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Thursday, October 31, 2013

स्पर्श !!


हाँ !
तुम्हारा वो पहला
स्पर्श !!
है मेरी में
कहीं समाहित
संयोजित
सहेजा हुआ !!

जो देती है
एक बहुत अलग सा कंपन
तरंग !!
वैसे ही
जैसे केहुनी पर
कभी कभी
टन्न से कुछ लगता है
तो झनझना उठता है
पूरा शरीर !! सर्वस्व!!

पर मैं
इस झन्नाहट को
महसूसना चाहता हूँ
बराबर! हरदम !!
संभव है ??
ए जिंदगी! तू खुद एक तरंग है कंपकंपी देती रहती है !! 




Friday, October 25, 2013

फ्लावर वेस (flower vase)



महंगे कीमती फ्लावर वेस में
करीने से लगा व सजा मेरा जीवन

मूल पौधे से कट कर फिर भी
पानी व खाद के साथ
एसी कमरे मे सजा कर
बढ़ा दी गई लाइफ मेरी
पर कहाँ रह पाता मेरा जीवन

वो पौधे से जुड़े रह कर खिलना
और फिर गर्मी व अंधड़ में
जल्द ही मुरझा जाना
मुझे तो दे दो ऐसा ही जीवन

दरख्तों से जुड़े रह कर
मुसकाना, खिलखिलाना
और फिर यूं ही गिरती पंखुड़ियों की  
बिछती शैया  मे शामिल हो जाना
मैं तो चाहता  बस ऐसा ही जीवन

पर रासायनिक खादों से भरपूर
जीवन देकर, फिर तोड़ कर
अंततः फ्लावर वेस में सजा कर
मत करो  बरबाद मेरा  जीवन

बिखेरने दो सुरभि मुझे
पराग निषेचन के लिए
आने दो मेरी पंखुड़ियों पर
तितलियों व भँवरों को
जुड़े रहने दो मुझे कंटीली झड़ियों से
मानों न एक खिलते फूल
का सादर निवेदन

मुझे दे दो मेरा जीवन !!


Wednesday, October 16, 2013

प्रेम-कविता




प्रेम! प्यार! इस ठहरती-दौड़ती जिंदगी में कभी एक बार तो आए मानो सितंबर महीने के मेंगों शावर की तरह.. या सुनहली साँझ के चमचमाते सूरज की तरह.. या फिर ऐसे समझो, मन में कोई प्रेम-कविता पनपी..... या फिर! अचानक मूसलाधार बारिश रेनिंग कैट्स एंड डॉग्स... बरसे प्यार, सिर्फ प्यार अंदर तक की संवेदनाएं हो जाएँ गीली ऐसे जैसे सूखे बंजर विस्तार में एक दम से उग आए.. जंगली घास... लहलहाए...... फिर?... फिर क्या ? जिंदगी! जीवन! प्यार! खुशी! सब आपस में गड्मगड.. फिर, बस रच जाएगा एक सुंदर “प्रेम-गीत”! और तब.. तब क्या ? तब भी हवाएँ सूखे पत्तों को उड़ा ले जायेंगी तब भी भौरें करेंगे पुष्प निषेचन पहले के तरह ही पर, प्रेम-गीत वो प्रेममय हो जाएगा बस इतना सा ही अंतर.. इसीलिए तो बस प्रेम! जीवन में एक बार तो आए ... बस एक बार!!



Wednesday, October 2, 2013

~: बापू :~


हैप्पी बड डे बापू
तुमने हर समय अहिंसा के पुजारी बन कर
सबको रास्ता दिखाया
ट्रेन से फेंके गए
पर बिना हल्ला-गुल्ला किये
गोरो को भारत से फेंक दिया
बापू, क्या नहीं किया तुमने
अपने सोच व समझ को बांधे
अहिंसा का झण्डा थामे
बस तुम्हे थी एक ही चाहत
कैसे हो स्वतंत्र भारत
फिर भी लोगो का क्या
खूब जी भर कर गरियाते हैं
आखिर फैशन है,
कैसे दिखेंगे इंटेलेक्चुअल
बेशक, आज तक
सिर्फ अपने हक़ के लिए ही मरते हों
पर तुम्हे गरियाकर
अपना हक़ पूरा करने की कोशिश करते हैं
पर फिर भी बापू
इतना भी आराम तुम पर भाता नहीं
मान लिया जन्नत में
आराम से चला रहे होगे चरखा
पर अभी कहाँ आराम बदा है
आ ही जाओ, कुछ तो करो
फिर से हम सब में
राष्ट्रीयता भर दो
देश के लिए मरने की चाहत यानि
एक चुटकी देश भक्ति दे देना बापू
बेशक अहिंसा छोड़ कर
चला ही देना लाठी
अब आ जाओ …………बापू !!
लव यू बापू !!
_____________
गांधी तेरी जय !!
शास्त्री जी को भी नमन !
~मुकेश~