Followers

Tuesday, November 22, 2011

एक टुकड़ा आसमान






















छत की मुंडेर पर बैठा
निहार रहा था
सुबह का नीला आसमान
मन था उद्विग्न 
चित था अशांत
....थी ढेरों परेशानियाँ
घेरे हुए थे लाखो प्रश्न
क्या करूँ, क्या न करूँ
कब करूँ, क्यूं करूँ
करूँ तो कैसे
ये, वो, जो, तो.............????


दिल में हुक सी उठी 
निकली हलकी सी आवाज
कब तक
कब तक करूँ संघर्ष
कब तक गुजरूँ
इस संघर्ष की राह पर..
कब पहुचेंगे वहां
जहाँ तक है चाह......

कब इस विशाल 
आकाश के 
एक अंश
एक कतरे 
......पर होगा
अपना हक़
कब होगा अपना
एक टुकड़ा आसमान
खुद का आसमान..
खुद का वजूद....................


तभी दिखा
एक उड़ता
फडफडाता हुआ
कबूतर.....
जो पास से उड़ कर
पहुँच गया बहुत दूर..
लगा जैसे 
जहाँ चाह वहां राह...
जैसे सारा 
जहाँ हो उसकी ...
बिना किसी सीमा के 

अचानक
सुबह की तीखी होती धूप ने
लगाया सोच पर विराम
फिर शुरू होगया
रोज़ का खेला
वही पुराना झमेला
उतर आया में मुंडेर से
... झटक आया अपनी सोच
और ले आया साथ.
....कबूतर के ओट से
उमीदों भरा एक टुकड़ा आसमान!!

क्योंकि कबूतर के फडफाड़ते पंखो पर
उम्मीदों कि ऊँची उड़ान
मुझे दे गया अपने हिस्से का 
एक टुकड़ा आसमान
आज खबाबों में..
शायद कल 
होगा इरादों में......
और फिर 
वजूद होगा मेरा....
मेरे हिस्से का आसमान..




Friday, October 21, 2011

पता नहीं क्यूं??




पता नहीं क्यूं??
अपने बच्चो को
सिखाता हूँ सच कहना..
पर कल ही..
उनसे झूठ कहलवाया
कह दो अंकल को
पापा ! घर पर नहीं हैं.........

पता नहीं क्यूं??
पति - पत्नी के रिश्तो पर..
मैं उससे रखता हूँ
उम्मीद - विश्वास कि.....
पर उस दिन ही
मेरी खुद नजर
नहीं बद-नजर..
थी एक लावण्या पर  ....

पता नहीं क्यूं??
माँ- पापा को रहती है
मुझ से उम्मीद..
और क्यूँ ना हो
मै हूँ उनका सपूत
पर कल ही मम्मी ने
फ़ोन पे कहा..कुछ ना उम्मीदी से
"भूल गया न तू!!"

पता नहीं क्यूं??
भ्रष्टाचार दूर करने के
मुद्दे पर, चढ़ जाती है
मेरी त्योरियां
पर पहचानता हूँ क्या
मैं खुद की ईमानदारी ?

पता नहीं क्यूं?
इतना सब हो कर भी
लगता है मुझे
एक आम इंसान
शायद होता है
मेरे जैसा ही ..
क्या ये सच है????

वक़्त के सांचे में
खुद को ढाल
अपनी ही कमजोरियों
के साथ
खुद को बेबस मान
हम को सबके साथ
बस यूँ ही जीना है  .....




Wednesday, September 28, 2011

अनायास ही .........





कागज में कलम घसीटी..
कि अनायास ही ..
कलम से मुड़ा तुड़ा सा 
एक शब्द
उकेरित हो उठा...
अनायास ही वो याद !
चेहरे पे एक हलकी सी 
ला गयी..सिहरन....
अनायास ही लगा
एक तरुणी......
जो सामने है बैठी..
और एक दम से 
कह उठी......
कैसे हो????
अनायास ही उमड़ 
आई कुछ स्मृतियाँ..
नदियों के लहरों
के उद्वेग की तरह...
जो अनायास
की कह उठी..
"आखिर
भूल ही गए न..."
पर फिर भी 
अनायास ही 
चेहरे पे आ ही गयी
एक मुस्कराहट
जो धीरे से चेहरे से
गुजरती हुई
कानों में कह गयी...
जो होता है 
अच्छा होता है !
और वही 
शायद 
मंजूरे खुदा होता है.....!!!!!!


Tuesday, July 26, 2011

"क्वालिटी ऑफ़ लाइफ"



























कर रहे थे मेहनत
जी रहे थे कुछ रोटियों के साथ..
जो कभी कभी होती
थी बिना सब्जी के साथ...
पर रात की नींद 
होती थी गहरी
होती थी
रंग बिरंगे सपने के साथ 
पर इन्ही सुनहरे सपनो ने
फिर उकसाया
मेहनत की कमाई
महीने में एक बार मिलता वेतन
नहीं दे पायेगा..
ऐश से भरी जिंदगी
कैसे पाओगे
"क्वालिटी ऑफ़ लाइफ" 

क्या करोगे तो 
पा जाओगे ऐसा जीवन
कि हर सांसारिक सुख
हो जाये हासिल
जिसकी हो तमन्ना!!

चाहत थी बड़ी 
पर कोशिश में नहीं था दम
चाहिए था धन..
इसलिए किया 
जीवन मूल्यों से खिलवाड़ 
लिप्त हो गए
करने लगे भ्रष्टाचार
लगाई सरकारी खजाने में
घुसपैठ
हो गए वो सब अपने
जिसके देखे थे सपने...
पर जो न मिल पाया
वो था चैन
उड़ गयी थी घर कि शांति
फिर नहीं देख पा रहा था सपना
क्यूंकि नींद भी तो उड़ गयी थी अपनी .

क्वालिटी ऑफ़ लाइफ 
पाने कि चाहत
ने उड़ा दी थी चेहरे कि रंगत
उड़ा चुकी थी चेहरे कि रंगत..............


Wednesday, June 29, 2011

कुछ जिंदगियाँ..










पिछले कुछ दिनों से मेरी दिनचर्या कुछ ऐसी हो गयी की दिमाग में काव्य रचना की और ध्यान ही नहीं एकत्रित हो पा रहा है... ....बहुत दिमाग लगाया, पर कुछ बन ही नहीं पा रहा.....अंततः!  ये कविता बन पड़ी......आपके सामने रख रहा हूँ....! 


वो
जिसने लिए थे फेरे
सात जन्म तक साथ निभाने का
पर उन वादों-वचनों को कब का 
रंगीन प्यालो में घोल कर पी चूका था..
और अंततः कुछ न बचा तो
खुद भी उसी बोतल में घुल गया..
था अब दिवार में लटका...
सूखे माले के साथ..

रह गयी
एक खुबसूरत छोटी से बेटी की माँ
जो हो चुकी थी विधवा..
दुग्ध धवल रंग रूप 
छरहरी देह यष्टि ....
नौकरी पाने के लिए ये गुण थे वरदान
पर फिर अभिशाप बन कर उभर गयी थी
जब लोगों की आँखों से बेधती..नजर चुभ जाती थी...

समय का पहिया पंख लगा कर उड़ा..
दिन बीते, बीती रातें.........
खुद से भी जायदा खुबसूरत
बेटी हो गयी थी जवान..
और फिर बहूत खोज ढूंढ़ कर उसने 
किया विदा अपनी दुनिया को..
एक सजीले नौजवान के साथ
कितनी खुश थी...
आखिर उसने संवारा था खुद का संसार....

पर वो ऊपर वाला ..
उसे तो था कुछ और मंजूर
दुसरे ही दिन...
दरवाजे पर दहाड़ मारती थी खड़ी वो बेटी..
साडी के लिबास में , पर अस्त व्यस्त...
रो भी तो नहीं पा रही थी वो...
हिचकियों के साथ....
मम्मा !! किस से ब्याह दिया..???
वो तो .........? उसके पास तो........?
क्या ?? क्या ?? हे राम!!!!
फिर से लूट गयी दुनिया, फिर से वही काली रातें..
जिसको न चाह कर भी होगा अपनाना..

क्यूं? कभी कभी कुछ जिंदगियाँ..
ता-जिंदगी सिर्फ लुटती रहती है..
जितना भी चाहो, खुशियाँ समेटना 
वो उपरवाला अंत-हीन परीक्षा 
का सिल-सिला रखना चाहता है जारी...
आखिर कब तक?
क्या मरने के बाद भी..................??


Wednesday, June 1, 2011

धुंधलकी सुबह!!


















धुंधलकी सुबह!!
बड़े शहर की बेगानी सुबह!!
नीले बादलो में धुल के गुब्बार वाली सुबह!
चिड़ियों की चहचहाट के बदले 
नल में आने वाले पानी के बूंदों की टप टप
ने बताया की हो चुकी है सुबह....

झप्प से खुली आँख
पर मुर्गे के बांग के बदले
म्युनिसिपलिटी के स्वीपर के झारू की खर-खर...
कह उठी!! उठ जा ..........हो चुकी सुबह..

फिर से आँख मिंचा
कि दिखे कोई सुबह का सपना सुहाना
पर धप्प से दरवाजे पे कुछ पड़ने कि आयी आवाज
अरे रबर से बंधा पेपर का पुलंदा जो पड़ा था आ कर...
जो कह रही थी....बेबकुफ़! हो गयी सुबह...!

छत पे पानी की बाल्टी लेकर पहुंचा 
तो प्रदूषित हवा में गमले के अध्-खिले फूल 
पानी के उम्मीद में खिलने का कर रहे थे इंतज़ार
समझ में आ गया कि हो गयी है सुबह...

एक बड़े शहर कि
खिली हुई नहीं!! बल्कि धुन्धलकी सुबह !!
न कोई रूमानियत 
न कोई सदाबहार ताजगी...
बस हर एक नए दिन में वही पुरानी सुबह
वही मशीनी व प्रदूषित दुनिया में जीते लोग....
और वही उनकी धुन्धलकी सुबह.......!!


Tuesday, May 10, 2011

हे भ्रष्टाचारी !!




हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही तुम्हें क्यूँ लोग
इतने विशेषणों से करते हैं संबोधित
इतने अलंकारो, उपमाओं से करते हैं सुसज्जित
असम्मानीय शब्दों से करते हैं विभूषित.!!

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही लोग क्यूं
कहते हैं...
भ्रष्टाचार हमारे देश को घुन की
तरह खा गया
और फिर कहतेहैं
"
भ्रष्टाचार को भागना होगा.
देश को बचाना होगा.........."

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही लोग क्यूं
क्यूं पिछले दिनों
अन्ना के बूढ़े कंधो का सहारा लेकर
बाब रामदेव की ओट से कहते हैं..
भ्रष्टाचारी को दे दो फांसी ....
उड़ा दो इन सबको  को ....

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही तू इस कलियुग में
कब तक लेता रहेगा अवतार
कभी तेलगी तो कभी बंगारू
कभी राजा तो कभी कलमाड़ी
तो कभी कोड़ा .....
हर दिन एक नए रूप में
होते रहेंगे दर्शन बारम्बार...

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ एक आम भारतवासी क्यूँ
अपने बारे में सिधान्तवादी
होने की पाल रखी है 
ग़लतफ़हमी...

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही क्यूं इतना कोसने पे भी
तुम बिन बेमानी हो गया है जीवन
जैसे ऑक्सीजन बिन लेना साँस.
हमारे खून में प्रवाहित हो गया है तू
ऐसा लगने लगा है.....

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही तेरे विरूद्ध झंडा उठा कर
तेरा कर रहे हैं महिमा मंडन
अगर तुम्हें भागना है
जड़ से उखाड़ना है
तो हमें अपने अन्दर झांकना होगा
तू जो हम में बैठा है.
उसे भागना होगा...
उसे भागना होगा...

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही....................


Tuesday, April 19, 2011

एक पुरानी संदुकची



घर की सफाई
और फिर गलती से मिली
एक पुरानी संदुकची
था जंग लगा ताला
जिसकी चाभी हो गयी थी ग़ुम

पड़ा हल्का सा हाथ
खुल गया ताला
एक दम से चलचित्र के भांति
आ गए सामने
"वो दिन" "वो अतीत"

चाय का कप
कप के नीचे
छूती हुई दो उँगलियों का स्पर्श
दिए हुए उपन्यास के पन्ने
जिस पर बने होते थे
छोटे छोटे प्रेम के प्रतीक
या रखे होते थे
सुखी गुलाब की पंखुडियां

झिलमिलाया एक
नाजुक फुल सा चेहरा
बारिश की बूंदों से भींगी लटें
और कुछ यादगार बीते लम्हें
और संदुकची में थे...
कुछ पीले हो चुके पन्ने,
पुरानी तस्वीरें, कुछ उपहार

पन्नो में थे सहेजे हुए शब्द
जो कहना था उसे
पर कह नहीं पाया
या समझ लो
उस तक पहुँच नहीं पाया
ख़त की स्याही हो चुकी थी धुंधली
पर याद अभी भी ...
एक दम से हो चुकी थी चटख.....


पर सुनो तो
मैंने फिर से उस संदुकची में
लगा दिया एक नया ताला
क्योंकि उन सहेजे यादों
को फिर से नहीं चाहता
अपने सामने देखना

क्योंकि मैंने और उसने
सीख लिया है
नए जीवन में सांस लेना ...
नए उमंगो और नए बहारो के साथ....
है न.................
.............

~मुकेश~






Friday, April 1, 2011

इतिहास

फुर्सत के कुछ खास पलो में

एक दिन खोल बैठा

एक पुस्तक इतिहास कि

जैसे ही मेरे अँगुलियों ने

पलटे कुछ पन्ने,

तो फरफराते पन्नों

से उछल उछल कर बहुत सारे शब्द

करने लगे गुण-गान

कि कैसे बंद पड़ी थी म्यान

जहाँ से निकली तलवार

जिसके कारण बन गए राजा महान

कैसे राजाओं ने, रण-बांकुड़ो ने

दुश्मनों के खिंच लिए जबान

किसने बनवाया ताजमहल या कुतुबमीनार

किसके प्यार कि ये थी दास्तान.........



पर उस इतिहास कि पुस्तक

के हर पन्नो पर

उन उछलते कूदते शब्दों से बने वाक्य

जहाँ भी थमते थे

जहाँ भी होता था कोमा या पूर्ण विराम!

कुछ अनदेखे चेहरे

कुछ बेनामी लोगो

के साहस और दर्द कि आवाज

धीमे से कह रही थी.....

"इतिहास में हम बेशक हैं नहीं

पर हमने भी रचा है इतिहास.............."