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Tuesday, April 21, 2015

ढक्कन सीवर का ......



ढक्कन सीवर का
भीमकाय वजन के साथ
ढके रहता है, घोर अँधेरे में
अवशिष्ट ! बदबूदार !! उफ़ !!

जोर लगा के हाइशा !
खुलते ही, बलबलाते दिख पड़े
कीड़े-पिल्लू! मल-मूत्र!
फीता कृमि ! गोल कृमि आदि भी !!

रहो चिंतामुक्त !
नहीं बैठेगी मक्खियाँ नाक पर
आज फिर 'वो' उतर चुका है
अन्दर ! बेशक है खाली पेट
पर, देशी के दो घूँट के साथ
वो आज फिर लगा है काम पर !!

सेठ ! अमीर ! मेहनतकश ! किसान !
सभी अपने मेहनत का शेष
रखते हैं तिजोरी में !

एक लॉकर ये भी
शेष अवशेष का
कर रहा था, बेचारा हाथ साफ़
सडांध और दुर्गन्ध के बीच
चोरों की तरह, नशे के साथ
खाली पेट ! दर्दनाक !!

आखिर भूख मिटानी जरुरी है
है न !
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भूख बहुत कुछ करवाती है !!


Monday, March 30, 2015

पुरुष मन और बच्चियां


छोटी छोटी
नन्ही, खुबसूरत व प्यारी सी बच्चियां !

पार्क में, घर के सामने
खिलखिलाती दौड़ती है
साथ ले जाती मन को
दुनियावी विसंगतियों से दूर
भुला  देती है हर स्याह सफ़ेद!
कुछ पलों के लिए
परियों के देश सा
अहसास देता है ये पार्क
जब चंचल, खुशियों भरी हंसी
ठुनकन व गुस्सा
सब गड्डमड्ड करके
एक साथ खिलती है कलियाँ
और, बच्चियां !!

हाँ! चाहता है मन
भूलूं  उम्र के रंग
भागूं खेलूं उनके संग
जी लूं सतरंगी बचपन!

उफ़, पर ये हर दिन की न्यूज
जिसमे होता है बच्चियों का शोषण व बलात्कार
कलंकित करती छुअन
फिर उनसे उपजते
उनको ही तार तार करते व्यूज
लग ही जाता है ब्रेक स्वयंमेव हाथों में
महसूसने लगता हूँ
नागफनी की टहनियां!!

खुद के हाथ ही लगते हैं ऐसे
जैसे दरिन्दे की लम्बी नाख़ून भरी हो झाड़ियाँ
न न न! ऐसे में लहुलुहान न हो जाएँ
ये बचपन, ये परियां !

दहलता है दिल
फुट पड़ता है ज्वालामुखी कहीं अन्दर! क्यूँ?
हर दिन! हर पल!
दिख ही जाता है खलनायक
खूनी आँखे ! आईने में !!

मर्द हूँ न!
साफ़ नज़र के लिए
आईना पोछने लगता हूँ
ढूंढ़ नहीं पाता रक्त सम्बन्ध
पर ये अखबार
उनके जलते समाचार
जलाते हैं यार !!
 इस जलन ने शायद
आज कुछ हौसला भर दिया
 सच ही तो हो तुम सब
मेरी परियां
हाँ सच ...
मेरी इसकी उसकी सबकी परियां

परों वाली परियां!!
तुम्हारे परों में
इन्द्रधनुषी रंगों में
एक रंग मेरा एक उसका
और एक उसका भी होगा
उड़ो जितना उड़ सको!!
पंखो की ताकत
तुम्हे तुम्हारे आस्मां तक ले जाएगी
खुद को अकेला ना समझना !!
____________________
नन्ही, खुबसूरत व प्यारी सी बच्चियां !


Monday, March 23, 2015

ब्लॉग यात्रा



ऑरकुट के समय, लोगो को देखादेखी 2008 में ही ब्लॉग बना लिया था,  हिंदी का 'ह' भी नही आता था उन दिनों, पर ब्लॉग के नाम "जिंदगी की राहें" के अनुरूप पगडण्डी जैसी राह ही बनती चली गयी!

चूँकि ब्लॉग बना तो पोस्ट भी जरुरी है! और फिर जिस भी ब्लॉग पर उन दिनों नजर पड़ी वो कवितायें ही लिखते थे ! इस वजह  मन में ये धारणा बन गयी की ब्लॉग पर सिर्फ कवितायें ही पोस्ट किये जाते हैं ! हम भी तुकबन्दियाँ जोड़ने लगे ! कुछ मेरे मेंटर या हमदर्द उसपर वाह या बहुत खूब लिखते, सीना चौड़ा हो जाता !

एक बार किसी चर्चा या ब्लॉग बुलेटिन पर मेरी पोस्ट आयी,  हमें तो ऐसे फील हुआ जैसे हंस या पाखी के संपादक मेरे घर से मेरी रचना ससम्मान ले गये हों !!

गिव एन टेक का ज़माना उस समय भी था, कुछ पोस्ट पर सचिन के तरह कमेन्ट का सैकड़ा लग गया !! फिलिंग अशोक वाजपेई जैसी जन्म ले ली !! वो अलग बात है करीब डेढ़ लाख की ट्रेफिक मेरे ब्लॉग पर अब तक है 382 फोलोअर हैं !

हाँ भूल गये, रश्मि दी ने एक कविता 2010 में संकलन में प्रकाशित करवा दी ! :-D साहित्य के पुरौधा ही बन बैठे !!

हाँ सच कहता हूँ, जोड़ तोड़ नही किये, पर हिंदी ब्लोगर का अंतर्राष्ट्रीय सम्मान रविन्द्र प्रभात जी के वजह से 2011 व 2012 में वर्ष के सर्वश्रेष्ठ युवा कवि के रूप में मिला :-) :-D !! हँसते मुस्कुराते रोते सफ़र चलता रहा !

अंजू चौधरी से मित्रता हुई एक अलग रास्ता मिला व देखा ! जिसकी खुद की रचनाओं में ढेरों व्याकरण की गलतियां होती है उसने सह संपादन में कस्तूरी पगडंडीयां व गुलमोहर जैसी तीन साझा संग्रह लाने की गुस्ताखी की ! इनमे करीबन सौ नये पुराने रचनाकार जुड़ चुके! प्रत्येक संग्रह की 500 से ज्यादा प्रतियाँ लोगो के हाथों तक पहुंची!

साला! वो दिन भी आ गया, जो गहरी नींद में देखा करते थे ! 'हमिंग बर्ड' की फुदकन सोलो संग्रह के रूप में सितम्बर में प्रकाशित हुआ! अगर भिखारी को एक हजार का नोट पकड़ा दे तो वो एक एक पैसे का वेल्यु समझेगा ! वैसा ही हुआ जो सोचा नही था वो मिला! हमने भी दोस्ती जिंदाबाद के नारे के साथ ऐसी कोशिश की कि 600 प्रति का पहला संस्करण ख़त्म हो कर पुनर्मुद्रित संस्करण आ चुकी है !! जियो दोस्तों :-)

अब करीब 60 नये पुराने प्रतिष्ठित रचनाकारों के साथ 'गूँज' व 'तुहिन' के नाम से दो सम्मिलित कविता संग्रह इन्फिबिम पर सिर्फ 105 रूपये में प्री बुकिंग पर है जिसका विमोचन 4 अप्रैल को संध्या 5 बजे हिंदी भवन में होना निश्चित हुआ है !! आइयेगा न !!
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"जिंदगी के राहें" के साथ समय समय पर मिलें दोस्तों , तुम्हारा शुक्रिया !

आगे भी साथ चलना प्लीज :-)
जिंदगी की राहें

Wednesday, March 11, 2015

बीडी बनाते बच्चे


मेरे गाँव और उसके आसपास
बीडी बनाते दिख जाते हैं
ढेरों छोटे-छोटे बच्चे
उनकी छोटी-छोटी उँगलियाँ
बड़ी तेजी से 
भर रही होती है
तेदु के सूखे पत्ते में
तम्बाकू !
इतनी तेज तो
वो खा भी नहीं पाते रोटी
झट मोड़ कर सूखा पत्ता
भर कर सूखी तम्बाकू
बांधते हुए धागे से
सहेजते हैं, सजाते हैं
लम्बी लम्बी बीड़ियाँ !
चमकती आँखों से
बताते हैं साथी को
आज बनाई कुल
कितनी सारी बीड़ियाँ !
उन्हें कहाँ पता होता
इससे जलता है फेफड़ा
वो भी बन जाते हैं,
एक्टिव या पेस्सिव स्मोकर
बनाते हुए बीड़ियाँ!
इस फेफड़े को जलाने
की तरकीब को
बनाते बनाते
कब जल उठती है
इन मरदूदों की अंतड़ियाँ
बस लपेटते जाते हैं जीवन
या जाने बीड़ियाँ !!
.........................................................
अंततः !
मासूम बच्चे
जलती बीडी
धुंआ- जिंदगी
तेदु के पत्ते
सबको काल कवलित कर रही है बीड़ियाँ !!




Friday, February 27, 2015

क्लिक क्लिक क्लिक!


क्लिक क्लिक क्लिक!
कैमरे के शटर का क्लिक
तीन अलग अलग क्षण
सहज समेटे हुए परिदृश्य !
पहली तस्वीर
पूर्णतया प्राकृतिक व नैसर्गिक
कल कल करती जलधारा
चहचहाती चिरैया, फुदकती गोरैया
दूर तक दिखती हरियाली
डूबता दमकता गुलाबी सूरज
पैनोरमा मोड़ में
खिंची गयी कैमरे की क्लिक !!
दूसरा था कोलाज
एक ही गौरवर्ण युवती की
बहुत सी तस्वीरों को
हर ड्रेस में थी वो उत्तेजक
चेहरा भरा, आँखे चंचल
नजर आ रहे थे कटाव व भराव
तभी तो बिना फ़्लैश चमकाए
शायद बिना बताये भी
ली गयी थी तस्वीरें
दर्शा रही थी मादकता
कुछ पल को
कैमरा मैन बना था बदतमीज!!
था तीसरे क्लिक में
अम्मा के सीने से चिपका
स्तनपान करता छुटकू सा मासूम बच्चा
पल्लू को हटा कर निहार रहा
दुनिया ........
शायद भर चुका था उसका पेट
तभी तो हलकी मुस्कान के साथ
निहारा उसने
कैमरे के चमकते लेंस को
कैमरे के सेंटर फेस में नहीं थी महिला
न ही उसका उघड़ा बदन
बस दिख रहा था
खिलखिलाता बचपन
और खुश होती माँ!!
तस्वीरें झूठ नहीं बोलती
चाहे जो भी हो
हो उदास या मन हो चंचल !!
एक नन्हा जो
माँ के सुकून भरी बाहों में
भरे पेट के साथ
देख रहा हो सबको
नहीं हो सकता, उससे कोई बेहतर !! बेहतरीन क्लिक!!
___________________________
क्लिक क्लिक! smile emoticon

Thursday, February 12, 2015

क्षणिका


आईने में जब भी देखा 
तेरा अक्स 
लगाया काजल का टीका, 
माथे के बाएं कोने पर
आइने के उपर !
डर था कि कहीं,
नजर न लगे तुम्हे
या चकनाचूर हो जाये
आईना ............ !!
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे .......


___________________________________

पुस्तक मेला !
मेले में हम 
मेले में मैं और तुम 
पढेंगे प्रेम गीत-कविता-गजल 
मैं इस स्टाल 
तुम दुसरे स्टाल !!
दो अनजाने प्यार में .....


__________________________________
हाँ दिखी थी 
नजरें भी मिली 
हाँ, पर दोनों आगे बढ़ गए 
डीवाईडर क्या न करवाए 
चाहतें मिलने की भी थी 
पर बहुत दूर तक
यु-टर्न नहीं था
आखिर कितनी दूर तक जाते ...........
पलटता चेहरा आगे कि ओर देखने लगा ... !!



चंद्रकांत देवताले हमिंग बर्ड के साथ

smile emoticon

Friday, January 30, 2015

तृष्णाओं का अभ्यारण्य


चलो चलें
तृष्णाओं के अभ्यारण्य में
करेंगे शिकार
कुछ दबी कुची, कुम्हलाती
झाड़ियों के बीच से उछलती 
इच्छाओं के बारहसिंघे का
दिन ढलने से पहले !!
वो देखो,
नाच रहे उम्मीदों के मयूर
करें उनका भी आखेट
बांधें निशाना बस चूक न जाएँ
ताकि चमकती उम्मीदों का
मयूर पंख
सुशोभित हो
मेरे घर की दीवार पर!!
उन जंगली फूलों पर
फड़फड़ा रहे,
छुटकू सपनों से
हमिंग बर्ड !
क्या उन्हें भी ??
न ..न !! रहने दो बाबा
हो चुकी अब स्याह रात
झपकते पलकों में
देखने हैं सतरंगे सपने
छोडो इस चिरैये को !!
कल फिर कर्रेंगे वध, इस घने जंगल में
अरमानों के घोड़े पर होकर सवार
भावनाओं के तेंदुएं का
थोडा द्वन्द, थोडा मल्ल युद्ध !!
उसके बाद होगा थोडा दर्द
प्लीज़िंग पेन जैसा!
इसलिए तो बार बार
निकल पड़ता हूँ, प्रकृति की छटा में
सैर के बहाने, लविंग इट यार !
तुम भी चलना !
चलोगे ना, अभ्यारण्य?