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Tuesday, November 19, 2013

विमोचन : गुलमोहर


                   गुलमोहर - मुकेश कुमार सिन्हा और अंजु(अनु) चौधरी द्वारा सम्पादित 30 कवियों के साझा काव्य संग्रह का विमोचन 16 नवम्बर 2013 को दिल्ली के हिंदी भवन में वरिष्ठ कवि माननीय श्री लीलाधर मंडलोई जी के करकमलों से श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, निदेशक, आकाशवाणी, श्रीमती सुमन केसरी अग्रवाल तथा श्री ओम निश्चल जी की उपस्थिति में संपन्न हुआ। 



                 प्रतिभागी कवियों में से उपस्थित कवियों के काव्य पाठ ने उस सभा को गुलमोहर के रंगों से भर दिया । गुलमोहर के प्रतिभागी रचनाकार हैं : अपर्णा अनेकवर्णा, अरुण शर्मा अनंत, अशोक अरोड़ा , आभा खरे, अनुराग त्रिवेदी, नीलिमा शर्मा, शलिनी रस्तोगी, किशोर खोरेन्द्र, रंजू भाटिया, बोधमिता, उपासना सियाग, नीलु पटनी, दिवेन्द्र सिंह, दीपक शुक्ला, ऋता शेखर, संध्या जैन, महिमा मित्तल, सत्यम शिवम, हुकम चंद भास्कर, गुंजन श्रीवास्तव, नितीश मिश्रा, हरी शर्मा, कमल शर्मा , पवन अरोड़ा, भरत तिवारी, राज रंजन, कुमार जेमिनी शास्त्री, रागिनी मिश्रा, अंजु चौधरी व मुकेश कुमार सिन्हा।



               हिंदी युग्म प्रकाशन के साथ मिल कर पिछले बरस जो मुहीम शुरू हिई थी,  उसकी ये तीसरी कड़ी है । इस से पहले भी अंजु चौधरी और मुकेश कुमार सिन्हा ने मिल कर ‘कस्तुरी’ और ‘पगडंडियाँ’ के नाम से दो कविता संग्रह प्रकाशित किया है, जिस में अधिकतर नवोदित कवियों को जगह दी है। पिछले दिनों इंडिया टूडे के अनुसार “पगडंडियाँ” बेस्ट सेलर भी रही। “गुलमोहर” सारे प्रमुख ई-स्टोर पर उपलब्ध है। 


अशोक अरोरा 
पवन अरोड़ा 

लीला धर मंडलोई 

अनुराग त्रिवेदी 

अंजू चौधरी 

भरत तिवारी  

सुमन केशरी 

अरुण शर्मा अनंत 

कमल शर्मा 

राज रंजन 

नीलू पटनी 

महिमा मित्तल 






























लक्ष्मी शंकर वाजपेयी 















            इक झलक जो मिली उसकी आँखों की चमक बढ़ गयी सौम्य लाल सा रूप था उसका और गुलमोहर की पखुरियाँ और केसर भी मन को छू गए जब 'गुलमोहर' हाथ में आई, मानो जीवन के अनुभवों की तपती दोपहरी में शान से खड़े रक्ताभ पुष्पों से ढके हुए वृक्ष की तरह बहुत कुछ कह रहा हो... कुछ अपनी .. कुछ जग की... कच्ची मिटटी के घड़े से होते हैं नए कवी.. रचनाकार... मन में अपार भावनाओं.. संभावनाओं का सागर लिए... डूबते उतराते रहते हैं... बहुत कुछ कहना चाहते हैं.. कभी अनुभव.. कभी भाषा-अभिव्यक्ति का कच्चापन वो पैनापन नहीं दे पाता है जिस से एक रचनाकार बेफिक्र हो कर आम्विश्वास से बस लिखे... इन्हें एक मंच मिलने में बरसों भी लग जाते हैं... पर आज ये अनुभव से कह सकते हैं की एक ज़रा सा संबल बहुत सुन्दर परिणाम ला सकता है.. 


















अर्थात अगर कोशिश सही हो, तो बहुत से नए लोग हिन्दी कविता के माध्यम से आगे पहुँच सकते हैं, और यहीं दोनों संपादक द्वय का मानना भी है और ऐसा ये चाहते भी हैं।  हिंदी साहित्य जगत विराट है.. अनेक नक्षत्रों.. तारकों से सुसज्जित, ऐसे सघन वन में 'कस्तूरी' मृग सी शर्मीली, शुरुआत ने 'पगडंडियाँ' को अपने अनुभव और सफलता से सुरभित किया।  और इस बार देखते ही देखते उस पगडण्डी के दोनों ओर 'गुलमोहर' के तरुण-तरुओं की कतार लग गयी। जो धीरे धीरे कलिकाओं से झूम उठी.. और 'गुलमोहर' अपने संपूर्ण प्रस्फुत्तित सौन्दर्य के साथ प्रस्तुत हुयी.. अपनी कविताओं की विनम्र भेंट के साथ...

गुलमोहर 
(साझा कविता संग्रह)
मूल्य : 150/- 
प्रकाशक : हिन्द युग्म 
1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली 

- अपर्णा अनेकवर्णा