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Thursday, October 18, 2012

एक नदी की मर्सिया



पिछले दिनों हमारी साझा कविता संग्रह "कस्तूरी" प्रकाशित हुई ! उसमे ये रचना प्रकाशित हो चुकी है, पहले ब्लॉग पर साझा नहीं किया था , अब सोचा आप सबसे से पूछूं कैसी हैं ...........
बताएँगे???



हमारी गंगा-यमुनी संस्कृति 
का प्रतीक
व दिल्ली की जीवन रेखा
"यमुना"
अब जब भी गुजरो 
इसके ऊपर के पुल से 
तो दूर से दिख जाती है
झक सफ़ेद
दुधिया नदी............!
.
पर कभी पहुँचो पास
तब होगा अहसास 
नहीं है यह सफ़ेद दुधिया रंग
नहीं है ये स्वच्छ जल
ये तो है गंदगियों से बना
दुधिया फेन
जो तैर रहा है
छिछले गंदे काले पानी पर..
यमुनोत्री की पावन जल धारा
दिल्ली आकर बन जाती है 
गन्दा नाला !!
.
हम सब कर रहे हैं कोशिश 
बना रहे हैं परियोजनाएं
ठान लिया है....
कैसे भी कर के मानेंगे
कर देंगे स्वच्छ
पर कैसे?
कागज पर हो रही है कोशिश
लग रहे हैं पैसे
क्या होगा हकीकत में वैसे ?
.
यहाँ तो   
जहाँ जिन्दा है यमुना
वहां हो रहा है काम
उसको मारने का
और जहाँ मर चुकी है
वहां कर रहे हैं कोशिश
लाश नोचने की ...
लगे हैं हम
एक नया रेगिस्तान बनाने में 
एक प्यारी सी नदी 
की  मरसिया  पढने में.....!!!!!!!!!!!!!!









Friday, October 5, 2012

मेहँदी का पेड़
























पता है ?
तुमने जो लगाया था
मेहँदी का पेड़,
उसके पत्ते आज भी
लाल कर देते हैं हथेली
.
घर के पिछले दरवाजे की किवाड़... 
जिससे नजर आता है अब भी, वो मेंहदी का पेड़
उखड रहा है चौखट से..
पीछे जो खेत है,
उसकी जमीन भी हो
गयी है उसर...
होते ही नहीं अंकुरित
लगे हुए मटर...
तुमने जो नीला कोट दिया था
वो अभी भी बक्से  में पड़ा है
आई ही नहीं इत्ती सर्दी..
घनेरे छाये मेघ भी 
बस... गड गडा कर उड़ जाते हैं
शायद उन्हें भी  लगता है-
क्यूं बरसे जिंदगी भर ?......
.
"मेरे शब्द"... उनको तो, क्या हो गया,
कैसे बताऊँ ?
हर बार रह जाते हैं, थरथरा कर
बोल ही नहीं पाते कुछ
सब कुछ तो बदल गया
.
पर पता नही क्यूं
तुमने जो लगाया था
मेहँदी का पेड़
उसके पत्ते आज भी
लाल कर देते हैं हथेली...
आज भी...!!