जिंदगी की राहें

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Friday, July 17, 2015

ख़्वाबों के सिकंदर


जिंदगी के कठिनतम दौर में
दर्द-दुःख जैसे झंझावातों से भरी सड़क पर
लड़ते-चलते बढ़े जा रहे थे हम!

कभी बुने थे हसीन व सुखदायी ख़्वाब
ख़्वाबों के सिकंदर थे हम
हाँ! सेल्युकस दी ग्रेट ही
खुद को समझते रहे हम !

पर ये क्या यार
हाँ, विषय कौतुहल का है
क्यों वास्तविकता की धरातल पर
जब दिखने एवं परखने की बारी आई
तो, खुद को आज के ग्रीस की धरती पर
पा रहे हैं हम!
हाँ यार!!
बस पता नही कैसे?
आम लोगों क्या मित्रों की नजरों में भी
कंगाल यूनानी बन गए हम !

कोई नही, दिन बदलेगा
फिर से ख़्वाब बुनेंगे, इतराएँगे
बिल गेट्स से किसी रईस का
लगा कर मुखौटा चेहरे पर
बंद आँखों में, स्वयं को लुभाएंगे
हार नही मानेंगे हम
ऐसे हैं हम
बेशक सबके नजरों में अजीब हैं हम !
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ग्रीस के तत्कालीन हाल पर, बस कुछ अलग पंक्ति बन गयी


Saturday, November 15, 2014

खुली आँखों से देखा सपना


मेरे कुछ ज्यादा चलते दिमाग ने
एक दिन, लगाई घोड़े सी दौड़
होगा एक दिन
स्वयं का ख़्वाबों सा घर
खुद के मेहनत के पैसों से
ख़रीदे हुए ईंट, रेत व सीमेंट का !
आभासी, ह्रदय के आईने में
देखा, उसमें कहाँ होगा दरवाजा
कहाँ होगी खिड़कियाँ, रौशनदान भी
गमले रखूँगा कहाँ
ये भी पता था मुझे !!

घर के लॉन में
हरे दूब पर नंगे पाँव चलते हुए
कैसे ओस के बूँद की ठंडक
देगी सुकून भरा अहसास
और तभी, एक गिलहरी पैरों के पास से
गुजर जायेगी
इस्स !! ऐसा कुछ सोचा !

उस आभासी घर के
डाइनिंग टेबल पर बैठ कर
चाय की सिप लेते हुए
खिड़की से दिखते दरख्तों के ठीक पीछे
दूर झिलमिलाती झील के कोने पर
बैठी सफ़ेद फ्लेमिंगो, एक टांग उठाये
कौन न खो जाए उसके खूबसूरती में
आखिर वो मेरे से ही मिलने तो आएगी
माइग्रेट कर के, बोलीविया के तटों से !!

मुझे पता नहीं और क्या क्या सोचा
जैसे बालकनी में
मनीप्लांट के गमले के
हरे पत्ते पर हल्का सफ़ेद कलर
मैं भी उस पत्ते को प्यार से थपकी देते हुए
महसूस रहा था
छमक कर आ रही
बारिश की बूंदों को !!

बहुत सोचने से अच्छी नींद आती है न
फिर ख़्वाबों में खोना या बुनना किसको बुरा लगे
पर, ये प्यारा सा ख़्वाब
फिर, नींद टूटते ही
- पापा!! स्कूल फीस !! आज नहीं दिए, तो फाइन लगेगा !!
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जिंदगी में कितने सारी उम्मीदें, सोच जवान होती रहती है ....... है न !!