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Wednesday, April 27, 2016

कॉम्पन्सेशन अपॉइंटमेंट


गूगल  से
सरकारी ऑफिस की फाइलें भी करती हैं बातें , बेशक अगर सुनो तो..
ठुनकती हैं , मुस्कुराती हैं कभी
पर रो भी पड़ती हैं अक्सर, निराश होकर..

बैठा ही था कार्यालय में,
टेबल पर खुली फाइल में टैग किया आवेदन चमका ...
पिता की मृत्यु के कॉम्पन्सेशन के रूप में...एक अदद नौकरी की आस..

सामने आई रूल्स बुक , ऑफिस प्रोसिज़र और जाने क्या क्या..
रूल्स बुक फुस्फुसाई... ये काम नहीं है आसान...
ढेरों पेचीदगियां, सरकारी ख़ज़ाने में सेंध लगाने जैसी हरक़त...

ना करना पिघल कर ऐसी कोई नोटिंग /ड्राफ्टिंग
जिस से..जगे कोई आस, कोई झूठी उम्मीद

दिमाग के अपने पैंतरे..अरे छोडो भी...
नहीं मिलती तो न मिले नौकरी..हमें क्या..
बेकार की खटर पटर और उलझन क्यूँ झेलना..
सोचते सोचते अचानक निगाह पड़ी ..
सिग्नेचर के कोने में छोटा सा एक धब्बा...
निसंदेह रहा होगा आँसू का क़तरा....

एकदम से आँखों में तैर गया एक मासूम सा चेहरा ..
न पूरा वयस्क न बच्चा, भोला सा युवा..
जिसने खो दी अपने सर की छत्रछाया हमेशा के लिए..
माँ का लाडला,
जिसे खेल कूद की इस उम्र में उठानी थी घर की तमाम ज़िम्मेदारी पिता की तरह...

बेशक कमज़ोर कंधे नहीं हैं सक्षम इस बोझ के लिए...
फिर भी, पिता के फ़र्ज़ पूरे करने हैं उसको ही...
बेशक कंधे में नहीं है दम
पर वन्दे मातरम् !!

लगा ठुनकता हुआ आवेदन कह रहा, कुछ ऐसा करो न
कि,  इस पर लिखा हुआ सिग्नेचर, एक दम से लगे चहकने
खिलखिला कर कर ले सारे काम, और फिर निकल पड़े खेल के मैदान !!

दौड़ने लगी अंगुलियां, टाईप होने लगा नोट
चलने लगा दिमाग, कुछ कूद-फांद ताकि मिले लड़के को नौकरी
चल गयी, फ़ाइल, उसके अन्दर की ताकत से लग गयी दौड़ने
फ़ाइल जो अब तक  नहीं ले पा रही थी सांस
अब भर गयी थी उर्जा के साथ

आखिर आ गया समय ऑफिस आर्डर के टाईप का
अपोइन्टमेंट का आर्डर रिसीव करवा रहा था फ़ाइल चहककर महकते हुए
चलो बंद करें अब ये फ़ाइल, बाँध दे उसका लेस
लगा दें ऊपर वाली अलमारी के रेक में ..............

जा रहा था लड़का नौकरीशुदा होकर....
ओस की बूँद सी पलकों पे अब भी थी...पर मुस्कान के साथ !!!

अभिनव मीमांसा में रंजू चौधरी द्वारा की गयी हमिंग बर्ड की समीक्षा 

Friday, April 15, 2016

"श्री यन्त्र"


सुनो !
आज एकदम से मेरे पर्स से खनक कर
वो ख़ास "श्री यन्त्र" सा सिक्का गिरा
और, गिरते ही छमक कर तेरी यादें भी कुलांचे मारने लगी !

हाँ, बता दूं पहले ही संजो रखा है
अब तक
उस ख़ास "दस पैसे के सिक्के को "

याद है न वो मेरी करतूत !
जिस पर तुम खिलखिलाते हुई कही थी
बेवकूफ, उल्लू - क्या बच्चो सी करते हो हरकत !

एक छोटे चिंदी से कागज के टुकड़े को
दिल के शेप में काटकर
लिखा था तुम्हारा नाम
रेनोल्ड्स के कलम से !
हाँ, मैंने खुद से लिखा था,
तुम्हे तो पता ही था, मेरी हैण्ड रायटिंग
थी थोड़ी खुबसूरत
अब उसको चिपका कर
उस ख़ास सिक्के पर........!

रख दिया था ट्रेन की पटरी पर
दूर से आती आवाज.........कू  छुक छुक !
साथ ही मेरा मासूम धड़कता दिल ... धक् धक्!
और, बस  कुछ पलों  बाद !!

गोल चमकते सिक्के में गुदा हुआ था तुम्हारा नाम !
चंचल सोच  कह उठी - अमर  हो  गयी तुम !
और तब से, वो
पतला  सा  चमकीला सिक्का, तुम्हारे नाम के साथ
है मेरे पर्स में सुरक्षित
तुम्हारे चले जाने के बाद भी !!

आखिर कर दिया था,
दस पैसा कुर्बान मैंने
तुम पर, बिना बताये !

वो तुम्हारी चिढ़न, वो जलन
वो अमूल्य प्यार
और नाम
सब है धरोहर ............पर्स के कोने में !!
___________________
तभी सोचूं ये पर्स इतना भारी क्यों होता है :D


Tuesday, April 5, 2016

ड्रोन

ड्रोन


काश होता मेरे पास भी "ड्रोन"
या ड्रोन जैसा ही कुछ
या बना पाता उसके तकनीक पर ऐसा ही कुछ
कोई यन्त्र या तंत्र !!
बस एक बदलाव होता जरुरी, मेरा ड्रोन रहता अदृश्य !!
मिस्टर इंडिया सा लाल या नील प्रकाश के अलावा न दिखने वाला !!

जो भी होते अपने या होते बेगाने
बिना किसी पायलट या व्यक्ति के
हर टार्गेट के दिल और दिमाग पर  करता फायर
सामने से बेशक दिखता सीज फायर !!
मुस्कान सजाता, और पता लगा लेता !!

पल भर में होता कुछ ऐसा
ड्रोन के चश्मे से दिख जाता उनका
दिल दिमाग है मेरे प्रति कैसा !
उनका मेरे प्रति सोच समझ स्वाभाव या जलन
यहाँ तक कि मेरे से उनकी जगती उम्मीदें भी !

अन्दर ही अन्दर समझ पाता
क्या चल रहा है, क्या सोच रहे लोग
बिना कुछ कहे, बिना मुस्काये या खीज दिखाए
डिप्लोमेटिकली परफेक्ट, आँखे मटकाए
हम भी होते उनके अनुरूप
होते हर एक के करीब ........ !!
शायद हो जाते मशीनी. पर हर के चाहत के अनुरूप !!

याद रखना, जल्दी ही मंगवाऊंगा  "ड्रोन"
अगर तुम सब के लिए हो गया मैं परफेक्ट
तो समझ लेना, आ गया मेरा "ड्रोन"
...........बच के रहना !!
_______________________
ड्रोन चालक रहित विमान है, इसे सुदूर स्थान से नियंत्रित करते हुए इसका  प्रयोग जासूसी करने, बिना आवाज किए मिसाइल हमला करने हेतु किया जाता है




Tuesday, March 22, 2016

दर्द जानवर का...


सुनो

सुन पा रहे हो न
उस घोड़े का हिनहिनाना !

क्या ये किसी
भयानक कालें बादलों का गरजना सा नहीं
ऐसा क्यों सुनायी दे रहा है
जैसे यंत्रणा का कारुण्य संगीत

सच ही तो सुना था
तस्वीरें बोलती है
तभी तो
लहू टपकते टांगो के साथ खड़ा चेतक
पूछ रहा
क्या मिल गया दर्द देने से तुम्हे
ऐसी अमानुषिक हवस, कि चला दिया डंडा
बस, बिना सोचे, बिना समझे
ढोते हुए तुम्हे ही,
थे इन्तजार में, पर
कोमल हरी घास नहीं
खुशियों की झंकार नहीं
दिया तो सिर्फ तिरस्कार
है तो अब बस अशेष करुणा, उम्मीद !!

महसूसा है कभी तुमने
चांदनी रात में एकाएक चल पड़े आंधी
या शांत सागर के किनारे आयी एक सुनामी
या बवंडर ही, या जैसे
प्लेटफोर्म पर धमकती ट्रेन ?

लगता नहीं तुम्हे
तुमने अपने पुण्य के बदले
बड़ी कर ली पाप की गठरी !

तभी तो
तृष्णाओं के इस अभ्यारण्य में,
तुमने
कठोरता की प्रतिमूर्ति बन
सहिष्णुता व प्रेम के बदले
रौंदते हुए जहाज के पतवार सरीखे
चला कर,
लो बह गयी जल घारा
प्रतिश्रुति के रूप में !

स्नेहिल प्रेम को त्याग कर
बन बैठे तुम तो
बदतमीज आक्टोपस!
प्रभुत्व की पराकाष्ठा
या प्रतिहिंसा की आग में
खुश हो न त्राहिमाम कर !!
खुश ही रहना !

चलो करो अभिनय
दिखाओ
खुशियों के दूत बनने का नाटक !

याद रखना,
नाटक एक निश्चित समयांतराल तक ही होती है

सुनो !! दुराचारी मानव !!
कटी टांगों से भी नहीं दे पाऊँगा श्राप
खुश रहना !!

पशु हूँ, पशु ही रहूँगा !!

हो सके तो पश्चाताप के दो आंसू ही कर देना मुझे समर्पित !!
________________________________

पिछले दिनों उतराखंड में एक विधायक ने एक घोड़े को डंडे से मार कर उसका पैर तोड़ दिया, बस कुछ शब्द इस दर्द पर बन पड़े ........ 

शान-ए-भारत - 2016, करनाल 

Sunday, March 13, 2016

ईद मुबारक


सुनो
कल आँखे मिचमिचाते
भोर के किरणों से पहले
जैसे ही उठूं बिस्तर से
सामने हो जाना तुम !!
कल ईद है न
मेरी ईद, सूरज के किरणों सरीखी
तुमसे हो
बेशक सामने फहरा देना अपना आँचल या
लहरा देना जुल्फें
ताकि लगे दूज का चाँद या है सूरज !!
समझी न !!
जल्दी समझ जाती हो !!

ईद मुबारक !!

13 मार्च 2016 के लोकमत समाचार के सभी संस्करणों में मेरे "हमिंग बर्ड" की एक तथ्यपरक सुन्दर समीक्षा प्रकाशित हुई !




Wednesday, February 24, 2016

कवि की डायरी



देखी है कभी कवि की डायरी ?

अधिकतर कवियों के पास होती है
पुरानी, जर्द पन्नो वाली किसी कंपनी की
उपहारस्वरूप प्राप्त डायरी !

शुरूआती पन्ना,  ज्यादातर कवियों का
होता है अम्मा को समर्पित
माँ का लाड़ प्यार, मार-कुटाई, सब घालमेल कर
लिख डालते हैं,  एक मार्मिक रचना !!

फिर, कलम घिसती बढती है
बढ़ता है सफ़र, जिंदगी का,  दर्द का
लिखने लगता है कवि प्यार भरे नग्मे, कुछ पन्नों पर
शेर की छोटी छोटी पंक्तियाँ
छलकता झलकता प्यार,  मनुहार, प्रेम की चाशनी में डूबा !
तुम आना करूँगा इन्तजार जैसा !!

बढ़ते पन्ने, मुड़े तुड़े,
जैसे लिखा हो टूटी कलम से, या स्याही सूखने लगी हो
प्यार में दरार या जिंदगी बन गयी तन्हाई
जिंदगी से पाई बेवफाई
चल पड़ी इस विषय पर कलम,  रक्ताभ स्याही
बेशक हो ज़िंदा कवि, पर उन पन्नों पर मरता है
मर मर कर जी उठता है !

अब, कवि की कलम मेहनतकश बन जी उठती है
लिखता  है  हल,  लिखता  है खेत
भूख, श्रम, श्रम शक्ति सब डालता है कविताओं में
मेहनत, मजदूरी, लाल सलाम, सब सहेजता  है  शब्दों  में
कवि कॉमरेड  बन जाता है  कुछ पन्नों में !

पन्ने उलटते हैं
कवि की कलम होने लगती है वाचाल
स्त्रियों के जिस्म, उतार चढ़ाव
सेक्स, सेंसेक्स, इंडेक्स
कर देता है मिक्सिंग सब कुछ
एक ही रचना में वो चूमता है
और फिर जिस्म से उतरता हुआ
पहुँच जाता है राजनितिक पार्लियामेंट !!

पर, ऐसे पन्ने ही पाते हैं इनाम
आखिर साहित्यिक समीक्षक को भी चाहिए कुछ तो रस !!
अलहदा !!

कवि कभी कभी पन्नों पर लिख डालता है
बलात्कार !!
गिराता है पल्लू, दिखाता है चित्कार तो, कभी अपनी ही जेब के अंदर से,
टपकते पैसों का करता है जिक्र !

कवि की नजर, कवि की कलम, और
उसकी वो पुरानी डायरी
बस, ऐसे ही मुद्दे दर मुद्दे
सहेजता है शब्द, सोच, भाव !!

कुछ शब्द कांपते हैं, कुछ बिलखते हैं
कुछ खिलखिलाते हैं, कुछ रह जाते हैं मौन !

इन सबके बीच, हर कवि ढूंढता है
कुछ कालजयी और श्रेष्ठ !!

पर, ये तलाश बस चलती रहती है
तब तक, या तो भर जाती है डायरी
या फिर कवि पा जाता है अमरत्व !

फिर कुछ श्रद्धांजलि रचना लिखी जाती है उस पर  !!


Thursday, February 18, 2016

प्रेम खिड़की-दरवाजे का


घर के
कुछ दरवाजे और
कुछ से थोड़ी ज्यादा खिड़कियाँ
शायद आपस में कर रहे थे संवाद !!
शायद डेट पर जाने की कवायद या फिर कोई
उच्च स्तरीय बैठक, घर की सुरक्षा पर !!

दरवाजे पर लटका, पूरा कवर करता मटमैला पर्दा
जैसे दरवाजे ने पहन रखा हो स्वीपर का एक रंग का ड्रेस
वहीँ खिड़कियाँ दिख रही थी सजीली स्वप्नीली
एक लम्बा गाउन सा पर्दा,चमकीले कपडे का
लगी थी लम्बी चमकती डोरी भी ...
साथ में आधी खिड़की तक सफ़ेद शिफॉन का पर्दा
जैसे पहना हो उसने स्कर्ट !!

खिड़कियाँ मचल रही था,
शायद हवा चली थी, शायद उसकी चुनरी बलखाई थी
खिडकी के पल्लों ने बाहें फैलाई थी
दरवाजे पर चिटखनी चढ़ी थी
बेचारा बंद छटपटा रहा था
उसके पल्ले ऐसे बंद थे जैसे
बेचारा किवाड़ दोनों बाहों को भींच कर
खिड़की पर चिड़चिड़ाया था

पल भर में शायद कोई हुई वजह
दरवाजे का पल्ला चरमराया
खुल गया किवाड़,
उसका भी पर्दा ऐसे बलखाया
जैसे एक मर्द ने
शर्ट के बटन को खोल अपनी मर्दाना छाती दिखाई

देख कर किवाड़ को, खिड़की मुस्काई
उसके जान में जान आयी
प्रेम सिक्त उसकी बाहें फ़ैली
तभी बाहर से बहार की  फुहारें भी छिटकी
एक घर के अन्दर खिड़की दरवाजे
दोनों की मुस्की,
जैसे लैला मजनू को देख चिहुंकी !!

रात हो चुकी थी,
खिड़कियाँ और दरवाजे दोनों बंद थे,
सुखद सपने में सोये थे, भोर के सूरज के साथ
फिर बाहें फैलाने का वादा कर परदे में लिपटे थे
ये है न .....
खिड़की दरवाजे का ये अद्भुत प्यार
चमक रहा था घर संसार !!
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