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Tuesday, June 16, 2015

ऐसा ही प्यार


हूँ मुग्ध तुझ पर
जैसे दूर से आती
'कस्तूरी' की सुगंध
जो कभी भी नही आती पास
है तमन्ना तेरी ही
ऊपर नीचे होती साँसों में खोंने की
उस 'गुलमोहर' के पेड़ तले
ताकि लाल पंखुड़ियाँ गिरे टप से
तेरे चेहरे पर, मेरी नजरों के सामने
है लालसा तेरे हरपल
सान्निध्य की स्पर्श की
चाहत तेरे रक्तिम होंठो की
हाँ, बेशक खो जाऊं 'पगडंडियों' में
बस ऊँगली उलझी हो तेरे साथ
पुकारूं तुझे
और, बस 'गूँज' उठे फलक
'हमिंग बर्ड' के जूँ करती
धीमी सी आव़ाज
और तेरी छमक से
हो ऐसा ही बस आगाज
तुम चलों
'तुहिन' से नम भींगे घास पर
वो भी नंगे पाँव
ताकि मैं निहारूं उन धब्बों को
जो बनाते बढ़ जाओ तुम
हाँ मर ही जाऊं
तो हो जाऊं तृप्त
तेरी बाँहों में
तेरे ख्यालों में
तेरी बातों में......
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हमिंग बर्ड, कस्तूरी, पगडंडियाँ, गुलमोहर, गूँज और तुहिन मुझ से जुडी किताबें जो मेरे अन्दर कहीं आत्मसात हैं, तुम्हारे तरह ही !!