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Friday, June 27, 2014

जूते के लेस


जूते के लेस 
बेचारे बंधे बंधे रहते हैं, हर समय 
छाती पर बंधे हाथों की तरह 
एक दम सिमटे, गांठ बांधे 
पर देते हैं एहसास 
सब कुछ समेटे रखने का 
चुस्त, दुरुस्त !! 

कभी कभी थके बाहों जैसे 
जूते के लेस भी 
चाहते हैं लहराना हाथों के तरह ही
एक आगे, एक पीछे के
तारतम्य के साथ
तो, कभी बेढ़ब चाल में
चाहते हैं फुदकना
मस्त अलमस्त !!

तभी तो लेफ्ट राइट होते
पैरों के नीचे, पैंट के सतह से
टकरा कर ये लेस
करते हैं कोशिश खुलने का
बहुत बार खुल कर
दिखा ही देते हैं, आजादी
कहते हैं, बहुत हुए त्रस्त और पस्त!!

बड़े होते हैं बदमाश
ये जूते के लेस
जान बुझ कर, खुद ही
दब जाते हैं जूते से
गिर जाता है बलखा कर
जूते पर जो खड़ा था
दिखा रहा था अकड़ !

आखिर "अहमियत" भी
है एक शब्द !
जूता हो, या हो जूते का लेस
या हो सर की टोपी, या हो बटन !!



Tuesday, June 17, 2014

सिमरिया पुल



जब भी जाता हूँ गाँव 
तो गुजरता हूँ, विशालकाय लोहे के पुल से 
सरकारी नाम है राजेन्द्र प्रसाद सेतु 
पर हम तो जानते हैं सिमरिया पुल के नाम से
पार करते, खूब ठसाठस भरे मेटाडोर से 
लदे होते हैं, आलू गोभी के बोरे की तरह 
हर बार किराये के अलावा, खोना होता है 
कुछ न कुछ, इस दुखदायी यात्रा में 
पर, पता नहीं क्यों, 
इस पुल के ऊपर की यात्रा देती है संतुष्टि !!

माँ गंगा की कल कल शोर मचाती धारा
और उसके ऊपर खड़ा निस्तेज, शांत, चुप
लंबा चौड़ा, भारी भरकम लोहे का पुल
पूरी तरह से हिन्दू संस्कारों से स्मित
जब भी गुजरते ऊपर से यात्री
तो, फेंकते हैं श्रद्धा से सिक्का
जो, टन्न की आवाज के साथ,
लोहे के पुल से टकराकर
पवित्र घंटी की ठसक मारता है पुल,
और फिर, गिरता है जल में छपाक !!

हर बार जब भी गुजरो इस पुल से
बहुत सी बातें आती है याद
जैसे, बिहार गौरव, प्रथम राष्ट्रपति
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की, क्योंकि सेतु है
समर्पित उनके प्रति !
पर हम तो महसूसते हैं सिमरिया पुल
क्योंकि यहीं सिमरिया में जन्मे
हम सबके राष्ट्र कवि “दिनकर”
एकदम से अनुभव होता है
पुल के बाएँ से गुजर रहे हों
साइकल चलाते हुए दिनकर जी !
साथ ही, गंगा मैया की तेज जलधारा
पवित्र कलकल करती हुई आवाज के साथ
बेशक हो अधिकतम प्रदूषण
पर मन में बसता है ये निश्छल जल और पुल !!

और हाँ !! तभी सिमरिया तट पर
दिख रहा धू-धू कर जलता शव
और दूर दिल्ली में बसने वाला मैं
कहीं अंदर की कसक के साथ सोच रहा
काश! मेरा अंतिम सफर भी, ले यहीं पर विराम
जब जल रहा हो, मेरे जिस्म की अंतिम धधक
इसी पुल के नीचे कहीं
तो खड्खड़ता लोहे का सिमरिया पुल
हो तब भी ........ अविचल !!
_______________
माँ गंगा को नमन !!




Thursday, June 12, 2014

“गंदी बात”




बेवकूफ लड़की !
तुम्हें कहाँ होगा याद 
भूल चुके होगे तुम ‘सब’
पता नहीं कैसे कैसे 
अजीब अजीब सी सौगंधों से 
बांधा करती थी तुम !

हाँ, मुझे भी बस इतना ही है याद 
और उन सौगंधों का अंत 
होता था, दो शब्दो के साथ 
“गंदी बात”
सिगरेट पीना?
गंदी बात
शराब को हाथ लगाना
गंदी बात
एक बार दी थी सलाह तुम्हें
परीक्षा मे चोरी की
पर, तुम्हारा था अजीब सा उत्तर
गंदी बात
यहाँ तक की “ए” सेर्टिफिकेट वाली मूवी
आती थी ‘गंदी बात’ की श्रेणी में
मत घूरों ऐसे लड़कियों को
गंदी बात
धत्त ! ऐसे स्पर्श !!
बहुत गंदी बात !!

ये लो अब, आज तो जिंदगी
है ऐसी दोराहे पर
जहां से दोनों रास्ते
है बुराई से भरे
बस एक थोड़ा कम, तो दूजा ज्यादा

बहुत दिनों तक थी
तुम्हारी ये ‘गंदी बात’, जेहन में
तभी तो एक बार
किसी अपने की बहुत सारी
नोटों की गड्डियाँ थी गिननी
हर गड्डी मे नोट थे एक या दो ज्यादा
पर तुम्हारी ‘गंदी बात’
तब तक कौंध रही थी
जब तक की गड्डीयों की गिनती
खत्म न हो गई !!

खैर छोड़ो !
गंदी बात, माय फुट
धुएँ के छल्ले उड़ाए न, दारू भी चखूँगा
जल्दी ही !!
किसी ने बताया
दारू का पैग जब हलक से उतरता था
तो मुंह बनाना पड़ता है
ताकि दिख जाये “गंदी बात”

वैसे भी, बुरा बनना, बुरा थोड़ी है !!
__________________________
डिस्क्लेमर: मन कभी कभी वैसे ही बहुत सारे प्लॉट गढ़ता है,
कहानी रचने के बदले मैंने कविता बना दी !!
"गंदी बात" आज कल हर जुबान पर रहने वाला शब्द है




Tuesday, June 3, 2014

टिकोज़ी



जब भी “मैया”
खोलती लोहे का
काला भारी बक्सा
तो, आदत से मजबूर
आस पास मँडराता 
पता नहीं, क्या रहती उम्मीद?
अच्छा सा लगता था बस
मैया के पल्लू को पकड़े रह,
निहारना उसको और उसके सामानों को
बड़े जतन से रखती
सोने के निब वाला कोई पुराना पेन
अलग-अलग समय के चांदी के खनकते सिक्के
उनके ब्याह की पुरानी बनारसी सिल्क साड़ी
बाबा का काला गरम सूट
बेशक अंतिम बार कब पहना गया
था नहीं मुझे याद !
कपड़ों के बीच ही
थी, एक अजीब सी तिकोनी वस्तु
सफ़ेद गरम मोटे कपड़े से बनी
मैया कहती ये है “टिकोजी”
हर बार, मैया बिना पुछे बताती
टिकोजी
बाबा के लिए बनाई चाय को
गरम रखने के लिए
चीनी मिट्टी के केतली व कप को
ढकने के लिए होता था !
जब थे,
बाबा शिलोंग/दार्जिलिंग में पोस्टेड
खौला कर हरी चाय की पत्तियां
ढक देती थी केतली को
टिकोज़ी से ! मैया !!
आखिर नहीं था चलन, थर्मस का !
चाय गरम रह पाती या नहीं
टिकोजी का उपयोग
सार्थक था या नहीं
ये तो जानती थी सिर्फ मैया
या फिर बाबा !
टिकोजी को देखते हुए
देख पाता था मैं
मैया बाबा को
दार्जिलिंग चाय के सिप के साथ
प्रेमसिक्त अहसास भरे
कांच के पारदर्शी कप को पकड़े हुए
पर हाँ, देखी थी मैंने
मैया के आंखो की चमक
व टिकोजी के अंदर
रखकर खुद का हाथ
महसूस किया था
स्नेहिल गरमाहट भी
तभी तो
आज के समय में समझ पा रहा
मैया-बाबा के प्रेम का
असीम समर्पण !!
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प्रेम दर्शाने के लिए, कोई भी बिम्ब सक्षम होता है न ?? 
~मुकेश~