Followers

Sunday, April 27, 2014

इतवार


छह व्यस्त दिन गुजारने के बाद
आ ही गया इतवार
सोचाखूब आराम करूंगा,
पूरे दिन सो जाऊंगा
करूंगा, खुद को रेजुविनेट !!
 
पर नींद या ख्वाब
कभी आते हैं बुलाने पर?
भटक रहा हूँ ॥
जबरदस्ती के बंद पलकों के साथ
ढूंढ रहा हूँ स्वयं को
उपस्थिति व अनुपस्थिति के बीच
टंगी दीवाल घड़ी के पेंडुलम की तरह
एक आवर्त में !!
खोजता हुआ सारांश
न जाने किस विस्तार का
 
सिलसिला फिल्म के अमिताभ की तरह
तुम होते तो ऐसा होता
तुम होते तो वैसा होता 
मेरी कुंद पड़ी सोच भी
बिस्तर पर मुर्दे की तरह लेटे
मेरी ही शिथिल पड़ी दोनों बाँहों के बीच
कसमसाती हुई कर रही मुलाक़ात
आखिर इतबार की सुबह जो है ......
 
छोड़ो !!
बहुत हुआ खुद को ढूँढना उंढना
ऐंवें !! सुकून की चाहत
मसनद पर मुँह छिपा कर
शुतुरमुर्ग जैसी फीलिंग की साथ !
 
चलो !!
व्यस्त होना ही बेहतर
हर दिन के दिनचर्या मे ही
मिलेगा सुकून का विस्तृत आकाश
अपना आकाश !!