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Tuesday, March 21, 2017

एलोवेरा


हाँ, एलोवेरा के सिंदूरी फूल सी ही 
लगती हो ‘तुम’ 
बिना भीगे प्यार
बिन खाद-दुलार
कंटीले से पौधे में भी 
हरे-भरे अजब से माँसल
पत्तों के बीच
सहज सरल सम्मोहन संग
हर बार जब भी खिली खिली सी
दिखी तुम

औषधि सी तुम
हाँ ज़रा सी तुम
पुरअसर बेजोड़
दिलोदिमाग पर काबिज़
न जाने कब तक के लिए
शायद अब सांस भर
पकी उम्र की दरकार बन
लम्बे समयांतराल में
चमकती हो तुम .....!

सम-विषम परिस्थिति में
बिना जद्दोजहद
एलोवेरा को अपनी है कदर
इसलिये है अपनी फिकर
स्व को स्वीकार कर ही
संभव है परजन हिताय
ज़िंदगी के अभ्यारण्य में
एलोवेरा पुष्प सी प्रेरणा बन
अवतरित होती हो तुम
लम्बी छरहरी चमकीली, आल्हादित कर देने वाली
सिंदूरी रंग में सजी तुम
जीवन की चमक लिये
तुम हाँ तुम ही तो
एलोवेरा की फूल सी तुम

सुनो
यूँ तो हरवक्त नजर नहीं आती
पर, जब भी दिखती हो
छाई सी रहती हो दिलो दिमाग के गलियारे में
वैसे पता तो है ही तुम्हे
फिर भी सुनो
मैं चाहता हूँ
एलोवेरा तुम्हारा वर्चस्व बना रहे
पुष्पित हो
नसों से साँसों तक
दिलोँ से दिमाग़ तक
दुनिया से दुनियादारी तक
हर वक़्त हर जगह ......!!!

Monday, March 6, 2017

चीटियाँ



जा रही थी चींटियां
गुजर रही थी भरे बाजार से
शायद किसी मिठाई की दुकान की ओर
पर थी पंक्तिबद्ध
हर एक के पीछे एक !
तल्लीनता और तन्मयता से भरपूर
कदम दर कदम, सधे क़दमों से
'रुके नहीं, थके नहीं' के आह्वान के साथ
जबकि कई एक बार
किसी न किसी इंसान ने
कर ही दिया जूतों तले मर्दन
की कोशिश कि टूट जाए अनुशासन
कुछ हो गईं शहीद चींटियों को छोड़
बढ़ रही थीं सभी, ऐसे, जैसे कह रही हों
वीर तुम बढे चलो
सिंह की दहाड़ हो ..!
रुके नहीं कभी कदम
थी कुछ अपवाद इन में भी
लगा ऐसे, जैसे है कुछ में नेतृत्व की क्षमता
तभी तो उनमें से कुछ
लम्बे डगों के साथ
कतारबद्ध बढ़ते चीटियों पर
छलांग कर/फलांग कर बिना पक्तियों को तोड़े
बढ़ रही थीं सबसे आगे।
हाँ,इन्हीं में से कुछ को निकलेंगे 'पर'
इन्हीं फड़फड़ाते परों के साथ
उड़ निकलेंगे जौहर दिखाने की कोशिश के साथ
पल भर में मर कर, गिर कर समझा देंगी ये सबको
घातक है पंखों का फड़फड़ाना!
याद रखना
है अगर नेतृत्व क्षमता
है अनुशासन
है निष्ठा
तो बढ़ते रहोगे आगे
बहुत आगे
बस, फड़फडाना मना है !


गायत्री गुप्ता के हाथों में हमिंग बर्ड 

Tuesday, February 28, 2017

आइना


आईने के सामने खड़ा अकेला व्यक्ति
एकांत का प्रतिरोध करने की
एक वाजिब सी कोशिश के साथ !!

वो और उसका प्रतिबिम्ब
जैसे दो बचपन के यार
जैसे एक और एक दो नहीं
हो जाएँ ग्यारह, ऐसी हो उम्मीद !!

होता है न सच्चा और सार्थक
एक ऐसे शख्स का साथ
जो होता है स्वयं जैसा
एक जैसे गुण, दुर्गुण सद्गुण के साथ !!

यानि हँसे तो वो भी मुस्काया खिलखिलाया
रोये तो उसने भी मुंह बनाया, टपकाए आंसू !!

आता है प्यार, उस पर, जो होता है
आईने के उस पार !
जो करते हैं खुद को प्यार
उन्हें आईने में दिख जाता है
हमसफ़र, हमदम हमनजर !!

मतलब, जैसे आईने के सामने वो बुदबुदाया
- 'लव यू'
तो लगा ऐसे,  जैसे  सामने से होंठ हिले
दर्पण के उस पार
हमशक्ल ने कहा 'सेम टू यू' !!


Thursday, February 16, 2017

"विंड चाइम"


सुविधा-संपन्न सोसायटी फ्लैट्स में 
दरवाजे के ऊपर लटकी दिखती हैं 'विंड चाइम्स'
और दरवाज़े से झांकती दिखती है एक अकेली 'मैजिक आई' शक से घूरती
उनकी परछाईं तले, नीचे, पीछे गरीब बस्तियों की किवाड़ों पर होता है अक्सर एक स्वास्तिक, 'ॐ', 786, कभी कोई खंडा और दरके हुए किवाड़ों में होती हैं दरारें कभी दो तख्तों के बीच चिरी लम्बी सी झिर्री झिर्रियों से छनती हवा कभी नहीं निकालती 'ओम' का स्वर
'वन वे मिरर' है 'मैजिक आई' ज़िन्दगी को एकतरफा देख पाने का जरिया जबकि टूटी झिर्री या सुराख आँखों में आँखे डाले, जुड़ने का दोतरफा रास्ता 'मैजिक आई' समृद्धि की चुगली करता जिसकी आज्ञा सिर्फ अन्दर की ओर से आँख लगाये वो एक शख्स ही दे सकता है
उलट इसके, झिर्रियों से झांकते हुए देख सकता है दूर तक कोई भी, अन्दर का घुप्प अँधेरा अभाव यहीं कहीं रहता है रेंगता है 'जीवन' के नाम से जाना जाता है चूल से लटकती तो कभी बस टिकी हुई किवाड़ों पर पुते स्वास्तिक या 'ओम' का खुला सिरा नहीं समेट पा रहा 'खुशहाली' जबकि विंड चाइम की टनटनाहट पंखे के कृत्रिम हवा के साथ भी फैला रही समृद्धि

कल ही ख़रीदा है एक 'विंडचाइम'!

Wednesday, January 18, 2017

आइना झूठ नहीं बोलता



आईना
है वो चश्मदीद गवाह
कटघरे में खड़े अभियुक्त जैसे
अपने सामने दिख रहे चेहरे के लिए
जो बता पता है, या यूं कहें, बता सकता है 
अपराध से अभियुक्त का कोई वास्ता नहीं
आईना
बेशक हो 'एलीबी'
अपराध न करने की,
लेकिन कहते हैं न
झूठ के हज़ार मुंह
और एक चुप सच का
शख्सियत को
जानने समझने के लिये
उतरना पड़ता है
आँखों की गहरायी में
महसूसना पड़ता है
पनियल आँखों की तराई को
जिससे नज़रों का
परावर्तन/अपवर्तन
जोड़ पाये कुछ दरकते बंध
आईना !
मैंने खुरच दी है
तुम्हारे दूसरे तरफ की
सिल्वर सुरमई कलई
जिससे खुल न पाये कलई
तुम्हारी गवाही से
ताकि डाल सकूँ खुद की आँखों में आँखें
बेपरवाह बिंदास ..
आईना!
डरता हूँ तुमसे ...
तुम्हारी सच्चाई से
कह सकते हो कभी भी
हर व्यक्ति
होता है गुनाहगार
अरे रुको !!!
कमियों के भण्डार तुम भी कम नहीं
जानते हो ने
कितनी कमज़ोर है तुम्हारी याददाश्त
और उल्टा ही दिखाते हो
मेरा सीधा हो जाता है तुम्हारा उल्टा
आखिर सजा देना/पाना
इतना आसान भी तो नहीं

Tuesday, December 20, 2016

कहीं इमरोज न बन जाऊं



प्रेम से पल्लवित कोंपलें
होती हैं जवां,
दो नादाँ खुशमिजाज और चहकते दिलों में
हिलोरे मारती है चाहत
शायद हो कोई जूलियटलैला या रांझा
जो थामे उसके हाथों को
और प्यार भरी नजरों से ताकते हुए कह भर दे
वही घिसे पिटे तीन शब्द
आई लव यू !

बदलती उम्र का तक़ाज़ा
या देर से उछला प्रेम स्पंदन
या यूँ कह लो
प्रेम भरी साहित्यिक कविताओं का
नामालूम असर
कहीं अन्दर से आई एक आवाज
चिंहुका प्रेम उद्वेग
हो मेरे लिए भी कोई अमृता -
जो मेरे पीठ पर नाख़ून से
खुरच कर लिख सके
किसी साहिर का नाम!

कहीं इमरोज न बन जाऊं !


100कदम की प्रतिभागी 

Thursday, December 1, 2016

तड़ित


फटे हुए एम्प्लीफायर स्पीकर की तरह
गडगड़ाता बादलनमी से लबालब
ट्रांसफॉर्मर के कनेक्शन वाले मोटे तार से
ओवरलोडेड पॉवर सप्लाई के कारण
कड़ कड़ाती बिजलीजो दूर तलक़ दिख रही

किसी रोमांटिक मूवी की बेहद ख़ूबसूरत अभिनेत्री सी
भीगे पल्लू के साथ भागती बारिश
ठहरती/थमती कभी तेज चालों से झनमनाती
कभी लयबद्ध तो कभी बिना किसी लय के

सारा फैला एक टुकड़ा आकाश
राजकपूर की मंदाकिनी सा
गीला-गीला हो उठा,
है हर एक की नजर
आकाश के विस्तार पर जमी

बिखरे टूटे पत्ते व
भीगी सौंधी मिट्टी की महक
चुपके से कह उठी
हाँ वो अभी अभी तो आई थी

एक या दो बूँद
मेरी पलकों पर भी छमकी
आखिर उसकी ही वजह से
बेमौसम मेरे मन का मानसून
टपक पड़ा

स्मृतियों में दरकती मेरी तड़ित
कहींतुम मुझे जला मत देना ..........

पल भर में !!
27 नवम्बर के दैनिक जागरण में 100 कदम की समीक्षा