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Friday, April 1, 2011

इतिहास

फुर्सत के कुछ खास पलो में

एक दिन खोल बैठा

एक पुस्तक इतिहास कि

जैसे ही मेरे अँगुलियों ने

पलटे कुछ पन्ने,

तो फरफराते पन्नों

से उछल उछल कर बहुत सारे शब्द

करने लगे गुण-गान

कि कैसे बंद पड़ी थी म्यान

जहाँ से निकली तलवार

जिसके कारण बन गए राजा महान

कैसे राजाओं ने, रण-बांकुड़ो ने

दुश्मनों के खिंच लिए जबान

किसने बनवाया ताजमहल या कुतुबमीनार

किसके प्यार कि ये थी दास्तान.........



पर उस इतिहास कि पुस्तक

के हर पन्नो पर

उन उछलते कूदते शब्दों से बने वाक्य

जहाँ भी थमते थे

जहाँ भी होता था कोमा या पूर्ण विराम!

कुछ अनदेखे चेहरे

कुछ बेनामी लोगो

के साहस और दर्द कि आवाज

धीमे से कह रही थी.....

"इतिहास में हम बेशक हैं नहीं

पर हमने भी रचा है इतिहास.............."