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Tuesday, May 23, 2017

स्किपिंग रोप: प्रेम का घेरा





स्किपिंग रोप
कूदते समय रस्सी
ऊपर से उछल कर
पैरों के नीचे से
जाती है निकल 
जगाती है
अजब सनसनाती सिहरन
एक उत्कंठा कि वो घेरा
तना रहे लगातार
एक दो तीन ... सौ, एक सौ एक
इतनी देर लगातार !!
बैलेंस और
लगातार उछाल का मेल
धक् धक् धौंकनी सी भर जाती है ऊर्जा!
जैसे एक कसा हुआ घेरा
गुदाज बाहों का समर्पण
आँखे मूंदें खोये
हम और तुम !!
उफ़, सी-सॉ का झूला
अद्भुत सी फीलिंग
साँसे आई बाहर, और रह गयी बाहर
ऐसे ही झूलते रहा मैं
तुम भी ! चलो न !
फिर से गिनती गिनो, बेशक ...
बस पूरा मत करना !!
काश होती वो रस्सी थामे तुम और
.....और क्या ?
मैं बस आँखे बंद किये बुदबुदाता रहता
एक दो तीन चार पांच...............निन्यानवे ...........एक सौ तेरह ...!!

Thursday, May 11, 2017

लजाती भोर



सुखी टहनियों के बीच से
ललछौं प्रदीप्त प्रकाश के साथ
लजाती भोर को
ओढ़ा कर पीला आँचल
चमकती सूरज सी तुम
मैं भी हूँ बेशक बहुत दूर
पर इस सुबह के
लाल इश्क ने
कर दिया मजबूर
तुम्हे निहारने को !!
_______________
सुनो ! चमकते रहना !


Saturday, April 22, 2017

जिंदगी में फड़फड़ाता अखबार

दो न्यूज पेपर - एक हिंदी व एक अंग्रेजी के
एक रबड़ में बंधा गट्ठर
फटाक से मेरे बालकनी में
गिरता है हर सवेरे
मुंह अँधेरे !
हमारी जिंदगी भी
ऐसे ही हर दिन सुगबुगाती
लिपटे चिपटे चद्दरों में बंधे
चौंधाई आँखों को खोलते हुए
अखबार का रबड़ हटाते हैं
और छितरा देते हैं बिछावन पर
जैसे स्वयं छितर जाते हैं
चाय से भरे कप के साथ
हमारे बीच का संवाद
रहता है
कभी हिंदी अखबार सा
प्रवाह में पिघलता हुआ तो
कभी अंग्रेजी सा
सटीक व टू द पॉइंट
आदेशात्मक
हर नए दिन की शुरुआत
अखबार के हेडिंग की तरह
मोटे मोटे अक्षरों में
बिठाते हैं मन में
आज फलाना ढिमका कार्य
जरूर सलटा दूंगा
और देर नही हो सकता है अब!
पर
कुछ मर्डर मिस्ट्री वाले न्यूज़ की तरह
कोई न कोई
अलग व अजीब सा कार्य
टपक ही पड़ता है हर दिन
तो, अख़बार के संपादकीय की तरह
होता है अहम
जिंदगी में भी अर्द्धांगिनी के
दिशा निर्देश!
मन तो भागता है
साहित्यिक पुनर्नवा या
स्पोर्ट्स पेज पर
लेकिन दाल चावल की महंगाई
व कम आमदनी
खोल देता है
व्यापारिक परिशिष्ट या
बिग बाजार जैसे सेल के प्रचार का पृष्ठ
मैन विल बी मैन
बेशक न पढ़े अंग्रेजी समाचार पत्र
पर उसके सिटी न्यूज और
कलरफुल पेज थ्री
चेहरे पर भरते हैं रंग
तो अखबार और जिंदगी
दोनों ही कभी होते हैं तह में
सब कुछ परफेक्ट
तो कभी फड़फड़ाते दोनों
रहते हैं गडमगड
लेकिन एक अंतिम उम्मीद
जिंदगी रद्दी अख़बार सी
कबाड़ न बन कर रह जाए
बस अंत होने से पहले
बेशक ठोंगे या पैकिंग मटेरियल बन कर ही
उपयोगी बन दिखाएँ
काश मेरी जिंदगी ख़त्म हो कर भी
रीसाइकल्ड हो जाए


Tuesday, April 11, 2017

APN न्यूज़ पर म्यूजिकल शो "मेरा भी नाम होगा"


"टेक रीटेक, साउंड कैमरा म्यूजिक, हाफ स्केल ऊपर-नीचे"

हाँ तो कुछ ऐसे शब्दों से वास्ता पड़ा, जब APN न्यूज़नेटवर्क के नोएडा सेक्टर 68 स्थित शानदार स्टूडियो में उनके आगामी म्यूजिकल रियलिटी शो "मेरा भी नाम होगा" के पहले राउंड के लिए होने वाले सुरोत्सव हेतु मैं भी एक क्रिटिक ज्यूरी के रूप में उपस्थित था |

APN विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और पूर्वांचलके दर्शकों के बीच अपने ख़ास जुड़ाव के लिए उस क्षेत्र के दर्शकों के लिए बेहद लोकप्रिय श्रेणी के टीवी चैनल में अपना स्थान रखता है | APN खबर के साथ साथ अन्य सांस्कृतिक माध्यम के द्वारा जनजागृति में अपना योगदान बराबर देता आया है | और इसी अभियान के एक कड़ी के रूप में इस न्यूज़नेटवर्क ने अब पूर्वांचल की माटी की सौंधी सुंगंध वाले भोजपुरी लोकसंगीत के माध्यम से भी जनचेतना जगाने हेतु एक अनूठे प्रयास के तौर पर म्यूजिकल रियलिटी शो "मेरा भी नाम होगा" लेकर आयी है | जिसमे म्यूजिकल धुनों के अलावा बिरहा, चैता, कजरी, छठ, निर्गुण गायकी, भजन आदि के माध्यम से सामाजिक सरोकारों से जुड़े विविध कार्यक्रमों पर प्रतिभागियों से ये अपेक्षा की जाएगी की वो सुरों में अपनी बात रखें |



गायिकी के क्षेत्र में बड़ा नाम तृप्ति शाक्या ने जैसे ही इस राउंड का आगाज फिल्म काला पानी के गीत "नजर लागी राजा तोरे बंगले पर....." के साथ दमदार और सुरीली प्रस्तुति के साथ शुरू किया, एक समां बंधता चला गया जो पूरे समय जानदार तरीके से सबकी मेहनत और सुरों को समेटे दीखता रहा | कार्यक्रम के जज के रूप में तृप्ति शाक्या, म्यूजिक डायरेक्टर शेखर त्रिपाठी, स्टैंड अप कामेडियन सिद्धार्थ सागर और दर्शन जी के रूप में विराजमान थे और हर बार इनके कमेंट्स सुनकर ऐसा लग भी रहा था कि जजों से जो अपेक्षा रहती है उससे जरा भी कमतर नहीं हैं ये |


क्रिटिक ज्यूरी के तौर पर मिडिया से हिन्दुस्तान के सीनियर एडिटर विशाल ठाकुर, शायर जुनैद खान और एक कवि/ब्लॉगर के रूप में मैं उपस्थित था | इंडियन आयडल फेम रवि त्रिपाठी और न्यूज़ एंकर अभिलाषा ने मंच सञ्चालन के लिए जो समा बाँधा, वो उल्लेखनीय है, रवि ने अपने सुरों के साथ और अभिलाषा ने अपने शब्दों की बाजीगरी के साथ दर्शकों को बांधे रखने की बेजोड़ कोशिश की !!बैक स्टेज पर मनीष और सोनाक्षी अपने कार्यों के साथ दिख रहे थे, कि मेहनत करनी पड़ती है, एक प्रोग्राम के सक्सेस के लिए | मैंने अपने वक्तव्य में एक दम से कुछ सुनी सुनायी पंक्तियों को ही तोड़ मरोड़ कर एक पंक्ति कही जो दिल की बात थी :
".....मैंने चाहा ही नहीं, वरना हालात बदल सकते थे
मैं तो चुप ही रहा वरना खुशियों होंठों से छलक सकती थी
मैं तो रुका ही रहा झील की तरह, बहता तो निकल सकता था दरिया के तरह .........
..........हाँ, चाहत होती तो अपने समय में मैं भी तो कह सकता था "मेरा भी नाम होगा"  |"

प्रतिभागियों के रूप में अलग अलग जगहों से आये हुए युवक/युवतियां और एक नन्ही परी भी उपस्थित थी | कौशलेन्द्र, शुभम, आव्या, मुस्कान, रितेश, श्रेया, अमन, राहुल और आशुतोष ने बखूबी अपने गायकी से ये दिखाने की कोशिश की कि क्यों वो "मेरा भी नाम होगा" में आये हैं, और वो क्यों चाहते हैं कि उनका नाम हो | हर गायक/गायिका अपने परफोर्मेंस के साथ सर्वश्रेष्ठ था | इन युवाओं के लिए कुछ पंक्ति कहना चाहूँगा, याद रखना बच्चो :)
मिटटी पे धंसे पाँव
देते हैं आधार
देते हैं हौंसला
देते हैं पोषण

हमने संगमरमर पर
बराबर फिसलते देखा है
नर्म पांवों को ... !

स्टैंडअप कामेडियन सिद्धार्थ सागर ने भी कुछ देर के लिए अपने जलवे से एक अलग छटा बिखेरी, ये देखना की उन्हें भी म्यूजिक के साथ गजब का लगाव है, अच्छा लगा, क्योंकि हार्मोनियम के साथ उन्होंने वडाली बंधुओं की शानदार आवाज निकाली |

कुल मिला कर एक शानदार एंटरटेनमेंट पैकेज जो सामाजिक सरोकार से जुड़ा होने के बावजूद कभी भी नीरस नहीं लगा, पूरा प्रोग्राम एकदम शानदार ग्रिप में कसा हुआ था, और मेरी उम्मीद कहती है, एक ब्लॉक बस्टर शो का आगाज बस होने ही वाला है ......! अगर मैं समीक्षक भी होता तो इस शो के लिए अभी से पांच में साढ़े चार स्टार तो दे ही सकता हूँ !!






Monday, April 3, 2017

खास उम्र की महिलाएं



उम्र की एक निश्चित दहलीज
पार कर चुकी खुबसूरत महिलायें!!
उनके चेहरे पर खिंची हलकी रेखाएं
ऐसे जैसे ठन्डे आस्ट्रेलिया के
'डाउंस' घास के मैदान में
कुछ पथिक चलते रहे
और, बन गयी पगडंडियाँ
ढेरों, इधर उधर
पथिकों की सुविधानुसार !!
चलते चलते थकी भी, रुकी भी
अपने पैरों पर चक्करघिन्नी काटी
और, बस चेहरे पर बन गए, कुछ अजूबे से
गड्ढे, डिम्पल ही कह लो !!
क्या जाता है
लटें उनकी
कुछ बल खाती काली, तो कभी सुनहरी
आ कर गिरती हैं चेहरे पर
जैसे हरीतिमा और
उनमे कुछ सुन्दर लाल या सफ़ेद जंगली फूल
यूँ तो उम्र हर एक की होती है
पेड़ जो ठूंठ बन कर सो रहे
या जो हरी पत्तियों और चमकीले फूलों संग लह लहा रहे !!
कभी देखा है ?
सूखे ठूंठ संग ली गयी सेल्फी
लगती है न मन को भली !!
समझ गए न !!
वैसे भी एंटी एजिंग क्रीम का जमाना है
फिर बरगद जितना पुराना उतना छायादार!
ये खास उम्र की महिलाएं,
होती हैं अपने में परिपूर्ण
चाहें तो समेट ले अपने में,
करा दे खुबसूरत सी जिन्दगी का अहसास .!!
पर, होती हैं, संवेदनाओं और मान्यताओं से बंधी
नहीं चाहती उनके वजूद में कोई और खोये
या वो अधर जो लगे हैं सूखने
नहीं हो किसी और के वजूद से गीले !!
एक सच और भी है
इन को भी चाहने वाले करते हैं इन्तजार, बहुत देर तक !!
इन्तजार !! जान तो नहीं लेगा न !!


Tuesday, March 21, 2017

एलोवेरा


हाँ, एलोवेरा के सिंदूरी फूल सी ही 
लगती हो ‘तुम’ 
बिना भीगे प्यार
बिन खाद-दुलार
कंटीले से पौधे में भी 
हरे-भरे अजब से माँसल
पत्तों के बीच
सहज सरल सम्मोहन संग
हर बार जब भी खिली खिली सी
दिखी तुम

औषधि सी तुम
हाँ ज़रा सी तुम
पुरअसर बेजोड़
दिलोदिमाग पर काबिज़
न जाने कब तक के लिए
शायद अब सांस भर
पकी उम्र की दरकार बन
लम्बे समयांतराल में
चमकती हो तुम .....!

सम-विषम परिस्थिति में
बिना जद्दोजहद
एलोवेरा को अपनी है कदर
इसलिये है अपनी फिकर
स्व को स्वीकार कर ही
संभव है परजन हिताय
ज़िंदगी के अभ्यारण्य में
एलोवेरा पुष्प सी प्रेरणा बन
अवतरित होती हो तुम
लम्बी छरहरी चमकीली, आल्हादित कर देने वाली
सिंदूरी रंग में सजी तुम
जीवन की चमक लिये
तुम हाँ तुम ही तो
एलोवेरा की फूल सी तुम

सुनो
यूँ तो हरवक्त नजर नहीं आती
पर, जब भी दिखती हो
छाई सी रहती हो दिलो दिमाग के गलियारे में
वैसे पता तो है ही तुम्हे
फिर भी सुनो
मैं चाहता हूँ
एलोवेरा तुम्हारा वर्चस्व बना रहे
पुष्पित हो
नसों से साँसों तक
दिलोँ से दिमाग़ तक
दुनिया से दुनियादारी तक
हर वक़्त हर जगह ......!!!

Monday, March 6, 2017

चीटियाँ



जा रही थी चींटियां
गुजर रही थी भरे बाजार से
शायद किसी मिठाई की दुकान की ओर
पर थी पंक्तिबद्ध
हर एक के पीछे एक !
तल्लीनता और तन्मयता से भरपूर
कदम दर कदम, सधे क़दमों से
'रुके नहीं, थके नहीं' के आह्वान के साथ
जबकि कई एक बार
किसी न किसी इंसान ने
कर ही दिया जूतों तले मर्दन
की कोशिश कि टूट जाए अनुशासन
कुछ हो गईं शहीद चींटियों को छोड़
बढ़ रही थीं सभी, ऐसे, जैसे कह रही हों
वीर तुम बढे चलो
सिंह की दहाड़ हो ..!
रुके नहीं कभी कदम
थी कुछ अपवाद इन में भी
लगा ऐसे, जैसे है कुछ में नेतृत्व की क्षमता
तभी तो उनमें से कुछ
लम्बे डगों के साथ
कतारबद्ध बढ़ते चीटियों पर
छलांग कर/फलांग कर बिना पक्तियों को तोड़े
बढ़ रही थीं सबसे आगे।
हाँ,इन्हीं में से कुछ को निकलेंगे 'पर'
इन्हीं फड़फड़ाते परों के साथ
उड़ निकलेंगे जौहर दिखाने की कोशिश के साथ
पल भर में मर कर, गिर कर समझा देंगी ये सबको
घातक है पंखों का फड़फड़ाना!
याद रखना
है अगर नेतृत्व क्षमता
है अनुशासन
है निष्ठा
तो बढ़ते रहोगे आगे
बहुत आगे
बस, फड़फडाना मना है !


गायत्री गुप्ता के हाथों में हमिंग बर्ड