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Friday, May 23, 2014

जिंदगी के पन्ने




बेहद अजीब हो गए हैं हम
कुछ गमलों में चमकते फूलों की
रंगीन पंखुड़ियों को देख कर समझते हैं
कि हमारा पर्यावरण
सिर्फ और सिर्फ शुद्धता बरसा रहा है 
बहने लगा है अब शुद्ध ऑक्सीजन !
आफिस गार्ड की कड़क यूनिफार्म से
अंदाजा आर्थिक अवस्था का लगाते हैं
पर, हमें जरा भी गुमान तक नहीं होता
कि उसका बेटा निकाल दिया गया स्कूल से
फीस नहीं दिये जाने के वजह से !
आखिर गार्ड का दिया हुआ सेल्यूट ही तो
है आर्थिक सबलता !!
फेसबूक पर चंद मुस्कुराते फोटोज पर
लाइक बटन दबा कर, कह उठते हैं
'कितना खुशहाल और सम्पन्न परिवार है आपका'
फेसबूक पर चहक रही स्त्रियाँ..
कितना प्रयास करती है
पति के थप्पड़ से आंखो के नीचे बने नीले निशान
छुपा ही ले जाती है..
हमे कहाँ दिखते हैं भला..
200 ग्राम सेब.. साथ में चिप्स / बिसलरी
खरीद कर, कह उठते हैं
'महंगाई बढ़ गई है,'
समझने लगते हैं स्वयं को अर्थशास्त्री,
अर्थ व्यवस्था पर बौद्धिकता छांटते हैं
पर नहीं दिखती उस दुकानदार की
ढीली होती जाती पैंट, भूख के वजह से .....
बहुत जोड़ तोड़ कर स्पाइसजेट का
सुपर इकोनोमी टिकट हासिल करते हैं
और फिर, अगले छह साल तक
हवाओं मे उड़ते हुए बादलों की ओंट से
खुद को हिलता महसूस करते हैं
आखिर ऊपर से बादल देखना भी है न सुखकर
चलो
कुछ कल्पनाशीलता.. बेवजह ही..
मन में ही चित्र खींच कर
जिंदगी के पन्नो पर अतिरेक रंग
भरने का नाटक तो करते हैं हम !
आखिर जिंदगी जीना भी तो जरूरी है !!
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आखिर जिंदगी जरूरी है, चाहे जैसे भी