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Tuesday, February 9, 2016

बेमतलब की कविता


मिल कर भी न मिलना
कोई सीखे तो तुमसे !!
तुम कहती थी मुझसे !!

साँझ का समय
बेमतलब के दौड़ते
कूदते फांदते
लंगूर से थे थोड़े कम
बेशक तुम समझती थोडा ज्यादा !
खिल्ली उड़ाने में उस्ताद

होते पहने हुए सब कुछ
बल्ला पैड आर्म गार्ड और नहीं क्या क्या
एबडोमिनल गार्ड कोई हाथों में रखता है
किसी ने बताया होगा शायद मुझे
स्पोर्ट्समैन लड़कियों की पसंद होते हैं

मैदान के कोने से
तुम्हारे घर की बालकनी
नजरों का कर्ण बनाते हुए मिलती
इशारे में पूछती कितना स्कोर किये
हम भी झूठे !!
कम से कम तीन या चार बार
दोनों हाथों की दस उँगलियाँ दिखाते
चहकने का इशारा होता
बालों की दोनों चोटियों को दिखाना!
और बदले में बल्ले से इशारा
बल्ले को चूम कर एक लंबा छक्का

कोई नही एक दर्शक के लिए हो जाते
एलन बोर्डर या श्रीकांत !
गली क्रिकेट का सिरमौर !!

बताया झूठ में एक खास दिन
दस बार दोनों हाथ की उँगलियाँ दिखाई
उसको समझ आई सेंचुरी
चोटी के साथ चाय का कप उसने दिखाया
साथ में दिखाया सफ़ेद रुमाल
यानि घर में आओ चाय पी कर जाओ

पर शाम कुहरा चुकी थी
हलके अँधेरे में पास वाले पीपल से
शोर था लौट चुकी मैना व फ़ाख़्ताओं का
हमारा भी दिमाग जागा
हिलाया फिर से लाल रुमाल
हाथों से शो किये बोलिंग एक्शन
यानि मिलेंगे कल पक्का पक्का !!

लिया सिगरेट का लंबा कश
जैसे .......!!
हर बात बोलनी जरुरी है क्या ?

मिल कर भी न मिलना
कोई सीखे तो तुमसे !!
तुम कहती थी मुझसे !!


Tuesday, February 2, 2016

love- calander



पन्ने पलट गए कैलेण्डर के कई बार  !!

दोनों तरह के कैलेण्डर थे सामने
एक में सन्डे मंडे बीत रहा
साथ में बीता जुलाई फिर अगस्त
सेकंड सैटरडे के बाद आया था थर्ड वाला मंडे !!

दूसरा था ठाकुर प्रसाद का पंचांग वाला कैलेण्डर
अमावस्या, फिर दूज का चाँद भी दिखा
ईद का चाँद गया .....
अब उम्मीद बची पूर्णिमा की !.

बीतते समय के साथ
उम्मीद थी, यादें भी दरदरा जायेंगीं
करनी पडेंगी रफू
पर ये क्या
तुम्हारी सारी स्मृतियाँ
अब भी
एकदम चटख ........ और मजबूत!!

याद करो, जब पहले कैलेंडर के दूसरे पन्ने पर
मैंने गोला बनाया था, जब मिले थे हम
क्लास बंक करे कंधे पर बैग लटकाएं
कांपते हाथो से पकड़ी थी उँगलियाँ !!

फिर तुमने उसके 36 दिन बाद का गोला लगाया
बोला अब करो इन्तजार इत्ते दिन

ये हिंदी का छत्तीस वाला आंकड़ा भी गज्ज्बे हैं
बिस्तर पर दोनों सोये,  जैसे घूर रहे हों दीवाल ....

कोई नहीं, आ जाएगा वो  दिन भी....
और फिर पहला बोसा, पहले प्यार का !

कुछ चालाकी भी की, जैसे जेठ कीे पहली एकादशी के दिन का गोला फिर घुमाया
जब चलेंगे हम दोनों .....नदी किनारे घूमने!

दिन महीने साल बदलते जायेंगे ........ सुनाया था याद है न
गाने के दौरान अपने मन माफिक बदल दिया था कैलेण्डर

तुम भी तो थी थोड़ी चालाक
पर तुम्हे मेरे सामने बेवकूफ बन जाने की लग चुकी है लत !!

आखिर प्यार भी तो बेवकूफियां ही है न ...... !!


Monday, January 18, 2016

प्रेम से झपकती पलकें



कैमरा के फोटो शटर के तरह
कुछ नेनो/माइक्रो सेकंड्स के लिए
झपकी थी पलकें !

और इन कुछ क्षणों में
मेरे आँखों के रेटिना  से होते हुए
दिमाग और दिल तक
कब्ज़ा जमा लिया था ......सिर्फ तुमने !!

पता नहीं, कितने तरह की तस्वीरें
ब्लैक एन वाइट से लेकर
पासपोर्ट/पोस्टकार्ड पोस्टर
हर साइज़ की वाइब्रेंट
कलर तस्वीरें,
सहेजते चला गया मन !!

थर्मामीटर के पारे के तरह तुम
एक जगह जमी, ताप के साथ
उष्ण, चमकती बढती हुई ........
"हैंडल
विथ केयर" की टैग लाइन भूला मैं
और हो गया छनाक !!

पारे के असंख्य कण
बिखरे पड़े थे
और हर कण में चमक रही थी तुम !!

सच में बहुत खुबसूरत हो यार !!


Wednesday, January 6, 2016

रूट कैनाल ट्रीटमेंट !!


तुम्हारा आना
जैसे, एनेस्थेसिया के बाद
रूट कैनाल ट्रीटमेंट !!

जैसे ही तुम आई
नजरें मिली
क्षण भर का पहला स्पर्श
भूल गया सब
जैसे चुभी एनेस्थेसिया की सुई
फिर वो तेरा उलाहना
पुराने दर्द का दोहराना
सब सब !! चलता रहा !

तुम पूरे समय
शायद बताती रही
मेरी बेरुखी और पता नही
क्या क्या !
वैसे ही जैसे
एनेस्थेसिया दे कर
विभिन्न प्रकार की सुइयों से
खेलता रहता है लगातार
डेटिस्ट!!
एक दो बार मरहम की रुई भी
लगाईं उसने !!

चलते चलते
कहा तुमने
आउंगी फिर तरसो !!
ठीक वैसे जैसे
डेटिस्ट ने दिया फिर से
तीन दिन बाद का अपॉइंटमेंट !!

सुनो !!
मैं सारी जिंदगी
करवाना चाहता हूँ
रूट केनाल ट्रीटमेंट !!
बत्तीसों दाँतों का ट्रीटमेंट
जिंदगी भर ! लगातार !

तुम भी
उलाहना व दर्द देने ही
आती रहना
बारम्बार !!
आओगी न मेरी डेटिस्ट !!


Monday, December 21, 2015

मेरे गाँव के कुत्ते


मेरे गाँव के कुत्ते
मान लो, उन्हें मिल जाए ऐसा कुछ मौका
कि, शहर  का देशाटन करने पहुंचे वो
मानो न, तो होगा क्या ?
सबसे पहले तो होगा नाम परिवर्तन
वो अब नहीं कहलायेंगे कुत्ता या झबरू या पिल्ला
उन्हें या तो स्ट्रीट डॉग का तमगा मिलेगा या कोई
पशु प्रेम में  पुचकारेगा  डोगी या टाइगर कह कर !!

गाँव में जब होते थे निरीह
तब बिना बंधे भी
किसी एक दरवाजे पर टिक कर भूंकते
करते रखवाली , दिखाते स्वामिभक्ति
बेशक नहीं मिलता वक़्त पर खाना, या मिलता तो
प्रेम सिक्त सुखी रोटी या मालिक का छोड़ा निवाला
हाँ, खाना मिलता जरुर, साथ में प्यार भरी चपत भी !!

बहुतों बार उस कुत्तें ने अपने
गरीब मालिक में भरी थी गर्मी
उस ठन्डे जाड़े की रात में चिपक कर स्पर्श से
बताया था उसने अपने मालिक को हाँ, मैं हूँ तुम्हारा अभिन्न !!

बिना किसी रस्सी , चेन या पट्टे के
बिना किसी ट्रेनिंग के
वो गाँव का कुत्ता सदा रहता अपने मालिक के पीछे
याद करो, सबने देखा होगा, वोडाफोन के एड में !!

मरदूद जैसे ही पहुंचे शहर के किसी मोहल्ले में
कहीं से मिला चिकन का बचा खुचा टुकड़ा
या फिर कभी मिला बचा पकवान
पर हर वक़्त, खाते समय रहती उन्हें चिंता और डर
पीछे से पड़ने वाले वार का, स्टिक का
या फिर कोई सुन्दर बाला कह देती
उफ़, सो अगली!! भगाओ इस स्ट्रीट डॉग को !!

सच ही तो है,
ये विस्थापन, गाँव से शहर का
देता है आसान तरीका पेट भरने का, पोषण का
पर नहीं दे पाता
वो प्यार, वो मिटटी की सुगंध
वो तवज्जो, वो अपनापन !!

तभी तो,
गाँव से शहर पहुंचा हुआ "मैं"
मेरे अन्दर का भूकता कुत्ता !!
विस्थापन के दर्द को झेलते हुए !!
जी रहा है !! जीने देना !!

दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल 2015 में प्राप्त करता "बेस्ट पोएट ऑफ़ द इयर" का अवार्ड

Sunday, December 6, 2015

सफ़र जिंदगी के



सफ़र के आगाज में मैं था तुम सा
जैसे तुम उद्गम से निकलती
तेज बहाव वाली नदी की कल कल जलधारा
बड़े-बड़े पत्थरों को तोड़ती
कंकड़ों में बदलती, रेत में परिवर्तित करती
बनाती खुद के के लिए रास्ता.
थे जवानी के दिन
तभी तो कुछ कर दिखाने का दंभ भरते
जोश में रहते, साहस से लबरेज !!

सफ़र के मध्यान में भी तुम सा ही हूँ
कभी चपल, कभी शांत,
कभी उन्मुक्त खिलखिलता
लहरों की अठखेलियों मध्य संयमित
गंदले नाले की छुवन से उद्वेलित
शर्मसार ...कभी संकुचित
नदी के मैदानी सफ़र सा
बिलकुल तुम्हारे
सम और विषम रूप जैसा !!

तेज पर संतुलित जलधारा
अन्नदाताओं का संरक्षक
खेवनहारों की पोषक
उम्मीद व आकांक्षाओं का
लिए सतत प्रवाह
बेशक होता
अनेक बाधाओं से बाधित
पर होता जीवन से भरपूर
कभी छलकता उद्विग्न हो
विनाशकारी बन
कभी खुशियों का बन जाता  संवाहक

सफ़र के आखिरी सप्तक में भी
मद्धम होती कल कल में
थमती साँसे
शिथिल  शरीर
मंथर वेग
निश्चित गति से धीरे-धीरे
क्षिति जल पावक गगन समीर में
सब कुछ  विलीन करते समय भी
तुम सा ही मुक्त हो जाऊंगा

डेल्टा पर जमा कर अवशेष
फिर हो जायेगी परिणति मेरी भी
आखरी पड़ाव पर
महा समुद्र से महासंगम
बिलकुल तुम्हारी तरह !!!

हे ईश्वर !!
मेरा और नदी का सफ़र
शाश्वत और सार्थक  !!


Monday, November 30, 2015

प्रेम के वैज्ञानिक लक्षण



जड़त्व के नियम के अनुसार ही, वो रुकी थी, थमी थी,
निहार रही थी, बस स्टैंड के चारो और
था शायद इन्तजार बस का या किसी और का तो नहीं ?

जो भी हो,  बस आयी,  रुकी, फिर चली गयी
पर वो रुकी रही ... स्थिर !
यानि उसका अवस्था परिवर्तन हुआ नहीं !!

तभी, एकदम से सर्रर्र से रुकी बाइक
न्यूटन के गति के प्रथम नियम का हुआ असर
वो, बाइक पर चढ़ी, चालक के कमर में थी बाहें
और फिर दो मुस्कुराते शख्सियत फुर्र फुर्र !!

प्यार व आकर्षण का मिश्रित बल
होता है गजब के शक्तिसे भरपूर
इसलिए, दो विपरीत लिंगी मानवीय पिंड के बीच का संवेग परिवर्तन का  दर
होता  है, समानुपाती उस प्यार के जो  दोनों  के  बीच पनपता  है
प्यार की परकाष्ठा  क्या न करवाए !!
न्यूटन गति का द्वितीय नियम, प्यार पर भारी !!

प्रत्येक क्रिया के  बराबर और  विपरीत प्रतिक्रिया
तभी तो
मिलती नजरें, या बंद आँखों में सपनों का आकर्षण
दुसरे सुबह को फिर से करीबी के अहसास के साथ
पींगे बढाता प्यार
न्यूटन के तृतीय नियम के सार्थकता के साथ  !!

गति नियम के
एक - दो - तीन  करते  हुए  प्यार  की प्रगाढ़ता
जिंदगी में समाहित होती हुई
उत्प्लावित होता सम्बन्ध
विश्थापित होते प्यार की तरलता के बराबर !!

जीने लगते है आर्कीमिडिज के सिद्धांत के साथ
दो व्यक्ति
एक लड़का - एक लड़की !!