जिंदगी की राहें

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Monday, May 18, 2020

समर्पित कविता



क्या लिखी जा सकती है
कविता
जो हो तुम्हे समर्पित
जिसके शब्द शब्द में
तुमसे जुड़ा हर एहसास हो समाहित

जैसे, बहती नदी सा
कलकल करता बहाव
और दूर तलक फैली हरियाली
अंकुरण व प्रस्फुटन की वजह से
दे रही थी
सुकून भरी संतुष्टि

पर वहीं
समुद्र व उसका जल विस्तार
बताता है न
सुकून से परे
जिंदगी का फैलाव,
ज्वारभाटा की सहनशक्ति सहित
जैसे मस्तिष्क के भीतर
असंख्य नसों में
तरंगित हो बह रहा हो रुधिर ।
समुद्र की लहरों के एहसास सी तुम
और, तट से अपलक निहारता मैं ।

बसन्त के पहले की
सिहराती ठंडी पछुआ बयार
और फिर आ जाना पतझड़ का
मन तो कह ही उठता है न
उर्वर शक्ति हो चुकी है
बेहद कम
पर, रेगिस्तान में
जलते तलवों के साथ
बढ़ते चले जातें हैं दूर तलक
होता है दर्द तो
महसूसता हूँ मृग मरीचिका सी तुम को
और फिर आ ही जाता है
खिले फूलों की क्यारियों से सजा बसंत

जिंदगी देती है दर्द
ये समझना कुछ नया तो नहीं
पर ये भी तो मानो
कि, तुम्हारी चमक
जैसे पूनम के चाँद को देख कर
लगी हो, स्नेहसिक्त ठंडी छाया
और फिर
बंद आँखों के साथ
बालों में फेर रही हो तुम उंगुलियां !

सुनो ! नींद आ रही है !
कभी कभी जल्दी सोना भी चाहिए

~मुकेश~


Sunday, October 25, 2015

पहला प्रेम



पहला प्रेम
जिंदगी की पहली फुलपैंट जैसा
पापा की पुरानी पेंट को
करवा कर आल्टर  पहना था पहली बार !
फीलिंग आई थी युवा वाली
तभी तो, धड़का था दिल पहली बार !

जब जीव विज्ञान के चैप्टर में
मैडम , उचक कर चॉक से
बना रही थी ब्लैक बोर्ड पर
संरचना देह की !
माफ़ करना,
उनकी हरी पार वाली सिल्क साडी से
निहार रही थी अनावृत कमर,
पल्लू ढलकने से दिखी थी पहली बार!!

देह का आकर्षण
मेरी देह के अंदर
जन्मा-पनपा था पहली बार
हो गया था रोमांचित
जब अँगुलियों का स्पर्श
कलम के माध्यम से हुआ था अँगुलियों से
नजरें जमीं थी उनके चेहरे पर
कहा था उन्होंने, हौले से
गुड! समझ गए चैप्टर अच्छे से !

मेरा पहला सपना
जिसने किया आह्लादित
तब भी थी वही टीचर
पढ़ा रही थी, बता रही थी
माइटोकॉंड्रिया होता है उर्जागृह
हमारी कोशिकाओं का
मैंने कहा धीरे से
मेरे उत्तकों में भरती हो ऊर्जा आप
और, नींद टूट गयी छमक से!!

पहली बार दिल भी तोडा उन्होंने
जब उसी क्लास में
चली थी छड़ी - सड़ाक से
होमवर्क न कर पाने की वजह से
उफ़! मैडम तार-तार हो गया था
छुटकू सा दिल, पहली बार
दिल के अलिंद-निलय सब रोये थे पहली बार
सुबक सुबक कर!
जबकि मैया से तो हर दिन खाता था मार !

मेरे पहले प्रेम का
वो समयांतराल
एक वर्ष ग्यारह महीने तीन दिन
नहीं मारी छुट्टियां एक भी दिन!!

वो पहला प्रेम
पहली फुलपैंट
पहली प्रेमिका
खो चुके गाँव के पगडंडियों पर
हाँ, जब इस बार पहुंचा उन्ही सड़कों पर
कौंध रही थी जब बचकानी आदत! सब कुछ
मन की उड़ान ले रही थी सांस
धड़क कर !!
--------------
कन्फेशन जिंदगी के ....


(ये कविता प्रतिलिपि के ऑनलाइन साईट पर प्रतिलिपि कविता सम्मान के लिए चयनित हुई है, पहला प्रेम (मुकेश कुमार सिन्हा) इस लिंक पर जाकर लाइक/कमेंट/रेटिंग/शेयर करें, .........इन्तजार रहेगा !!


Sunday, August 3, 2014

प्रेम कविता

एक तरुणी ने
अपने प्रेमी के कानों में
की सरगोशी ....
क्या तुम सचमुच मेरे प्रेम में हो ?
अगर हाँ, तो 
क्या मेरे लिए लिख पाओगे कविता ?

अरे ये कौन सी बड़ी बात
प्रेमी ने सोचा-समझा
युवती के आँखों में झाँका
कलम से रंगे कुछ पन्ने
जो फाड़ कर फेके गए
फिर, अंत में उसने चूमा
प्रेयसी का हाथ
लिख दिया उसके हथेली पर ही
मेरे अंतस से आ रही आवाज
मैं तुमसे करता हूँ प्यार !
खुद से ज्यादा !!

प्रेमिका की डबडबाई आँखे 

बोझिल मुंदी पलकों के साथ
समेटा खुद को, उसके बांहों में
बाँधी मुट्ठी अपने हथेली की
चिपका कर उसे सीने से
बोल उठी लरजते हुए
अंग्रेजी के तीन लफ्ज़
लव यू टू !!

उफ़! क्या प्रेम का सम्प्रेषण व
बहते दिल के उद्गार से
बेहतरीन, हो भी सकती है
कोई प्रेम कविता??

प्रेम सिक्त चार आँखें
और, चार हाथ
बस हो साथ साथ
खुद-ब-खुद रच जाती है
प्रेम कविता !!!!
---------------------
क्या बन पायी प्रेम कविता ?



Monday, March 14, 2011

छज्जे छज्जे का प्यार

[पिछले दिनों "जी टीवी" पर के धारावाहिक "छज्जे छज्जे का प्यार" कि शुरुआत हुई, बस देखते देखते तुकबंदी सी कुछ बना दी है...अब आप लोग भी झेलें..........:)]



बड़े से और बड़े होते शहर

पर सिमटती हुई जमीन
जिस कारण कम होते घर
एक आम कोलोनी के घर.
अतृप्त प्रेमी-प्रेमिका के बाँहों जैसे
एक दूसरे में आलिंगनबद्ध 
जिस कारण संकरी से संकरी होती गलियां
जैसे हो गयी हो लखनऊ की  भूलभुलैया..

फिर इन घरों के छज्जे '
नए नवेले जोड़ो की  तरह
हर दूसरे  छज्जे को 
स्पर्श करने के लिए बेक़रार
इन्ही छज्जो पे सूखते कपडे 
तो सूखती बड़ियाँ और अचार 
कभी मर्दों के अर्थशास्त्र की  बहस
चाय की  चुस्कियों के साथ
तो कभी बीबियों के हाथ की सूखती मेहँदी...
और साथ में शिकायतें और गप्पे हजार..
या फिर बच्चो की हुड -दंग
जो अंततः कभी कभी बन जाता जंग-ए-मैदान  !!

पर इन सबके अलावा
कभी कभी इन छज्जो से मिल जाती है 
सोलह की छोरी तो अठारह का छोरा 
और दो जोड़ी बेक़रार आँखें
किताब या कपड़ो की  ओट  का सहारा लेकर 
पर इस डर में भी दीन-दुनिया से अलग
सिहर जाते  है दो शरीर..
पनप उठता है प्यार....
जो दिल से होते हैं बेक़रार..
ऐसा है छज्जे छज्जे का प्यार........
प्यार......
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