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Monday, November 29, 2010

~ : उदगार : ~


३० नवम्बर को मेरी  विवाह वर्षगांठ है, पता नहीं कब और कैसे दस वर्ष बीत गए...पुरे दस वर्ष........!! अपने हमसफ़र के लिए कुछ पंक्तिया जोड़ी है, आपलोगों के समक्ष रखना चाहता हूँ............. )



एक दिन वो आएगी
चुपके चुपके
इतने चुपके से
की न तो होगा रूह को महसूस
न जिस्म को होगी कोई आहट
और हो जायेगा प्यार.....
पर हुआ नहीं ऐसा..

वो आयी जरुर
एक पारंपरिक पारिवारिक अनुमति से
मुहं-दिखाई में
माँ-पापा ने किया पसंद
और फिर मिलने का अवसर मिला
पर क्या यार...........!!!!...
पहले नजर में न हो पाया प्यार

कहाँ गयी वो सिहरन और कहाँ गए वो ख्वाब ....
मेरे खबाबो में थी कोई अनदेखी अनजानी हूर
तभी मिला एक अपने का अपनापन
और उसकी सरल सलाह
सोच को बदलो....
वास्तविकता के धरातल पे उतरो
फिर देखना..

सोच न बदली इतनी जल्दी
और न ही बदल सका मैं
किया उसी ने कुछ किया ऐसा
उड़ गए होश
हुआ मदहोश
मदमस्त होगाया मैं
हो गया मैं उसका
अग्नि के सात फेरों के साथ

याद नहीं फेरों के समय लिए गए वादे
पर फिर भी हूँ में उसका.........
बीते दिन और बीते बहुत सारे बरस
कभी हुए घमासान झगडे
पर कही "था" प्यार इन सब के बीच
दिल के किसी कोने को  था पता
"था" नहीं वो प्यार ''है ''
तब भी था और अब भी है
तभी तो गुजरे इतने बड़े लम्हे
लगते हैं दिन चार..

बहुत बार गुस्से में निकला -
क्यूँ आयी तुम मेरे जीवन
पर अंतर्मन??
सोच नहीं पाता
रह नहीं सकता उसके बिन!!
नहीं जानता क्या होता है प्यार
पता नहीं मुझे है भी उससे प्यार...
या सिर्फ दिखाता भर हूँ
बारम्बार........

पर जो भी है
वो हर पल .
मेरे संसार
मेरी खुशियाँ
मेरे दर्द
मेरे बच्चो
मेरे अस्तित्व
मैं दिख जाती है
बार बार
हर बार...
मेरी हमसफ़र...........
मेरी दुनिया............

XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX


भावनाओं की अभिव्यक्ति पर
दिमाग का पहरा है
यकीन करो मेरा प्यार
आज भी उतना ही गहरा है.
दस वर्ष बीत गए
यूँ देखते -देखते
रास्ते तय हुए
गिरते सँभालते .
तुमने जिस दिन खुद को
सपनो को , भावनाओं को ,
उम्मीदों को, आस्थाओं को ,
मुझे सौंप दिया था ..
उसी पल मैं ''कुछ ''से
''बहुत कुछ ''...हुआ था .
तुम साथ रहना..
मैं सब संभाल लूँगा ..
आज फिर वादा है ..
कोई सपना टूटने ना दूँगा..
तुम्हारा विश्वास आज तक
रंग ले आया है,
ज़िंदगी ने चाहे हमें
जितना आजमाया है ...
तुमने हर हाल मैं साथ निभाया है ..
"अंजू ..."
आज फिर तुमपर
ढेरों प्यार आया है...!!!!
ढेरों प्यार आया है...!!!!


Thursday, November 18, 2010

प्रेम का स्वरुप


जिंदगी बदली
बदली सोच
बदला सम्बन्ध और उसका मूल्य
तभी तो
मन के अन्दर
झंकृत करने वाला
बदला वीणा का राग
पर क्या बदल सकता है
प्रेम या प्यार?
बदल सकता है
उससे जुडी
खुशियाँ अपार?


लेकिन कहना होगा
वो भी बदला...
बदल गयी
प्रेम के लिए
जीने मरने की कसमें
बदला प्रेम से प्रस्फुटित होता
त्याग, प्रतीक्षा, वायदा !!
यथार्थ की धरातल
पर आ पहुंचा प्यार
सपनो की दुनिया बदलकर
दिखने लगी
स्वभिव्कता
दिखने लगा
प्यार के पार की जिंदगी..

अब दैहिक सौंदर्य
और बिताये गए
अन्तरंग क्षण
बदल देते हैं
रूप प्रियतमा का
इसलिए लगता है
बदल गया है
प्रेम का स्वरुप !!

पहले बनते थे
प्यार में ताजमहल
पर बदल गए
वो प्रेम समीकरण..
पहले की तरह
नहीं होता कोई मजनू या राँझा
अब तो कहते हैं
लैला या हीर नहीं तो
कोई और ही आजा...

यहाँ तक की
सांसे भी महसूस करने लगी
सच्चाई
की कोई नहीं
वो नहीं तो कोई और सही..
सच में कितना बदल गया है
प्यार!!
प्यार ही है न.......!!