Followers

Friday, January 23, 2015

फैंटेसी


झील के दूसरे छोर पर
दिखी वो, शायद निहार रही थी जलधारा
पर, मैंने देखा, टिकी मेरी नजर
और.... आह !
वो नहाने लगी 
मेरे काल कल्पित झरने में...
मेरी मन्दाकिनी !!
मन ने कहा
चिल्ला कर कहूँ,
सुनो, ए लड़की इधर तो मुड़ो, देखो न !
इश्श्श, मेरी चिल्लाहट
मौन से भरी मेरी आवाज
पल्लू बन कर ढक रही थी
उसका चेहरा, उसका वक्ष !
धत्त !!
दिन ढल रहा था
पर मैं हूँ कि अटक ही गया
झील के उस किनारे पर
टिकी थी, मैं और मेरी परछाई भी
मैं, जितना उसको नजरों से उघाड़ता
पर, मेरी परछाई ने
बना दिया उसके लिए घर
ताकि न पड़े मेरी बदनजर उसपर!!
खैर जाने दो,
उसकी ख़ामोशी, उसका मौन
पता नही क्यूँ?
मुझ में भर रही अलीशा चिनॉय सी
मदभरी, मस्त सुरीली आवाज
थोड़ी ठहरी.. थोड़ी खनकती सी!!
मैं - वो !
झील व फैंटेसी!!
सब ढलने लगी
आखिर शाम हो चुकी थी !!

Tuesday, January 13, 2015

प्रेम का बुखार


जिंदगी इतनी आसान तो नहीं
जरुरी है ऑक्सीजन व भोजन
प्यास भी लगेगी ही
बिन साँसों के जी सकते हैं क्या
वैसे ही कोर ऑफ़ द हार्ट में
संजोये तुम्हे जी रहें हैं न !!
यानि जीने की बुनियादी जरुरत
मेरे लिए
भोजन, साँसे और यादें !!
सुनहरी वाली !!

याद है,  होने पर बुखार
मैया सुलाए रखती दिन भर
नहीं मिलता खाना तक
कहती पियो बार्ली
फिर वो प्रेम का फीवर
कहाँ था इतना आसान
डिग्री फोरेनहाइट में तरंगित होता अहसास
जलते नंबर टेन सिगरेट का
फ़िल्टर रहित धुंआ
अन्दर तक जला देने वाली क्षमता
फिर एक अजीब सी शांति
श्वांस नली से फेफड़े फिर दिल तक!!

उसकी याद और संजोया प्रेम
प्रेम के ताप से अब तक दहकता बदन
दो जोड़े होंठ
उसके बीच का विधुर्वी चुम्बकत्व
ऐसे जैसे कम्पास सुई को रखो कैसे भी
दिशा उत्तर दक्षिण ही दिखाएगी
है न सच!
वो उत्तर, मैं दक्षिण
बहुत दूर - बहुत पास !!
-----------------
अजब गजब प्रेम का बुखार !!!

Hamming bird on palm :)

Friday, January 9, 2015

छुटकी



बीते कल की तो बात है
जब मेरे नेह का टुकड़ा
मेरी छुटकी
रेत से बनाती थी घरौंदा
कैसे पलक झपकते ही
हो गयी मुझ सी बड़ी
अब वो जूझती है
समुद्री लहरों से
दिखाती है हर दिन
अन्दर की जद्दो जहद
करती है सामना, डट कर
परेशानियों का, कठिनाइयों का
मेरी सोन परी, मेरी बच्ची !!

बीते कल की तो बात है
जब तुतलाती हुई कहती थी
मम्मा!! उस पप्पू ने मारा
और मेरे ढाढस बंधाने पर
रुआंसी हो, हो जाती थी चुप
अब हर दिन, करती है सफ़र
जलती आँखों से ही कंपकंपा देती है
सामने वाले को, अगर करे स्पर्श
स्पर्श नहीं, बद-स्पर्श
मेरी छुटकी !! मेरी सिंहनी !!

बीते कल की तो बात है
मैंने फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता के लिए
बनाया था उसे ‘राधा’
छमक कर कह उठी थी वो,
मम्मा! मेरा किशना आएगा कब ?
देखो आ ही गया न वो समय
मिलने ही वाला है
मेरी लाडो को
हमसफ़र !
उसका अपना, उसका किशना !
मेरी सुंदरी! मेरी लाडो !!

मेरी बिटिया,
मेरे दिल का टुकड़ा
मिले तुम्हे तुम्हारा अपना
वो विस्तृत प्यारा सा आकाश
जिसकी है तुम्हे चाहत
जो हो सिर्फ तुम्हारा
ऐसी है शुभकामना !!
_____________________
एक माँ के ओर से बेटी के लिए शुभकामनायें :)
मेरी कलम से !!


Thursday, January 1, 2015

हाशिये पर हर्फ़


तकिये को मोड़ कर
उस पर रख लिया था सर
टेबल लैम्प की हलकी मद्धिम रौशनी
नजदीक पढने वाले चश्मे के साथ
गड़ाए था आँख 
“पाखी” के सम्पादकीय पर !!
हाशिये पर हर्फ़
समझा रहे थे, प्रेम भरद्वाज
उन्हें पागल समझने के लिए
हैं हम स्वतंत्र
क्योंकि वो करते हैं दिल की बात !!
तभी अधखुली खिड़की से
दिखा रुपहला चमकीला चाँद
हाँ ठण्ड भी तो थी बहुत
लगा कहीं कम्बल तो नहीं मांग रहा !
या फिर, शायद वो ही निहार रहा था
मेरी ओर,
आखिर क्यों कम करूँ खुद की अहमियत !
आखिर सोचना ही है तो
क्यों न सोचें की
चाँद ही बन जाए हमदम !! हर दम !!
फिर टिमटिमाते तारों से भरा
ये काला आकाश
और उसमे एकमात्र प्यारा सा चाँद
जैसे छींट वाला कम्बल ओढ़े
निहार रही थी “तुम”!!
उफ़ ये हाशिये के हर्फ़
तुम्हारे साथ हो जाएँ
शब्दों के हर्फ़
दिल की गहराईयों से जुड़ जाएँ
काश आभासी ही सही
हमसफ़र हो जाएँ 
--------------------
वैसे ही जुड़ते चले गये हर्फ़


Tuesday, December 23, 2014

पुरुष मन और ये मछलियाँ


ओये ! सुनो !
पता है, कल की रात हुआ क्या ?
था, सोया
तभी कान के पोरों पर
लिपिस्टिक का दाग बन गया !
उठा चिंहुक कर !!
इस्स! चारों ओर से,
था घिरा, तैर रही थी मछलियाँ !!

तैरते हुए सो रहा था मैं
ठंडी जलधारा में !
चारों और घूम रही थी
मछलियाँ !
हाँ, सिर्फ मछलियाँ
फैशनपरस्त मछलियाँ !!

सबने लगा रखी थी लिपिस्टिक
गलफड़े थे हलके रंगीन
कुछ ने पहने थे जींस
जो थे घिसे हुए, स्टाइल वाले जींस
तो कुछ थी, अधोवस्त्र में, ऐसे कहो स्विमिंग सूट में
कुछ थीं, बुर्के और साड़ियों में भी !!

समझ नहीं आ रहा था
मैं था, उनके उदरपूर्ति का साधन
या वो थीं
मेरे मनोरंजन का साथन !!
तैरती हुई मछलियाँ
कर रही थी कैट-वाक
कर रही थी अठखेलियाँ !!

पानी के अन्दर भी
खुल चुकी थी मेरी सपनीली आँखे
मेरा पुरुष मन
हो रहा था अचंभित और उत्तेजित !
मुझे दिखने लगी थी
मसालेदार तली हुई मछलियाँ
मेरी ही नजरें तलने लगी थी उनको !!

नजर के अलाव ने
आखिर पका ही दिया था उनको
अठखेलियाँ करती मछलियाँ
कब परिवर्तित हो कर दिखने लगी
प्लेट में सजी मछलियाँ
ये पता न चला ....... !!
और भोर हो गया !!
_____________
ये पुरुष मन और ये मछलियाँ !!


Tuesday, December 16, 2014

सुन रहे हो पकिस्तान !


वर्षों का अंतहीन दर्द झेला
माँ रूपी भारत वर्ष ने
और तुम कपूत 'पाकिस्तान'
जन्मे थे न 1947 में ...

जन्म के समय ही दी थी  तूने
असहनीय दर्द और पीड़ा
जिसको ता-जिंदगी झेल रही
तेरी माँ !! ये भारत माता !!

तुम्हारा जन्म नहीं था
एक सामान्य प्रक्रिया
सिजेरियन सेक्शन ही कहेंगे न
इस नए देश के बनने की प्रक्रिया को

सर्जरी से बनी
एक माँ की नाभि के पास
उस समय बनी रेडक्लिफ लाइन
आज तक दे रही दर्द व दंश

और तुम पाकिस्तान
आवारा, बदतमीज बच्चे की तरह
माँ के दर्द पर खिलखिलाते हो
तोड़ते हो हर पल
माँ का विश्वास और  गुरुर

धर्मान्धता की आड़ में
पता नहीं क्यों खेलते हो खेल
छलते हो,  करते हो
तोड़ने की कोशिश अपने ही भाई का हाथ

स्वर्ग जैसे कश्मीर पर
करते हो खून के छिंटो की बौछाड़
फिर भी कहाँ रहता है तुम्हे चैन
हर दिन दिखाते हो नया खेल

लो, अब भुगतो ! करो बर्दाश्त !
झेलो
समझो !!
कितना असहनीय होता है
वह दर्द
वह कराह
जब जाती है जान
नन्हो की,
सोचो उन माओं के लिए, जिनकी औलादें थी
इस सब का कारण तुम हो पाकिस्तान !!

पाकिस्तान !!
अब भी तेरी माँ, नहीं देगी बद्दुआयें !
बस संभल सकते हो तो संभल जाओ
नहीं तो ...
मरोगे तुम, नम होगी आँखे हमारी !!
सहोदर हो तुम, पाकिस्तान !!

पाकिस्तान !!
सुन रहे हो !
जियो और जीने दो !! प्लीज !!
अच्छा लगेगा !!
________________________
दिल से श्रद्धांजलि उन नन्हों के लिए .......... !!


Sunday, December 7, 2014

समझिये, आप प्यार में हैं !!


कभी अगर
ड्रेसिंग टेबल के सामने
उल्टा जैकेट पहन कर खुद को निहारें
और ढूंढें स्मार्टनेस
तो समझिये आप प्यार में हैं !
कभी, जब
मेट्रो का वेट करते हुए स्टेशन पर
सामने आ कर मेट्रो लगे, दरवाजा खुले
फिर बंद हो जाये
और आप सिर्फ हलके से सर खुजाएँ, और मुस्काएं
तो समझिये आप प्यार में हैं !
कभी खाने के टेबल पर अगर
खूब तीखें खाने को खाते हुए भी
लाल डबडबाते आँखों के साथ मुस्कुराते हुए,
कह दें, लाजबाब खाना, सामने वाले के आँखों में झांकते हुए
तो समझिये आप प्यार में हैं !
कभी कॉलेज में
मैडम पढ़ा रही हो केमिस्ट्री
और आप एक दम से चिल्ला कर कहें
यस सर, प्रेम पर कविता लिख कर दिखाऊं
तो समझिये आप प्यार में हैं !
आखिर प्यार व पागलपन
एक ही रास्ते में पड़ने वाला
है दो लगातार पडाव
पागल कहना, करेगा अचरज
इसलिए मान लीजिये
या समझिये आप प्यार में हैं !!!