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Friday, January 30, 2015

तृष्णाओं का अभ्यारण्य


चलो चलें
तृष्णाओं के अभ्यारण्य में
करेंगे शिकार
कुछ दबी कुची, कुम्हलाती
झाड़ियों के बीच से उछलती 
इच्छाओं के बारहसिंघे का
दिन ढलने से पहले !!
वो देखो,
नाच रहे उम्मीदों के मयूर
करें उनका भी आखेट
बांधें निशाना बस चूक न जाएँ
ताकि चमकती उम्मीदों का
मयूर पंख
सुशोभित हो
मेरे घर की दीवार पर!!
उन जंगली फूलों पर
फड़फड़ा रहे,
छुटकू सपनों से
हमिंग बर्ड !
क्या उन्हें भी ??
न ..न !! रहने दो बाबा
हो चुकी अब स्याह रात
झपकते पलकों में
देखने हैं सतरंगे सपने
छोडो इस चिरैये को !!
कल फिर कर्रेंगे वध, इस घने जंगल में
अरमानों के घोड़े पर होकर सवार
भावनाओं के तेंदुएं का
थोडा द्वन्द, थोडा मल्ल युद्ध !!
उसके बाद होगा थोडा दर्द
प्लीज़िंग पेन जैसा!
इसलिए तो बार बार
निकल पड़ता हूँ, प्रकृति की छटा में
सैर के बहाने, लविंग इट यार !
तुम भी चलना !
चलोगे ना, अभ्यारण्य?


Friday, January 23, 2015

फैंटेसी


झील के दूसरे छोर पर
दिखी वो, शायद निहार रही थी जलधारा
पर, मैंने देखा, टिकी मेरी नजर
और.... आह !
वो नहाने लगी 
मेरे काल कल्पित झरने में...
मेरी मन्दाकिनी !!
मन ने कहा
चिल्ला कर कहूँ,
सुनो, ए लड़की इधर तो मुड़ो, देखो न !
इश्श्श, मेरी चिल्लाहट
मौन से भरी मेरी आवाज
पल्लू बन कर ढक रही थी
उसका चेहरा, उसका वक्ष !
धत्त !!
दिन ढल रहा था
पर मैं हूँ कि अटक ही गया
झील के उस किनारे पर
टिकी थी, मैं और मेरी परछाई भी
मैं, जितना उसको नजरों से उघाड़ता
पर, मेरी परछाई ने
बना दिया उसके लिए घर
ताकि न पड़े मेरी बदनजर उसपर!!
खैर जाने दो,
उसकी ख़ामोशी, उसका मौन
पता नही क्यूँ?
मुझ में भर रही अलीशा चिनॉय सी
मदभरी, मस्त सुरीली आवाज
थोड़ी ठहरी.. थोड़ी खनकती सी!!
मैं - वो !
झील व फैंटेसी!!
सब ढलने लगी
आखिर शाम हो चुकी थी !!

Tuesday, January 13, 2015

प्रेम का बुखार


जिंदगी इतनी आसान तो नहीं
जरुरी है ऑक्सीजन व भोजन
प्यास भी लगेगी ही
बिन साँसों के जी सकते हैं क्या
वैसे ही कोर ऑफ़ द हार्ट में
संजोये तुम्हे जी रहें हैं न !!
यानि जीने की बुनियादी जरुरत
मेरे लिए
भोजन, साँसे और यादें !!
सुनहरी वाली !!

याद है,  होने पर बुखार
मैया सुलाए रखती दिन भर
नहीं मिलता खाना तक
कहती पियो बार्ली
फिर वो प्रेम का फीवर
कहाँ था इतना आसान
डिग्री फोरेनहाइट में तरंगित होता अहसास
जलते नंबर टेन सिगरेट का
फ़िल्टर रहित धुंआ
अन्दर तक जला देने वाली क्षमता
फिर एक अजीब सी शांति
श्वांस नली से फेफड़े फिर दिल तक!!

उसकी याद और संजोया प्रेम
प्रेम के ताप से अब तक दहकता बदन
दो जोड़े होंठ
उसके बीच का विधुर्वी चुम्बकत्व
ऐसे जैसे कम्पास सुई को रखो कैसे भी
दिशा उत्तर दक्षिण ही दिखाएगी
है न सच!
वो उत्तर, मैं दक्षिण
बहुत दूर - बहुत पास !!
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अजब गजब प्रेम का बुखार !!!

Hamming bird on palm :)

Friday, January 9, 2015

छुटकी



बीते कल की तो बात है
जब मेरे नेह का टुकड़ा
मेरी छुटकी
रेत से बनाती थी घरौंदा
कैसे पलक झपकते ही
हो गयी मुझ सी बड़ी
अब वो जूझती है
समुद्री लहरों से
दिखाती है हर दिन
अन्दर की जद्दो जहद
करती है सामना, डट कर
परेशानियों का, कठिनाइयों का
मेरी सोन परी, मेरी बच्ची !!

बीते कल की तो बात है
जब तुतलाती हुई कहती थी
मम्मा!! उस पप्पू ने मारा
और मेरे ढाढस बंधाने पर
रुआंसी हो, हो जाती थी चुप
अब हर दिन, करती है सफ़र
जलती आँखों से ही कंपकंपा देती है
सामने वाले को, अगर करे स्पर्श
स्पर्श नहीं, बद-स्पर्श
मेरी छुटकी !! मेरी सिंहनी !!

बीते कल की तो बात है
मैंने फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता के लिए
बनाया था उसे ‘राधा’
छमक कर कह उठी थी वो,
मम्मा! मेरा किशना आएगा कब ?
देखो आ ही गया न वो समय
मिलने ही वाला है
मेरी लाडो को
हमसफ़र !
उसका अपना, उसका किशना !
मेरी सुंदरी! मेरी लाडो !!

मेरी बिटिया,
मेरे दिल का टुकड़ा
मिले तुम्हे तुम्हारा अपना
वो विस्तृत प्यारा सा आकाश
जिसकी है तुम्हे चाहत
जो हो सिर्फ तुम्हारा
ऐसी है शुभकामना !!
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एक माँ के ओर से बेटी के लिए शुभकामनायें :)
मेरी कलम से !!


Thursday, January 1, 2015

हाशिये पर हर्फ़


तकिये को मोड़ कर
उस पर रख लिया था सर
टेबल लैम्प की हलकी मद्धिम रौशनी
नजदीक पढने वाले चश्मे के साथ
गड़ाए था आँख 
“पाखी” के सम्पादकीय पर !!
हाशिये पर हर्फ़
समझा रहे थे, प्रेम भरद्वाज
उन्हें पागल समझने के लिए
हैं हम स्वतंत्र
क्योंकि वो करते हैं दिल की बात !!
तभी अधखुली खिड़की से
दिखा रुपहला चमकीला चाँद
हाँ ठण्ड भी तो थी बहुत
लगा कहीं कम्बल तो नहीं मांग रहा !
या फिर, शायद वो ही निहार रहा था
मेरी ओर,
आखिर क्यों कम करूँ खुद की अहमियत !
आखिर सोचना ही है तो
क्यों न सोचें की
चाँद ही बन जाए हमदम !! हर दम !!
फिर टिमटिमाते तारों से भरा
ये काला आकाश
और उसमे एकमात्र प्यारा सा चाँद
जैसे छींट वाला कम्बल ओढ़े
निहार रही थी “तुम”!!
उफ़ ये हाशिये के हर्फ़
तुम्हारे साथ हो जाएँ
शब्दों के हर्फ़
दिल की गहराईयों से जुड़ जाएँ
काश आभासी ही सही
हमसफ़र हो जाएँ 
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वैसे ही जुड़ते चले गये हर्फ़