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Wednesday, January 29, 2014

शब्द


है अजीब दुनिया शब्दों की
कभी दर्द से कराहते हैं शब्द
तो कभी खुशियों से से खिलखिलाते शब्द
जिंदगी में संबल भरते शब्द
मिठास उढ़ेलते, गरम एहसास जगाते शब्द !

हथियारों जैसे संहार करते शब्द
तो अंकुरित सृजन करते सुंदर शब्द
कभी प्रार्थना व दुआ देते शब्द
तो बद-दुआओं से भरे कठिन शब्द
चोट पहुँचते खतरनाक शब्द
तो दवा-दारू जैसे मरहम करते शब्द
केंद्र होते हुए परिधि को संचालित करते शब्द
परिधि से केंद्र पर आश्रित होते
आभारी शब्द
परस्पर अन्योनाश्रित
जीवनशक्ति होते शब्द
जिंदा, ज़िंदादिल, जिंदाबाद शब्द
मर-मर कर तड़पते मुर्दाबाद शब्द !

उफ! आह! से आहा ! तक की
दूरी तय करते शब्द !
तो कभी चमत्कृत करते शब्द !!   
इंसान को मुखर बनाते शब्द
कभी मौन हो इंसान बनाते शब्द !!


Tuesday, January 21, 2014

वोटों के भिखारी



बड़ा पेट, भोला चेहरा
नेताजी का है सबसे जुदा चेहरा
जमीन से जुड़े कहे जाते थे
जब छुटभैये नेता के शुमार में आते थे
हर छोटे-बड़े कामों में व सभाओं में
जनता के बीच ये चेहरा नजर आता था
बेशक जनता का काम तब भी नहीं हो पाता था
पर नेताजी का अपनापन अपना सा लगता था
                 
धीरे धीरे बदला वक़्त, बदली किस्मत
बड़े नेताओं के कतार में, आ गए नेताजी
बड़े मंच से अब वो बड़े मुद्दे पर दहाड़ते  हैं
अगले क्रम के नेता कहलाते हैं
नेताजी के दिल में करुणा का कारख़ाना होता था
पर वक़्त आने पर उसका फाटक खुल नहीं पाता था

कहते  हैं जब लोग बड़े- पहुंचे हो जाते हैं
तो कीचड़ में पैर ज्यादा फंस जाते हैं
पर जनता को कौन समझाये, इतना तो बनता है
नेताजी के ऊपर पड़े भ्रष्टाचार की छींटो को
साफ करने हेतु पार्टी व सरकारी अमला लग जाता है
एक सूत्री कार्यक्रम फिर होता है,
हार नहीं मानेंगे, ठान लिया है, कर दिखाएंगे
नेताजी को झक सफ़ेद चमकाएंगे

यूं तो मुआ कैमरे का लेंस, इसको देख कर
नेताजी की आँखें, पहले चमचमा उठती थी
पर बदले चश्मे में वो आज तमतमा उठी थी
नेताजी, गुस्से में चिल्लाये, जांच करा लीजिये
पाक साफ हैं, हम, हमें न सीखाइए
नेताजी का आवेश, रुक नहीं पाता था
वैसे भी खुद की गलती पर हर कोई बरसता है

कभी कुछ हजारों की संपत्ति वाले फटेहाल नेताजी
अब बस कुछ अरबों में खेलते हाँ
लेकिन आज भी चुनाव आने पर
वोटों के लिए भिखारी बन तरसते हैं !!  




Wednesday, January 15, 2014

“छमिया”

दिल्ली फिल्म फेस्टिवल से खींची गई तस्वीर
"छमिया" ही तो कहते हैं
मोहल्ले से निकलने वाले
सड़क पर, जो ढाबा है
वहाँ पर चाय सुड़कते
निठल्ले छोरे !
जब भी वो निकलती है
जाती है सड़क के पार
बरतन माँजने
केदार बाबू के घर !!

एक नवयुवती होने के नाते
हिलती है उसकी कमर
कभी कभी खिसकी होती है
उसकी फटी हुई चोली
दिख ही जाता है जिस्म
जब होती है छोरों की नजर
पर इसके अलावा
कहाँ वो सोच पाते हैं
भूखी है उसकी उदर !!

आजकल छमिया” भी
जानबूझ कर
मटका देती हैं आंखे
साथ ही लहरा देती है
वो रूखे बालों वाली चोटी
जो छोरों के दिल में
ला देती है कहर
आखिर घूरती आँखों
के जहर
से, वो शायद हो गई
है, बेअसर !!

छमिया आखिर समझने
लगी है
मिटाने के लिए भूख
भरने के लिए उदर
जरूरी है ये सफर

अंतहीन सफर !!!   

दिल्ली फिल्म फेस्टिवल से खींची गई तस्वीर

Thursday, January 9, 2014

मौसम और रिश्ते !!


दिल्ली फिल्म फेस्टिवल से खींची हुई तस्वीर 

मौसम की आवोहवा रिश्तों पर करती है असर !
ठंडी संवेदनाएं
और जम कर बनता बर्फ
जैसा हो जाता है रिश्ता
अंधेरी सर्द भरी रात
बिलकुल घुप्प एवं ठंडी
दूरी में रहती है गर्माहट
तो नज़दीकियाँ लाती है सर्द
ये रिश्ता भी है अजीब
मौसम की आवोहवा करती है असर !!

कभी कभी रिश्तों के बीच
चलती है लू जैसी गरम हवा
ढाती है कहर
झुलसा देती है अंदर तक
क्षण भर के कडवे गरम बोल
बना देते हैं पराये
ग्रीष्म ऋतु की दोपहरी के तरह  
मौसम की आवोहवा रिश्तों पर करती है असर

ये संबंधो का अलबेला रिश्ता
सुख-दुख के दामन के बीच
खेलता है, अठखेलियाँ करता है
फिर कभी कभी यही रिश्ता
सावन के मूसलाधार बारिश के तरह
आँखों से झरझराने लगता है
ला देती है अंदर तक नमी
फिर यही बरसता सावन
लाता  है गर्मजोशी
रिस जाता है दर्द
तो सही  है न
मौसम की आवोहवा करती है रिश्तों पर असर !!

दिल्ली फिल्म फेस्टिवल से खींची हुई तस्वीर

Saturday, January 4, 2014

आप बनाम तुम

हार का दंश झेलने मे अगर दर्द न हो तो दलीय प्रजातन्त्र में कोई बुराई ही न थी। कमबख्त ये हार क्या न करवा दे। तभी तो कितनी पार्टियां कुकुरमुत्ते की तरह उग आती है। ककहरे के किसी भी एक शब्द के साथ या पा लगा दो और पार्टी तैयार, आप, बाप, आपा, भाजपा, सपा, बसपा, और पता नहीं क्या क्या ! ये चुनाव ही है जो मुख्यमंत्री बनने वाला होता है वही दूसरे दिन घर पर पता नहीं कहाँ किस दरबे में छिप कर रह जाता है ।

ये राजनीति क्या न करवा दे। एक नौकरशाह रातोंरात अपने को ईमानदार घोषित कर देता है। जिस नौकरी मे बेशक उसने दसियों साल गुजारें हों, वो ये कहने से जरा भी गुरेज नहीं करता की इस सरकारी नौकरी से करोड़ों कमाया जा सकता था पर वो उसको पैर के जूते के नोक पर रखता है। चुनाव के इस सुहाने मौसम मे हर पार्टियां अपना आधिपत्य जमाने के लिए अलग अलग तरह के सोर्स आजमा रही है, तो फिर, क्या दिक्कत है। कोई हाथ पर हाथ मार रहा तो कोई दलदल मे कमल खिला रहा, कोई इतिहास के साथ खिलवाड़ तो कोई नकली ही सही, पर लालकिले पर सवार हो कर अपने को दिखा रहा।

हाँ तो बात किसी खास व्यक्ति की नहीं है, बात केबड़ीवाल की जरा भी नहीं हैं, बात उनके आप की भी नहीं है, बात तो उनके भ्राता श्री जैसी पड़ोसी की है। अरे भैया, हम केवडीवाल के पड़ोसी बनवारीलाल की कर रहे हैं। जो रातोरात केबड़ीवाल से और उनके आप से जल भून कर रह गए । आखिर करे तो क्या करे कुछ दिन पहले तक ही तो दोनों न्यूज पेपर पढ़ते पढ़ते घर के चारदीवारी के पास व्युज देते थे और एक दिन आज है हर कोई आप – आप कर रहा और बनवारीलाल आज भी प्याज टमाटर के दामों से  ही पस्त हैं ।
अंततः आज आखिर पेपर में शीर्षक था

आप बनाम तुम

और बनवारीलाल जी मीडिया के कुछ कैमरे के चकचौध के केंद्र बने चमक चमक कर बता रहे थे। कह रहे थे आदमी का रखवाला आप नहीं तुम हो। तुम में प्यार है, नजाकत है, नफासत है, भोलापन है। तुम से ही पार्टी है, तुम से ही सरकार है, तुम से ही हम भी हैं। तो आऊ बंधुओं तुम से तुम जूडो, तुम को ही आना है, तुम को ही लाना है । बनवारीलाल तुम्हारे साथ है। तुम बानवारी लाल के साथ हो ॥

और फिर जो हुआ, वो होना ही था ...
आप की लुटिया तुम ने डुबो दी
तुम ने सरकार बना दी

तुम बोले तो TUM   “तिकड़मी उलफती मोर्चा” !!!
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बस एक व्यंग्य लिखने की कोशिश, पहली बार !!