Followers

Monday, July 26, 2010

तो तुम याद आती हो....


मेरे अत्यंत प्रिय और घनिष्ट मित्र "गणेश" के एक पुरानी डायरी के पन्नो से उतारी हुई..........

रात के लम्बे सफ़र में
जब में करवटें बदलता हूँ
तो तुम याद आती हो....

सुबह जब टहलने निकलता हूँ
और ठंडी हवा का कोमल स्पर्श होता है
तो तुम याद आती हो....

कॉलेज जाते समय
जब अकेला राहें नापता हूँ
तो तुम याद आती हो.......

क्लास के उस खाली समय में
जब खाली कुर्सियों के कतारों के बीच
अकेला बैठा होता हूँ
तो तुम याद आती हो....

हिंदी के पाठ्यक्रम में
जब विषय, प्रेम के गलियारे में रहता है
तो तुम याद आती हो....

साइकल से घर लौटते समय
जब उन राहों से गुजरता हूँ
जहाँ से तुम गुजरी थी
तो तुम याद आती हो....

हरित बागों में जब बैठा होता हूँ
और कोयल की कुक सुनाई पड़ती है
तो तुम याद आती हो....

और अंततः जब पुरे दिन की
भाग दौर से थक जाता हूँ
तो तुम याद आती हो....