सी खुशबू
सुरमई रातों वाली
कविता जैसी !!

जब देखो छिटक देती हो
मेरा हाथ
कह देती हो एक पल में
बेशर्म !! परेशान करता है
शरम नहीं आती
पर क्यों नहीं देख पाती
अपनी कजरारी आँखों से
मेरी मदहोश आँखों में
उस ध्रुव तारा से आने वाले
ठंडे प्रकाश जैसा नेह !!
कुछ प्यारी सी बहती हुई गजल जैसी !!

हुंह !! जाओ !!
समझ गया !! नहीं है तुम्हे प्यार व्यार !!
थोड़ी बालपन सी ठुनकन
क्यों न दिखाऊं
आखिर
भींगते आकाशों का सुख
और ठंडी गुनगुनी धुप
दोनों तो रचा बसा है तुममे
गद्य और पद्य दोनों विधाओं का
प्रेम से भरा तुम में !!
पढने दो न ये किताब मुझे
उफ़ कुछ तो कहो
मान जाया करो न
ए प्रेयसी !!
___________________
क्या इसको प्रेम कविता कहेंगे ?

(मेरी कवितायेँ, ऐसी ही हलके फुल्के शब्दों से जुड़ते हुए बनती है ..............ऐसी ही, बहुत सारी आम लोगो से जुडी कविता के लिए आर्डर करें हमिंग बर्ड :)


Monday, September 8, 2014

हमिंग बर्ड : कभर पेज



मैंने नहीं देखी है ....... 
"हम्मिंग बर्ड" ! अब तक !!
तो, क्या हुआ ?
मैंने तो प्यार व दर्द भी नहीं देखा 
पर, फिर भी, लिखने की कोशिश कर चूका उन पर भी .....
______________________
मेरे अन्दर के छपने की उत्कंठा ने आखिर रंग दिखा ही दिया ... 
आखिर मेरा आने वाला पहले कविता संग्रह "हमिंग बर्ड" का कभर पेज तैयार है !!
आज अनंत चतुर्दशी के दिन, जो हिंदी रीति से मेरा जन्मदिन भी है, को इस कभर-पेज को आप सबके साथ शेयर करता हुआ "टॉप ऑफ़ द वर्ल्ड" फील कर रहा हूँ !! 
काश ये संग्रह कुछ लोगो के टेबल तक पहुँचने में सफल रहे 
इन्ही उम्मीदों के साथ ......... आप सबके स्नेह का आकांक्षी !!


Friday, August 29, 2014

प्रेम

( दिल्ली एअरपोर्ट से ली गयी फोटो )
ये प्रेम भी न 
ऐसे लगता है जैसे 
मेट्रो का दरवाजा 
सामने खुलने वाला हो 
या मेट्रो क्यों 
नए वाले लाल डीटीसी का दरवाजा ही 
दरवाजा के खुलते ही 
सामने खड़े पथिक के सामने 
हलकी से मनचली ए.सी. की हवा 
खूब सारी गर्मी के बाद झुमा देती है जैसे !!

ये प्रेम भी न
अजीब है कुछ
ऐसे सोचो जैसे
खूब सारी प्यास लगी हो, और
मुंह में लिया हो
वो सबसे सस्ती वाली लोली पॉप
या फिर उल्टा ही सोच लो, क्या जाता है
पेट में गैस
और जस्ट पिया हो
'इनो' का एक ग्लास !!

ये प्रेम ही तो है
जब चौबीस घंटे का व्रत
और फिर एक ग्लास शरबत
खूब सारी चीनी वाली .........
शायद मिल जाता है प्रेम
प्रेम ही है न ....... !!
__________________
प्रेम ही होगा ........... 


(विनोद कुमार शुक्ल, कैलाश वाजपेयी, केदारनाथ सिंह ....के साथ) 

(भारतीय ज्ञानपीठ के आयोजन कविता समय (05.08.2014) इंडिया हेबिनेट सेंटर से ....... जिसमें केदारनाथ सिंह, कैलाश वाजपेयी, अशोक वाजपेयी, विनोदकुमार शुक्ल, राजेश जोशी, ऋतुराज, विजय कुमार, मदन कश्यप, नीलेश रघुवंशी और सुमन केशरी ने कविता पाठ किया !! )

Wednesday, August 20, 2014

चालीस के बाद, पचास के पहले


चालीस के बाद, पचास के पहले 
है एक अलग सा उम्र डगर 
जब तय कर रहा होता है पुरुष मन !
होती है जिंदगी के राहों में 
उच्छ्रिन्खल व उदास मध्यांतर !!

शारीर तय कर रहा होता है सफ़र 
निश्चिन्त शिथिलता के साथ 
ढुलमुल पगडंडीयों पर !!

मन कभी कभी कहता है
जवान होते बेटे की
लिवाइस जींस व टी शर्ट को
करूँ एक आध बार ट्राय
लोटटो के स्पोर्ट्स शूज के साथ पहन कर !!

पर, ये बात है दिगर
वही मन, उसी समय समझाता है
छोडो ये सब, चलों चले
कुछ फॉर्मल या लम्बा कुर्ता पहन कर!!

इसी उम्र में, होती है अजीब सी चेष्टा
युवती को सामने देख
करते हैं कोशिश, हो जाए सांस अन्दर
ताकि दिख न पाए ये उदर !!

कानों के ऊपर, सफ़ेद होते बालों की चमक
हर नए दिन में कह ही देती है
लानी ही पड़ेगी, गार्नियर हेयर कलर !!

बातों व तकरारों में हर समय होता है विषय भोजन
ब्लडप्रेशर व शुगर के रीडिंग पर पैनी रहती है नजर
कभी सोया या सूरजमुखी आयल की प्रीफेरेंसेस
तो कभी करते हैं मना, मत दिया करो आलू व बटर!!

पर फिर भी नहीं रख पाते ध्यान
बढ़ रहा होता है बेल्ट व पेंट का नंबर
चश्मे के पावर की वृद्धि के समानुपाती
होती है, अन्दर घट रहा शारीर का पावर !!

उम्र का ये अंतराल, है एक रेगिस्तानी पडाव
जब होता है अनुभव, होता है वो सब
जो हासिल करने की, की थी कोशिश हरसंभव
जो भरता है आत्मविश्वास, रहती है मृगतृष्णा
पर फिर भी, दरकती है उम्मीदें
काश!! और भी कुछ! बहुत कुछ !!
चाहिए था होना, कोसते हैं खुद को
काश कुछ और कोशिशें कामयाब हो जाती !
चलो अगले जन्म में,
पक्का पक्का, ऐसा ही कुछ करना !!
सुन रहे हो न रहबर !! !!




Sunday, August 3, 2014

प्रेम कविता


एक तरुणी ने
अपने प्रेमी के कानों में
की सरगोशी ....
क्या तुम सचमुच मेरे प्रेम में हो ?
अगर हाँ, तो 
क्या मेरे लिए लिख पाओगे कविता ?

अरे ये कौन सी बड़ी बात
प्रेमी ने सोचा-समझा
युवती के आँखों में झाँका
कलम से रंगे कुछ पन्ने
जो फाड़ कर फेके गए
फिर, अंत में उसने चूमा
प्रेयसी का हाथ
लिख दिया उसके हथेली पर ही
मेरे अंतस से आ रही आवाज
मैं तुमसे करता हूँ प्यार !
खुद से ज्यादा !!

प्रेमिका की डबडबाई आँखे 

बोझिल मुंदी पलकों के साथ
समेटा खुद को, उसके बांहों में
बाँधी मुट्ठी अपने हथेली की
चिपका कर उसे सीने से
बोल उठी लरजते हुए
अंग्रेजी के तीन लफ्ज़
लव यू टू !!

उफ़! क्या प्रेम का सम्प्रेषण व
बहते दिल के उद्गार से
बेहतरीन, हो भी सकती है
कोई प्रेम कविता??

प्रेम सिक्त चार आँखें
और, चार हाथ
बस हो साथ साथ
खुद-ब-खुद रच जाती है
प्रेम कविता !!!!
---------------------
क्या बन पायी प्रेम कविता ?



Wednesday, July 30, 2014

एक सच्चाई ऐसी भी .......


एक सुन्दर नवयुवती
थी, स्विमिंग सूट में 
(अधोवस्त्र भी कह सकते हैं )
पूल में छप छप छपाक 
के आवाज के साथ, कूद पड़ी 
अब कर रही थी अठखेलियाँ, तैरते हुए 
उड़ती तितलियों या मछलियों सी 
दूर खड़ा इंस्ट्रक्टर, निहार रहा था 
सुरक्षा की दृष्टि से !! है न जरुरी !!

एक स्त्री रोग विशेषज्ञ
पुरुष डाक्टर के क्लिनिक में
अनुभवों की गहराती रेखाएं लिए
एक चालीस-वर्षीय महिला
बेझिझक थी लेटी
थी तनावग्रस्त बेशक
डाक्टर टटोल रहा था वक्ष
मेमोग्राफी का पहला टेस्ट था शायद
जिंदगी का भरोसा दे रहा था डॉक्टर !!

एक पूर्ण ढकी हुई स्त्री
सुन्दर सौम्य भारतीय परिधान में
गुजर रही थी मार्केट से
था कमर के पास, थोड़ा उघड़ा हुआ देह
रह गया था बचा
पल्लू के ढकने से शायद !
बींध रही थी, पता नहीं कितनी सारी
कामुक पुरुष नजरें !!
स्त्री महसूस रही थी खुद को
असहाय, नग्न और बेबस !!

किसी ने कहा
ब्यूटी लाइज ओन बीहोल्डर’स आईज
सुन्दरता तो देखने वाले के नजर में होती है
वैसे ही शायद
नग्नता भी शायद कुदृष्टि का कमाल है
मानसिक दिवालियेपन का
है न सच !!
________________
एक सच्चाई ऐसी भी !!




Monday, July 21, 2014

धरती और आकाश


ए आकाश !!
बुझाओ न मेरी प्यास
सूखी धूल उड़ाती, तपती गर्मी से
जान तो छुड़ाओ
ठुनकती हुई नवोदित हिरोइन की तरह
बोल उठी हमरी धरती अनायास !!

यंग एंग्री मैंन की तरह
पहले से ही भभका हुआ था बादल
सूरज की चमकती ताप में जलता
गुर्रा उठा हुंह !! कैसे बरसूँ
नहीं है मेरे में अभी बरसने का अहसास !!

पता नहीं कब आयेंगे
पानी से लदे डभके हुए मेघ भरे मॉनसून
और कब हम बादलों में
संघनित हो भर जायेंगे जल के निर्मल कण
ए धरती सुनो, तुम भी तो करो प्रार्थना
हे भगवन, भेजो बादल, तभी वो सुनेंगे तुम्हारी अरदास!!

वैसे भी इस कंक्रीट जंगल में
भुमंडलीकरण ने हर ली है हरियाली
फिर भी भले, जितने भी बीते दिन
हो सकता है लग जाये समय, पर
ए धरती, आऊंगा भिगोने
ऐसा तुम रख सकती हो आस !!

भिगोता रहेगा तुम्हे, हमारे
रिश्तो का नमी युक्त अहसास
भींग जाओ तुम तो
फ़ैल जाएँ चहुँ ओर खुशियाँ
चमक उठे पेड़, चहचहाने लगे विहग
मैं आऊंगा, छमछम – छमाछम
बरसाऊंगा नेह जल
सुन रही हो न !!
कह रहा तुम्हारा आकाश, रखना विश्वास !!

मिलन होगा,
जरुर होगा
मिलेंगे एक दिन हम
धरती और आकाश !!  
________________
एक मौनसुनी कविता :)


Wednesday, July 16, 2014

डस्टबिन


मेरे घर के कोने में पड़ा
नीले रंग का प्लास्टिक का
सुन्दर सा बाल्टीनुमा डस्टबिन
है उसमे लीवर-सा सिस्टम
ताकि उसको पैर से दबाते ही
लपलपाते घड़ियाल के मुंह के तरह
खुल जाता है ढक्कन !!
सुविधाजनक डस्टबिन
समेट लेता है हर तरह का कूड़ा
जूठन/धूल/कागज़/और भी
सब कुछ /  बहुत कुछ
बाहर से दिखता है सलीकेदार
नहीं फैलने देता दुर्गन्ध
नहीं बढ़ने देता रोग के कीटाणु
है अहम्, मेरे घर का डस्टबिन
आखिर हैं हम सफाई पसंद लोग !!

अगर मैं खुद को करूँ कम्पेयर
तो पाता हूँ, मैं भी हूँ
एक शोफिसटिकेटड डस्टबिन
सहेजे रहता हूँ गंदगी अन्दर
तन की गंदगी
मन की गंदगी, हर तरह से
गुस्सा/इर्ष्या/जलन/दुश्मनी
हर तरह का दुर्गुण/अवगुण
है, अहंकार का ढक्कन भी
पर, हाँ, बाहर से टिप-टॉप
एक प्यारा सा मस्तमौला इंसान
अन्दर पड़ी सारी दुर्भावनाएं
फ़रमनटेट करती है
और अधिक कंडेंसड  हो जाती है
और फिर, गलती से या अचानक
दिखा ही देती है मेरा अन्तःरूप !!

साफ़ हो जाता है डस्टबिन
एक फिक्स आवर्ती समय पर
पर मेरे अन्दर के
दुर्गुण के लेयर्स
सहेजे हुए परत दर परत
हो रहा है संग्रहित !!

काश ! स्वभावजन्य कमजोरियों से
हुई दुर्गुणों के अपच को
शब्दों के पश्चाताप से रोगमुक्त कर
सादगी भरी स्वीकारोक्ति की डूबकी लगा
साफ़ स्वच्छ छवि के साथ
एक बार फिर से हो पाता प्रतिष्ठित

एक काश, ही तो कहना होगा
प्रियोडीकली !!
और मेरे सर के ऊपर का आसमान
पूर्ववत रहेगा सुन्दर
सम्मोहक नीला !!



Tuesday, July 8, 2014

मैं कवि नहीं हूँ

 
 
नजरों के सामने
फड़फड़ाते पन्नों में
झिलमिलाते शब्दों के समूह
जिनमें कभी होता प्यार
तो कभी सुलगता आक्रोश
कभी बनता बिगड़ता वाक्य विन्यास
कह उठता अनायास
“मैं कवि नहीं हूँ”

सफ़ेद फूल में, चमकते तारे में
धुंधले दर्द में, सुनहले मुस्कुराहट में
गुजरे यादों मे, अखरते वर्तमान में
ढूँढता हूँ कवितायें
पर, पता है खुद को
“मैं कवि नहीं हूँ”

छंदों में, गीतों में,
गजल में, शेर में,
यहाँ तक की हाइकु-हाइगा में भी
देखता हूँ खुद का अक्स
पर हर बार सुगबुगाते एहसास
“मैं कवि नहीं हूँ”

मेरे अंदर की कोशिकाएं
उनके समूह उत्तक
या फिर हर एक अंग व अंगतंत्र
मेरा जिस्म भी, खिलखिला कर कह उठा
“मैं कवि नहीं हूँ”

अंततः !!
धड़कते साँसो व
लरजते अहसासों के साथ
करता हूँ मैं घोषणा
“मैं कवि नहीं हूँ”

कहा न – मैं कवि नहीं हूँ” !! 
 
 

Friday, June 27, 2014

जूते के लेस


जूते के लेस 
बेचारे बंधे बंधे रहते हैं, हर समय 
छाती पर बंधे हाथों की तरह 
एक दम सिमटे, गांठ बांधे 
पर देते हैं एहसास 
सब कुछ समेटे रखने का 
चुस्त, दुरुस्त !! 

कभी कभी थके बाहों जैसे 
जूते के लेस भी 
चाहते हैं लहराना हाथों के तरह ही
एक आगे, एक पीछे के
तारतम्य के साथ
तो, कभी बेढ़ब चाल में
चाहते हैं फुदकना
मस्त अलमस्त !!

तभी तो लेफ्ट राइट होते
पैरों के नीचे, पैंट के सतह से
टकरा कर ये लेस
करते हैं कोशिश खुलने का
बहुत बार खुल कर
दिखा ही देते हैं, आजादी
कहते हैं, बहुत हुए त्रस्त और पस्त!!

बड़े होते हैं बदमाश
ये जूते के लेस
जान बुझ कर, खुद ही
दब जाते हैं जूते से
गिर जाता है बलखा कर
जूते पर जो खड़ा था
दिखा रहा था अकड़ !

आखिर "अहमियत" भी
है एक शब्द !
जूता हो, या हो जूते का लेस
या हो सर की टोपी, या हो बटन !!



Tuesday, June 17, 2014

सिमरिया पुल



जब भी जाता हूँ गाँव 
तो गुजरता हूँ, विशालकाय लोहे के पुल से 
सरकारी नाम है राजेन्द्र प्रसाद सेतु 
पर हम तो जानते हैं सिमरिया पुल के नाम से
पार करते, खूब ठसाठस भरे मेटाडोर से 
लदे होते हैं, आलू गोभी के बोरे की तरह 
हर बार किराये के अलावा, खोना होता है 
कुछ न कुछ, इस दुखदायी यात्रा में 
पर, पता नहीं क्यों, 
इस पुल के ऊपर की यात्रा देती है संतुष्टि !!

माँ गंगा की कल कल शोर मचाती धारा
और उसके ऊपर खड़ा निस्तेज, शांत, चुप
लंबा चौड़ा, भारी भरकम लोहे का पुल
पूरी तरह से हिन्दू संस्कारों से स्मित
जब भी गुजरते ऊपर से यात्री
तो, फेंकते हैं श्रद्धा से सिक्का
जो, टन्न की आवाज के साथ,
लोहे के पुल से टकराकर
पवित्र घंटी की ठसक मारता है पुल,
और फिर, गिरता है जल में छपाक !!

हर बार जब भी गुजरो इस पुल से
बहुत सी बातें आती है याद
जैसे, बिहार गौरव, प्रथम राष्ट्रपति
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की, क्योंकि सेतु है
समर्पित उनके प्रति !
पर हम तो महसूसते हैं सिमरिया पुल
क्योंकि यहीं सिमरिया में जन्मे
हम सबके राष्ट्र कवि “दिनकर”
एकदम से अनुभव होता है
पुल के बाएँ से गुजर रहे हों
साइकल चलाते हुए दिनकर जी !
साथ ही, गंगा मैया की तेज जलधारा
पवित्र कलकल करती हुई आवाज के साथ
बेशक हो अधिकतम प्रदूषण
पर मन में बसता है ये निश्छल जल और पुल !!

और हाँ !! तभी सिमरिया तट पर
दिख रहा धू-धू कर जलता शव
और दूर दिल्ली में बसने वाला मैं
कहीं अंदर की कसक के साथ सोच रहा
काश! मेरा अंतिम सफर भी, ले यहीं पर विराम
जब जल रहा हो, मेरे जिस्म की अंतिम धधक
इसी पुल के नीचे कहीं
तो खड्खड़ता लोहे का सिमरिया पुल
हो तब भी ........ अविचल !!
_______________
माँ गंगा को नमन !!




Thursday, June 12, 2014

“गंदी बात”




बेवकूफ लड़की !
तुम्हें कहाँ होगा याद 
भूल चुके होगे तुम ‘सब’
पता नहीं कैसे कैसे 
अजीब अजीब सी सौगंधों से 
बांधा करती थी तुम !

हाँ, मुझे भी बस इतना ही है याद 
और उन सौगंधों का अंत 
होता था, दो शब्दो के साथ 
“गंदी बात”
सिगरेट पीना?
गंदी बात
शराब को हाथ लगाना
गंदी बात
एक बार दी थी सलाह तुम्हें
परीक्षा मे चोरी की
पर, तुम्हारा था अजीब सा उत्तर
गंदी बात
यहाँ तक की “ए” सेर्टिफिकेट वाली मूवी
आती थी ‘गंदी बात’ की श्रेणी में
मत घूरों ऐसे लड़कियों को
गंदी बात
धत्त ! ऐसे स्पर्श !!
बहुत गंदी बात !!

ये लो अब, आज तो जिंदगी
है ऐसी दोराहे पर
जहां से दोनों रास्ते
है बुराई से भरे
बस एक थोड़ा कम, तो दूजा ज्यादा

बहुत दिनों तक थी
तुम्हारी ये ‘गंदी बात’, जेहन में
तभी तो एक बार
किसी अपने की बहुत सारी
नोटों की गड्डियाँ थी गिननी
हर गड्डी मे नोट थे एक या दो ज्यादा
पर तुम्हारी ‘गंदी बात’
तब तक कौंध रही थी
जब तक की गड्डीयों की गिनती
खत्म न हो गई !!

खैर छोड़ो !
गंदी बात, माय फुट
धुएँ के छल्ले उड़ाए न, दारू भी चखूँगा
जल्दी ही !!
किसी ने बताया
दारू का पैग जब हलक से उतरता था
तो मुंह बनाना पड़ता है
ताकि दिख जाये “गंदी बात”

वैसे भी, बुरा बनना, बुरा थोड़ी है !!
__________________________
डिस्क्लेमर: मन कभी कभी वैसे ही बहुत सारे प्लॉट गढ़ता है,
कहानी रचने के बदले मैंने कविता बना दी !!
"गंदी बात" आज कल हर जुबान पर रहने वाला शब्द है




Tuesday, June 3, 2014

टिकोज़ी



जब भी “मैया”
खोलती लोहे का काला बक्सा
तो, आदत से मजबूर
वहीं आस पास मँडराता
पता नहीं, क्या रहती थी उम्मीद?
अच्छा सा लगता था बस
मैया के पल्लू को पकड़े रह, निहारना
बड़े जतन से रखती
पुरानी बनारसी साड़ी
बाबा का काला गरम सूट
बेशक अंतिम  बार कब पहना गया
था नहीं मुझे याद !

कपड़ों के बीच ही
थी, एक अजीब सी तिकोनी वस्तु
सफ़ेद गरम मोटे कपड़े से बनी
मैया कहती ये है “टिकोजी”
हर बार, बक्सा खोलते ही मैया बिना पुछे बताती
ये, बाबा के लिए बनी चाय को
गरम रखने के लिए
चीनी मिट्टी के केतली व कप को
ढकने के लिए होता था !

जब थे, बाबा शिलोंग/दार्जिलिंग में पोस्टेड
खौला कर हरी चाय की पत्तियां
ढक देती थी केतली को
टिकोज़ी से ! मैया !!
आखिर नहीं था चलन, थर्मस का !

चाय गरम रह पाती या नहीं
टिकोजी का उपयोग
सार्थक था या नहीं
ये तो जानती थी सिर्फ मैया या फिर बाबा !

पर हाँ !! तब देखी थी
मैया के आंखो की चमक
व, टिकोजी के अंदर
रखकर खुद का हाथ
महसूस किया था गरमाहट !
आज के समय में समझ पा रहा
मैया बाबा के प्रेम का असीम समर्पण !!
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प्रेम दर्शाने के लिए, कोई भी बिम्ब सक्षम होता है न ?? :)


Friday, May 23, 2014

जिंदगी के पन्ने




बेहद अजीब हो गए हैं हम
कुछ गमलों में चमकते फूलों की
रंगीन पंखुड़ियों को देख कर समझते हैं
कि हमारा पर्यावरण
सिर्फ और सिर्फ शुद्धता बरसा रहा है 
बहने लगा है अब शुद्ध ऑक्सीजन !
आफिस गार्ड की कड़क यूनिफार्म से
अंदाजा आर्थिक अवस्था का लगाते हैं
पर, हमें जरा भी गुमान तक नहीं होता
कि उसका बेटा निकाल दिया गया स्कूल से
फीस नहीं दिये जाने के वजह से !
आखिर गार्ड का दिया हुआ सेल्यूट ही तो
है आर्थिक सबलता !!
फेसबूक पर चंद मुस्कुराते फोटोज पर
लाइक बटन दबा कर, कह उठते हैं
'कितना खुशहाल और सम्पन्न परिवार है आपका'
फेसबूक पर चहक रही स्त्रियाँ..
कितना प्रयास करती है
पति के थप्पड़ से आंखो के नीचे बने नीले निशान
छुपा ही ले जाती है..
हमे कहाँ दिखते हैं भला..
200 ग्राम सेब.. साथ में चिप्स / बिसलरी
खरीद कर, कह उठते हैं
'महंगाई बढ़ गई है,'
समझने लगते हैं स्वयं को अर्थशास्त्री,
अर्थ व्यवस्था पर बौद्धिकता छांटते हैं
पर नहीं दिखती उस दुकानदार की
ढीली होती जाती पैंट, भूख के वजह से .....
बहुत जोड़ तोड़ कर स्पाइसजेट का
सुपर इकोनोमी टिकट हासिल करते हैं
और फिर, अगले छह साल तक
हवाओं मे उड़ते हुए बादलों की ओंट से
खुद को हिलता महसूस करते हैं
आखिर ऊपर से बादल देखना भी है न सुखकर
चलो
कुछ कल्पनाशीलता.. बेवजह ही..
मन में ही चित्र खींच कर
जिंदगी के पन्नो पर अतिरेक रंग
भरने का नाटक तो करते हैं हम !
आखिर जिंदगी जीना भी तो जरूरी है !!
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आखिर जिंदगी जरूरी है, चाहे जैसे भी