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Saturday, November 15, 2014

खुली आँखों से देखा सपना


मेरे कुछ ज्यादा चलते दिमाग ने
एक दिन, लगाई घोड़े सी दौड़
होगा एक दिन
मेरा अपना बनवाया हुआ
स्वयं का ख़्वाबों का घर 
खुद के पैसों से
ख़रीदे हुए ईंट, रेत व सीमेंट का
आभासी, ह्रदय के आईने में
देखा, उसमें कहाँ होगा दरवाजा
कहाँ होगी खिड़कियाँ, रौशनदान भी
गमले रखूँगा कहाँ
ये भी पता था मुझे !!
घर के लॉन में
हरे दूब पर नंगे पाँव चलते हुए
कैसे ओस के बूँद की ठंडक
देगी सुकून भरा अहसास
और तभी, एक गिलहरी पैरों के पास से
गुजर जायेगी
इस्स !! ऐसा कुछ सोचा !
उस आभासी घर के
डाइनिंग टेबल पर बैठ कर
चाय की सिप लेते हुए
खिड़की से दिखते दरख्तों के ठीक पीछे
दूर झिलमिलाती झील के कोने पर
बैठी सफ़ेद फ्लेमिंगो, एक टांग उठाये
कौन न खो जाए उसके खूबसूरती में
आखिर वो मेरे से ही मिलने तो आएगी
माइग्रेट कर के, बोलीविया के तटों से !!
मुझे पता नहीं और क्या क्या सोचा
जैसे बालकनी में
मनीप्लांट के गमले के
हरे पत्ते पर हल्का सफ़ेद कलर
मैं भी उस पत्ते को प्यार से थपकी देते हुए
महसूस रहा था
छमक कर आ रही
बारिश की बूंदों को !!
बहुत सोचने से अच्छी नींद आती है न
फिर ख़्वाबों में खोना या बुनना किसको बुरा लगे
पर, ये प्यारा सा ख़्वाब
फिर, नींद टूटते ही
- पापा!! स्कूल फीस !! आज नहीं दिए, तो फाइन लगेगा !!
______________________________
जिंदगी में कितने सारी उम्मीदें, सोच जवान होती रहती है ....... है न !!

Tuesday, November 4, 2014


धरती पर कहीं स्वर्ग है 
तो सिर्फ यहीं हैं, यहीं है, यहीं है
ऐसा जपने वालों
ए कश्मीर के निवासियों 
पहली बार देखा व झेला तुमने 
भीषण दर्द और विभीषिका बाढ़ की 
पुरे देश की हेड लाइंस में 
फिर से आ ही गए,
चौतरफ़ा छा ही गये
चौकुठे कैमरे के साथ 
गंभीर बैठा मीडीया
उधेड़ रहा अब तुम्हारे
ज़ख़्मों की बखिया
दर्शाते हुए चिंता
घोषित किया गया
इसे राष्ट्रीय आपदा
और तुरंत फुरंत ही पूरा देश
खड़ा है अब तुम्हारे पीछे
हर भारतीय को प्यारा है कश्मीर
आख़िर हमारा है कश्मीर
हमें दिली हमदर्दी है कश्मीर !
आखिर दिल में बसते हो यार
सुन रहे हो न ए-कश्मीर !!
बेशक घाव देते रहे हो, तुम
फिर भी हमें चिंता है तुम्हारी !!

पर कभी तुमने
उस बिहार की बाढ़ विभीषिका पर
हलकी अधमुंदी नजर भी डाली
वही बिहार, जो इस देश का कभी सिरमौर था
वहां हर वर्ष होता है त्राहिमाम
नेपाल से निकलती नदियाँ
लीलती है लाखों जानें
मूक..बिना अखबारों की सुर्खियां बने
लाखों लाशें बह.. गल.. जल जाती हैं
फिर भी बिहार, नहीं होती हकदार
किसी खास पॅकेज का
अनुदान का, संवेदना का
आंसू तक नहीं मिलते, टपकाने वाले
फिर भी ये बिहार, मजबूती के साथ
तुम्हारे साथ खड़ा है, कश्मीर !!

याद रखना कश्मीर
हर बिहारी के दिल में, बसते हो तुम !!
वैसे भी हर बदमाश बच्चे का ध्यान
माँ बाप ज्यादा ही रखते हैं
ऐसा सुनते आये हैं हम .....
करते भी आए हैं हम...
सच ही है न .......!!
कश्मीर!! कभी दिल में बिहार को
बसा कर देखो न .......प्लीज !!
शायद दिख जाए कभी
एक हल्की झलक तुम्हारी,
पीर कहाँ मेरी-तेरी
एक ही तो है हमारी !
---------
काश हम रहे साथ जिए साथ 
हरदम साथ साथ 




Monday, October 27, 2014

बिग बॉस


पता नहीं,
था गहरी नींद में सोया
या कि
था किसी ख्बावो में खोया
यूँ कि एकदम से कड़कती आवाज
कानों में गूंजी

बिग बॉस चाहतें हैं कि
कॉन्फेशन रूम में आयें मुकेश
इस्स चिहुंका मैं
ठिठका मैं
याद नहीं उठा भी की
एवें आँख खुली
या उठा तो किस कमरे में गया मैं?
तभी फिर से वही रौबदार आवाज
गूंजी या समझो चीखी
"मुकेश"
बिग बॉस आपके "हमिंग बर्ड" के
बेस्ट सेलर बनने की बधाई देते हैं...

थैंक यू - बिग बॉस!!
मीठे नींद में सोये - खोये
मुकेश की होंठ बुदबुदाई!
फिर से वही कौंधती आवाज
आप खुश हैं, संग्रह के प्रदर्शन से
हमिंग बर्ड की उड़ान से ?
क्या आपको लगता है
जिन हाथों तक चाहते थे पहुँचाना
उन हाथों तक ये बुक पहुंची...?

एक दम से उड़ गयी नींद
खुद ब खुद आवाज रुंध गयी
भरे गले से मेरी आवाज निकली
जी, उम्मीद से बढ़ कर
मिला रेस्पोंस
पर उम्मीद फिर भी है कायम!!

अब आप जा सकते हैं मुकेश !
मेरे नींद की ठुमकती चिरैया को
एक अनूठे सपने ने उड़ा दिया
पर, मुस्कराहट तैरा दी होंठो पर
इस प्यारी सी हमिंग बर्ड ने...

काश ये सपना भोर का होता
ये सपना सच्चा होता :-)
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मोरल ऑफ़ द पोएम : जो भी इस बेवकूफी भरी रचना को पढ़े वो मेरी हमिंग बर्ड को जरुर पढ़े, जरुर आर्डर करे  :-)
इंतजार रहेगा...... :-)


Tuesday, October 21, 2014

वो आयी थी ......


चाय की ट्रे
दो रखे थे कप
चाय की अंतिम बूंद थी नीचे
एक कप के कोने पर
थी लिपिस्टिक 
एक आध टूटे बिस्किट
और बच गए थे कुछ मिक्सचर
समझे न .
वो सच में आयी थी !

कई बार सोचा
वो जा चुकी
इनको होना चाहिए अब सिंक में
पर हर बार
अलग अलग सोफे पर बैठ कर
महसूसना
अच्छा लग रहा था
वो सच में आयी थी !

उसके जिस्म से
या शायद परफ्यूम जो लगाया था
उड़ने लगी थी उसकी सुगंध भी
फिर से कमरे की वही पूरानी
जानी पहचानी बास
लगी थी छाने
पर मन तो अभी भी
वही उसके
केविन क्लेन के इटरनीटी में
था खोया
अच्छा लग रहा था
वो सच में आयी थी !

मैंने कलेंडर
घडी की सुइयां
मन का कंपन
सोचा सबको रोक लूं
कर दूं स्थिर
ताकि हो सबूत
खुद को समझा पाने का
वो सच में आयी थी ........... न !!

मेरी कविता संग्रह जो हर ई स्टोर पर उपलब्ध है 

Sunday, October 5, 2014

बदलाव की बयार



सबने न सही
अधिकतर ने कहा
रुको थमो देखो
रखो सब्र
करो इंतज़ार
बदलाव की बयार बहने ही वाली है !

हाँ दिखने लगा है सब
चीखने लगे है आज कल
जरुरत से
थोडा ही ज़्यादा
चमकेगा-दमकेगा
दूर से ही देख लेना
बदलाव की बयार बहने ही वाली है !

हो रही है कोशिश
समझौतों की
रंग बदलते कुर्तों के साथ
बेशक हो रहें हैं असफल
तो भी ढोलक की थाप
बदलाव तो लाती है
हाँ कानो में रुई लगाने का
है न आप्शन
ताकि फ़िल्टर ध्वनि
दे पाए सुकून
बदलाव की बयार बहने ही वाली है !

बदलेगी आबादी
बदल जायेंगे गुनाह
होगी एक लम्बी फेहरिश्त
बदलेंगे वादे
बेशक वो हो झूठे व फर्जी
पर उम्मीदें बनी रहेंगी
ताजा! टटका!! मासूम!!!
बदलाव की बयार बहने ही वाली है !

मिल गया मंगल
अब आज मंगल
कल मंगल
मंगले मंगल
बस...
हम सबकी शुभिच्छा
हमारी सारी कामनाएं
बदलते सोच के साथ
होने लगीं हैं तृप्त!!
चिंता न करो
बदलाव की बयार बहने ही वाली है !
------------------
बस ऐसे ही सिर्फ एक कविता !!



Tuesday, September 23, 2014

यश का जन्मदिन


पिछले कुछ दिनों से 
मेरा बेटा 'यश'
कभी कभी 
पहन कर चल देता है 
मेरा चप्पल !!
बढ़ रहा है उसका पैर !!

कभी कभी 
जब खड़ा होता है 
यश मेरे साथ
मेरी ही नजर रहती है
उसकी लम्बाई पर
सोचता हूँ, कब करेगा मुझे पार !!

जब भी उसके प्लेट्स में
रोटियां होती है कम
कह ही उठता हूँ
बढ़ रहे हो,
खाया करो, मेरे से ज्यादा !!

उसके स्कूल्स की कोपियाँ
जहाँ करने होते हैं
पेरेंट्स के हस्ताक्षर
हर बार उसके नाम
"यश कीर्ति सिन्हा" में
'कीर्ति' शब्द पर ठहर जाती है नजर !!

हर बाप की तरह
मेरी भी इच्छा, मुझे भी है इंतज़ार
मेरा बेटा करे नाम
फैले उसका और उसके कारण मेरा यश
चारो तरह हो उसकी कीर्ति !!
सुन रहे हो न रहबर !!
____________________
खूब सारी आशीष !!
(आज मेरे बेटे यश का जन्मदिन है,, जरुरत है आप सबके शुभकामनाओं का )

Thursday, September 18, 2014

प्रेम कविता ....



मोटी !! मत खाया करो भाव
मांसल भरे देह के साथ
हो गयी उम्र तुम्हारी
थोड़ी गोरी ही तो हो
तो, तो क्या हुआ
मुझे तो अभी भी
तुमसे आती है भीनी सी खुशबू
सुरमई रातों वाली
कविता जैसी !!

जब देखो छिटक देती हो
मेरा हाथ
कह देती हो एक पल में
बेशर्म !! परेशान करता है
शरम नहीं आती
पर क्यों नहीं देख पाती
अपनी कजरारी आँखों से
मेरी मदहोश आँखों में
उस ध्रुव तारा से आने वाले
ठंडे प्रकाश जैसा नेह !!
कुछ प्यारी सी बहती हुई गजल जैसी !!

हुंह !! जाओ !!
समझ गया !! नहीं है तुम्हे प्यार व्यार !!
थोड़ी बालपन सी ठुनकन
क्यों न दिखाऊं
आखिर
भींगते आकाशों का सुख
और ठंडी गुनगुनी धुप
दोनों तो रचा बसा है तुममे
गद्य और पद्य दोनों विधाओं का
प्रेम से भरा तुम में !!
पढने दो न ये किताब मुझे
उफ़ कुछ तो कहो
मान जाया करो न
ए प्रेयसी !!
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क्या इसको प्रेम कविता कहेंगे ?

(मेरी कवितायेँ, ऐसी ही हलके फुल्के शब्दों से जुड़ते हुए बनती है ..............ऐसी ही, बहुत सारी आम लोगो से जुडी कविता के लिए आर्डर करें हमिंग बर्ड :)