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Monday, June 23, 2008

~:वक्त:~


छिछोरापन, आवारागर्दी, उद्दंडता...
यही तो करने लगे हैं,
आज के कुछ युवा
साथियों! इन्हें समझाने को वक्त आ चूका है...........

दे रहा, आम आदमी को मूक दर्द
जब आवाज दर दर
अब भी, अगर हम सब चुप रहे
तो आने वाला वक्त क्या कहेगा.......

खुशियों, उल्लासो को बेरहमी से
बदहवासी व शोक मैं बदला जा रहा है
फिर भी हम नहीं बदल पाए तो
बदलते वक्त को आशियाना क्या कहेगा.........
समय की तकदीर
सिर्फ कलम से लिखी जा नहीं सकती
साथियों! बदलते वक्त को
सँवारने का वक्त आ चूका है..........