जिंदगी की राहें

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Monday, May 5, 2025

चिट्ठियाँ

 

1.

चिट्ठियाँ,
जो कभी प्रेम की संवाहक थीं,
लौटती डाक में आकर
प्रेम की मज़ार बन गईं।

कभी कभी उन्हें पढ़ कर ही
चमकती आंखों का दीया दिखाता हूँ

चिट्ठियां लिखी जानी चाहिए।

2.
गलत पते पर भेजी गयी थी
जो तुम्हें चिट्ठियां
लौट कर बताती रहीं अहमियत
दो-दो बार

भेजने से ज़्यादा,
तब खुद से हो गया था प्यार।
जब वापस लौटी लिफाफे में से
खुद के लिखे गुलाबी शब्दों को
महसूस कर, खुद ही हुआ गुलाबी।

3.
ढलती उम्र में भी
सहेज रखा है मैंने —
तुम्हारी चिढ़, जलन,
वो चिट्ठियाँ और कलम भी।
सूखी गुलाबी पंखुडियां संग
स्नेह व अथाह प्यार भी

सब है धरोहर
कुछ पर्स में
कुछ बक्से में
कुछ दिल के गलियारे में !

4.
पुराने
प्रेम पत्रों को पढ़ते हुए
जी रहा था
हर्फ़-हर्फ़ प्रेम को
कुछ पन्ने गुलाबी हुए
कुछ ने रोष जताया
पर हर पन्ने ने व्हिस्पर कर
लगाई गुहार

- बचाये रखना प्रेम को ।

5.
मोबाइल चोरी हुई
नम्बर भी गया तुम्हारा
संदेशें जो कागज पर थे
बस वही रह गए
इतना बताने को कि

बस इतना बताने को था —
लिखा करो अब भी चिट्ठियाँ,
चाहे बेनाम, बेतिकाना ही सही।

...ठीक है न!

~मुकेश~



Tuesday, July 16, 2024

लव एंड लस्ट


वर्षों की पहचान, अंतरंगता और 

स्नेहिल सम्पर्क की सीढियों पर थम कर 

आया एक प्रश्न।

ये लव है या है लस्ट।

प्रेम व वासना के महीन अंतर में 

कहीं तैरने लगा एक जरुरी प्रश्न

पर क्या ही कहूँ कि अगर 

है दोनों जरूरी, है अन्योन्याश्रय


क्योंकि वर्षों की अंतरंगता के

बाद स्वीकारा तो है तुमने कि

कहीं हुआ तो नहीं प्रेम?

शायद ये एहसास है 

या वासना का ही उद्गार था

जो प्रश्न बन कर कौंध गया।


प्रश्न तो कभी कभी

बस होते हैं जरूरी

क्योंकि प्रेमिल संवाद को देते हैं ठौर।

ठीक कुछ ऐसा जैसे 

मेरे सपनीली अँधेरी शाम में

तुम हुई थी करीब

खोती हुई चेतना को मेरे कांधे पर रख कर

और मैं महसूस रहा था

उन गर्म सांसों से भरी आहों को

जो कॉलर के पास बनियान को भिगोती रही

और भीगता मेरा मन

कह ही उठा - ये वासना ही तो है

जो जी रहा हूँ इस खास पल को

तभी सपने ने टूट कर पूछा 

लव या लस्ट?


इस अजीब से प्लेटोनिक पल में

बेशक़ जी रही थी वासना

पर ढूंढ रही थी प्रेम को।

तभी तो तुम्हारे कांपते लबो ने कहा

मुझे वासना नहीं,

तुम्हारा प्रेम चाहिए।

और, और...मिला था एक बोसा।

शायद गर्माहट भरी साँसों ने

मेरे होंठों को काट लिया था।


सपनों को कहाँ पता होता है

किसी भी भावों का

वो तो गर्म चाय के केतली की

वो वाष्प है, जिसमें स्वाद नहीं होता

पर कह ही उठते हैं

आह, इस चाय पर मर जाऊं


पता है नहीं मिलेगा कभी

वो ख़ास आगोश

कि खुद से पूछूं -

जी रहा हूँ 'लव या लस्ट'

पर, पर सांसों की तरंगदैर्ध्य

हर उस पल में रही उच्चतम बिंदु पर

जब जब तुम थी कहीं 

मन के बेहद करीब।

हां, प्रेम को चाहिए गर्माहट 

है मन को जरूरत

तुम्हारी बांहों का आगोश 

हथेलियों ने हर बार 

खुद ही एकदूसरे को रगड़ कर

पैदा की है चिंगारी

चादर की सिलवटों ने भी 

उसी क्षण पूछा था

- क्या बॉस, लव या लस्ट।


अंततः बस कहना ही पड़ा

कितनी खूबसूरत हो तुम

ये तो कहलायेगा -  सिर्फ प्रेम।

एक यादगार तस्वीर 





Friday, March 29, 2024

चमकते रहना !!

 


दूर तक पसरा है कुहासा
शायद है असर प्रदूषण का
पर फिर भी
छमकती दिख रही हो तुम ही
कहीं ऐसा तो नहीं
कुहासे के मध्य
जैसे फ़ैल गया हो
सूर्यप्रकाश का उजास
पुरनम के चांद सा खिला सूरज
दिन निकल आया है
पर क्यों मन कहता है
दिन सिमटा रहे
हां, तुम्हारे होने का अहसास भर से
गरमाया हुआ है कमरा
कह रहा मन, कि हो कुछ ऐसा
जैसे कुहासे के बदरियों के बीच
यदाकदा आ रही हो
कुछ मोटर कारें कुछ ट्रकें कुछ बाइक्स भी
कर्तव्य-पथ पर दूर से नजदीक
और उनके लाइट्स की चकमक ऐसी
जो बता रही हर पल
तुम चमकती हो मेरे अन्दर
बेशक लोधी रोड से गुजरते हुए
लगा ऐसे जैसे, कुहासा हो चुका परिवर्तित
कोहरे में
पर घने होते नम बूंदों पर भी
होती है किरणें अपवर्तित या परावर्तित
फिर तुम्हारी चमक तो है मेरे अन्दर तक
समाहित
क्या करूँ, इतना ही कहूँगा
कुहासा हो या अँधेरा
चमकते रहना
आखिर तुम्हारे प्रिज्मीय गुणों में
तुमने कुछ चुम्बकत्व के गुणों को भी
सहेजा है
तभी तो अपने उतर-दक्षिण दिशा से इतर
आकर्षित होता रहा हूँ हर पल
चकमक प्रकाश हो मेरी तुम
उर्वर ही रहेंगी मेरी कल्पना
फिर से बोलूं ?
चमकते रहना !!
~ मुकेश



Wednesday, February 22, 2023

ऑफिस टेबल और प्रेम

 


जिंदगी
टेबल पर रखे चश्मे
फोन के उलझे तारों
और सैनिटाइजर भी
साथ ही, डेस्कटॉप के स्क्रीन
पंच, स्टेपलर और
फंसी रह गयी चाभियों में
भागी जा रही।
सोचा था चश्मे से दिखोगी करीब
पर हो चुकी हो बेहद दूर
सुनना चाहता हूँ आवाज
पर उलझते तारों व संचार कनेक्शन ने
वो भी किया दूर
फिर भी चाहतें ऐसी कि
ग्लू स्टिक से चिपका रखा तुम्हारे तस्वीर को
मन के अंधियारे में
ताकि रखूं बेहद पास।
चाभियाँ याद दिला रही
प्रॉब्लम है इग्निशन का
कैसे लौटोगे, ओर आते हुए
दिखी थी लहराती हरियाली भी
जो दिलाती है याद
तुम्हारे अनदेखे चमक का
चलो पी कर बिसलरी जूस या पानी ही
करता हूँ फिर से याद !
पर,
अब भी बार-बार आ रही हिचकी
याद आने का सूचक तो नहीं !
खैर
अपनी किताबों के अंदर की कुछ पंक्तियाँ
आज करके समर्पित
बस इतना ही कहूंगा कि
हाँ, याद आती ही रही हो
बराबर।
(टेबल के वस्तुओं की लिस्ट भी कविता हो सकती है न !)
~मुकेश~



Tuesday, January 24, 2023

प्रेम केमेस्ट्री

 



न्यूटन ने सिर्फ तीन नियम दिए थे
उन दिनों, हम बच्चों के लिए
वही थी आधी फिजिक्स
और एक तुम हो
कितनी तो बात मानता हूँ तुम्हारी
पर, हमारी केमेस्ट्री ठीक ही नहीं होती
जबकि भगवान ने भी तो
मेरी बायोलॉजी में बहने वाली नर्वस सिस्टम को
तुम्हारे अलिंद-निलय से जोड़ा है
हाय मैं क्या करूँ मर जाऊं 😊
~ मुकेश




Wednesday, April 6, 2022

हुकूमत



रात
नींद
सपने
बिस्तर
देह
और आराम
फिर
इन सबका घाल मेल
और इनके बीच
घुसपैठ करती तुम
ऐसे कोई कहता है क्या कि
मुझ पर कविता लिखना
हर जगह तो दिखाती हो हुकूमत
रात की चंदा
नींद के सपने
सपने की नायिका
बिस्तर की सिलवटें
देह की सिहरन
और, और आराम की खूबसूरत खलल बनकर
क्यों पहुंचती हो इस हद तक
कि कविता पहुंचें
हदों के पार
खैर, मानोगी थोड़ी
नींद के साथ, नींद से पहले भी
आया ही करोगी तुम
वजह बेवजह।
आती रहना !
... है न!
~मुकेश~


Friday, March 5, 2021

प्रेम की दवा



सुनो तो,
तुम हो पैरासिटामॉल
या तुम ही हो क्रोसीन
या कहीं कोरोना वैक्सीन तो नहीं
तभी तो हर छह घंटे बाद के
मेडिकल खुराक की तरह
मैं जुकाम पीड़ित
पहुंचता हूँ तुम्हारे प्रोफ़ाइल पर
काश ये बुखार
साँप सीढ़ी की तरह खेलता रहे
काश तुम्हारा असर बना रहे !
वैसे भी कुछ दवाइयाँ
आयुर्वेदिक काढ़े जैसी
बिना डाक्टरी सलाह के भी
बिना किसी साइड एफ़ेक्ट्स के
होती है गुणकारी
तुम भी ऐसी ही हो न !
..... है न !!! 😉
~मुकेश~



Friday, January 29, 2021

प्रेम

 


प्रेम तो बस
डूबते हुए भी तैरते रहने का बहाना मात्र है
आखिर मर जाना कहाँ कोई पसन्द करता
इन दिनों...
....है न !

क्षणिका सा हो गया है, क्षणिक प्रेम
जब भी अच्छे से बात करती हो, हो जाता है
और फिर,
यूं डूबें कि तैर न पाएं
प्रेम में तेरे तर ही जाएं...

काश
ऐसी स्थिति माने
आगोश का सुख
फिर भरी आंखों को कौन निहारे
कभी सहमति हो शब्द भर की
और न चाहते हुए भी मर ही जाएं

भरी आंखों का वाचालपन शब्दों को मौन तो नहीं करता
वैसे भी एकतरफा आकर्षण ऐसे है
जैसे
भोर के साढ़े चार बजे
मिलेगी
मृत्यु दंड, पक्का पक्का !

सुना ही होगा न,
मुस्कराहट
जिंदगी की लड़ाई का सबसे कारगर हथियार है ।

~मुकेश~


Wednesday, October 21, 2020

प्रेम कविता लिखने की शर्त



प्रेम कविता लिखने की शर्त लगी थी
इस तंज के साथ कि
आज तक मुझ पर नहीं रच पाया कोई
प्रेम कविता !

बिन कहे कुछ
सोचा कि
लिखूं तो क्या लिखूं
होंठ लिखूं या लिखूं गुलाब की गुलाबी पंखुडियां
जो कभी हुआ करते थे प्रेम पत्र के साथ
रुमानियत भरने के लिए
हुआ करता था जो जरूरी

या फिर लिखने से पहले
ताकूं सुरमई आँखों में
हाँ, नजरों में अटकना ही तो है शायद
प्रेम के पहले पग पर ठिठकना
अगर अटका तो खोया
फिसला तो, हमें पता है
कह ही दोगी
ओये लड़के उतनी दूर तक नहीं !

खैर, रहने दी कविता
कर ली अपनी आँखे बंद
और फील करने लगा मुस्कराहट
तभी तो फैले बाहों से इंद्रधनुषी आसमान के साथ
महसूसने लगा तुम्हारी आहट
थे मेरे हाथो में तुम्हारे हाथ
थी स्पर्श की उष्णता
शायद कहीं प्रेम कविता की मांग में था
छिपा हुआ विस्मयकारी प्रेम भी तो

सोचा लिखूं तुम्हारे भरे हुए कंधे
और लिखूं तुम्हारी आवाज सुरीली
तभी आवाज सोचते ही फना होने लगी रूह
धधकने लगा अलिंद और निलय के बीच
बहने वाला रुधिर
टूटती नींद के साथ खिलखिलाते सपने भी तो
तकिये के अगल बगल से चिढाते हुए कह उठे
कवि तुम प्रेम में तो नहीं हो उसके

कब आ चुकी थी निद्रा
कब नींद में भी बहकने लगा था मन
पता चला तब,
जब तकिये में दबाये चेहरे को
करने लगा देह की यात्रा
देह से देह तक
कमनीयता से नज़ाक़त तक
मन से मन तक पहुँचने से पहले
पर, कुछ अजब गजब सोच भी
होती है प्रेम में निहित
किसी ने बताया था कभी
फिर जैसे चुप्पी होती है वाचाल
वैसे ही सोया हुआ जिस्म दौड़ता है अत्यधिक

चलो हो चुकी है अब भोर
फिर कभी लिखूंगा तुम पर
प्रेम और प्रेम कविता
आज तो बस जान लो
कवि के मन की बात कि
खिलखिलाते हुए लोग होते हैं खूबसूरत !

हाँ फिर से कह रहा हूँ
मुझे प्रेम कविता लिखते रहनी हैं
हर नए दिन में नए नए
झंकार था टंकार के साथ !
समझी ना !

~मुकेश~



Monday, May 18, 2020

समर्पित कविता



क्या लिखी जा सकती है
कविता
जो हो तुम्हे समर्पित
जिसके शब्द शब्द में
तुमसे जुड़ा हर एहसास हो समाहित

जैसे, बहती नदी सा
कलकल करता बहाव
और दूर तलक फैली हरियाली
अंकुरण व प्रस्फुटन की वजह से
दे रही थी
सुकून भरी संतुष्टि

पर वहीं
समुद्र व उसका जल विस्तार
बताता है न
सुकून से परे
जिंदगी का फैलाव,
ज्वारभाटा की सहनशक्ति सहित
जैसे मस्तिष्क के भीतर
असंख्य नसों में
तरंगित हो बह रहा हो रुधिर ।
समुद्र की लहरों के एहसास सी तुम
और, तट से अपलक निहारता मैं ।

बसन्त के पहले की
सिहराती ठंडी पछुआ बयार
और फिर आ जाना पतझड़ का
मन तो कह ही उठता है न
उर्वर शक्ति हो चुकी है
बेहद कम
पर, रेगिस्तान में
जलते तलवों के साथ
बढ़ते चले जातें हैं दूर तलक
होता है दर्द तो
महसूसता हूँ मृग मरीचिका सी तुम को
और फिर आ ही जाता है
खिले फूलों की क्यारियों से सजा बसंत

जिंदगी देती है दर्द
ये समझना कुछ नया तो नहीं
पर ये भी तो मानो
कि, तुम्हारी चमक
जैसे पूनम के चाँद को देख कर
लगी हो, स्नेहसिक्त ठंडी छाया
और फिर
बंद आँखों के साथ
बालों में फेर रही हो तुम उंगुलियां !

सुनो ! नींद आ रही है !
कभी कभी जल्दी सोना भी चाहिए

~मुकेश~


Monday, November 11, 2019

ब्यूटी लाइज इन द आइज ऑफ द बीहोल्डर


हो बेहद खूबसूरत
इतना ही तो कहा था
कि बोल उठी
लजाती भोर सी
हल्की गुलाबी स्नेहिल प्रकाश के साथ
रंग बिखेरती हुई
- ब्यूटी लाइज इन द आइज ऑफ द बीहोल्डर
तत्क्षण
आंखों की पुतलियों संग
छमकते प्रदीप्त काली चकमक संगमरमर सी
कोर्निया और रेटिना के मध्य
लहरा उठा सारा संसार
कहाँ तक निहारूं ?
हो सकता है,
खूबसूरती की वजह थी
निकटता का अक्षुण्ण एहसास
या फिर
आखों के उस
गहरे लहराते संसार में
प्रेम का चप्पू थामे
डूबता उतराते महसूस रहा था
भीग चुके मन के अन्दर की नमी को
या पता नहीं
थी एक अलग तरह की उष्णता
उसके पास आने के वजह से
दूसरों के आवाजाही से इतर
प्रेम के रौशनदान सरीखे
उसके आँखों में ही
सिमटते हुए
चाह रहा था समझना कि
क्यों न एक सपनों का घोंसला हो
इन पलकों के भीतर
और बरौनियों का झीना पर्दा रहे हरसमय
ताकि प्रेम के आगोश का सुख
ताकते हुए ले सके चुपचाप
निहारने का सुख
निकटता के भाव को नवीनीकृत करने का
एक तर्कसंगत युक्ति भर ही तो है
.... है न !!!
~मुकेश~
साहित्य आज तक 2019 में कविता पढ़ते हुए

Monday, September 30, 2019

प्रेमसिक्त धड़कन



तेज धड़कनों का सच
समय के साथ बदल जाता है

कभी देखते ही
या स्पर्श भर से
स्वमेव तेज रुधिर धार
बता देती थी
हृदय के अलिंद निलय के बीच
लाल-श्वेत रक्त कोशिकाएं भी
करने लगती थी प्रेमालाप
वजह होती थीं 'तुम'


इन दिनों उम्र के साथ
धड़कनों ने फिर से
शुरू की है तेज़ी दिखानी
वजह बेशक
दिल द मामला है
जहाँ कभी बसती थी 'तुम'

तुम और तुम्हारा स्पर्श
उन दिनों
कोलेस्ट्रॉल पिघला देते थे
शायद!
पर, इन दिनों उसी कोलेस्ट्रॉल ने
दिल के कुछ नसों के भीतर
बसा लिया है डेरा
बढ़ा दिया करती हैं धड़कनें
ख़ाम्ख़्वाह!

मेडिकल रिपोर्ट्स
बता रही हैं
करवानी ही होगी
एंजियोप्लास्टी
आखिर तुम व तुम्हारा स्पर्श
सम्भव भी तो नहीं है

Tuesday, January 15, 2019

आई लव यू


एक घंटे तैतीस मिनट
लम्बे मोबाइल कॉल के बाद
घूमते सांय-सांय करते पंखे के नीचे
सिहरता हुआ, बंद आँखों के साथ
महसूस रहा था 
प्रेम स्पंदित तेज धडकनों को
क्योंकि
प्रेमसिक्त वो ख़ास बोल
दूसरी तरफ से कहा जा चुका था
अंततः !
रूम मेट ने पूछा, झिड़कते हुए
क्या हुआ बे ?
आखिर, अचंभित व स्तब्ध
कुछ घबराहट भरे चेहरे के साथ
भविष्य के आगोश में
गुलाबी होंठो के फैंटेसी के साथ
स्वयं को महसूसते हुए
हकलाते हुए कह बैठा
- आज उसने कह ही दिया
"आई लव यू"
तीन शब्दों का
बेहद स्निग्ध अंग्रेजी स्वरुप
कर रहा था अंदर तक
उद्वेलित
कि जैसे उन शब्दों में उसने देखा हो
मोहब्बत का विश्वरूप !
अपनापन
आकर्षण का आवेग
प्यार भरी नजरें
सम्मोहन लबालब
मिलन की उत्कंठा
समर्पण बेहिसाब
सम्मिलन ... सब सब
प्लाट तैयार था
कहानी लिखी जा चुकी था
इंटरवल के बाद का मंचन भविष्य में था
आने वाले कल की बेचैनी थी !
आखिर प्रेम इतना तो मांगता है न !!

~मुकेश~