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Monday, March 6, 2017

चीटियाँ



जा रही थी चींटियां
गुजर रही थी भरे बाजार से
शायद किसी मिठाई की दुकान की ओर
पर थी पंक्तिबद्ध
हर एक के पीछे एक !
तल्लीनता और तन्मयता से भरपूर
कदम दर कदम, सधे क़दमों से
'रुके नहीं, थके नहीं' के आह्वान के साथ
जबकि कई एक बार
किसी न किसी इंसान ने
कर ही दिया जूतों तले मर्दन
की कोशिश कि टूट जाए अनुशासन
कुछ हो गईं शहीद चींटियों को छोड़
बढ़ रही थीं सभी, ऐसे, जैसे कह रही हों
वीर तुम बढे चलो
सिंह की दहाड़ हो ..!
रुके नहीं कभी कदम
थी कुछ अपवाद इन में भी
लगा ऐसे, जैसे है कुछ में नेतृत्व की क्षमता
तभी तो उनमें से कुछ
लम्बे डगों के साथ
कतारबद्ध बढ़ते चीटियों पर
छलांग कर/फलांग कर बिना पक्तियों को तोड़े
बढ़ रही थीं सबसे आगे।
हाँ,इन्हीं में से कुछ को निकलेंगे 'पर'
इन्हीं फड़फड़ाते परों के साथ
उड़ निकलेंगे जौहर दिखाने की कोशिश के साथ
पल भर में मर कर, गिर कर समझा देंगी ये सबको
घातक है पंखों का फड़फड़ाना!
याद रखना
है अगर नेतृत्व क्षमता
है अनुशासन
है निष्ठा
तो बढ़ते रहोगे आगे
बहुत आगे
बस, फड़फडाना मना है !


गायत्री गुप्ता के हाथों में हमिंग बर्ड