जिंदगी की राहें

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Monday, May 18, 2020

समर्पित कविता



क्या लिखी जा सकती है
कविता
जो हो तुम्हे समर्पित
जिसके शब्द शब्द में
तुमसे जुड़ा हर एहसास हो समाहित

जैसे, बहती नदी सा
कलकल करता बहाव
और दूर तलक फैली हरियाली
अंकुरण व प्रस्फुटन की वजह से
दे रही थी
सुकून भरी संतुष्टि

पर वहीं
समुद्र व उसका जल विस्तार
बताता है न
सुकून से परे
जिंदगी का फैलाव,
ज्वारभाटा की सहनशक्ति सहित
जैसे मस्तिष्क के भीतर
असंख्य नसों में
तरंगित हो बह रहा हो रुधिर ।
समुद्र की लहरों के एहसास सी तुम
और, तट से अपलक निहारता मैं ।

बसन्त के पहले की
सिहराती ठंडी पछुआ बयार
और फिर आ जाना पतझड़ का
मन तो कह ही उठता है न
उर्वर शक्ति हो चुकी है
बेहद कम
पर, रेगिस्तान में
जलते तलवों के साथ
बढ़ते चले जातें हैं दूर तलक
होता है दर्द तो
महसूसता हूँ मृग मरीचिका सी तुम को
और फिर आ ही जाता है
खिले फूलों की क्यारियों से सजा बसंत

जिंदगी देती है दर्द
ये समझना कुछ नया तो नहीं
पर ये भी तो मानो
कि, तुम्हारी चमक
जैसे पूनम के चाँद को देख कर
लगी हो, स्नेहसिक्त ठंडी छाया
और फिर
बंद आँखों के साथ
बालों में फेर रही हो तुम उंगुलियां !

सुनो ! नींद आ रही है !
कभी कभी जल्दी सोना भी चाहिए

~मुकेश~


Sunday, August 3, 2014

प्रेम कविता

एक तरुणी ने
अपने प्रेमी के कानों में
की सरगोशी ....
क्या तुम सचमुच मेरे प्रेम में हो ?
अगर हाँ, तो 
क्या मेरे लिए लिख पाओगे कविता ?

अरे ये कौन सी बड़ी बात
प्रेमी ने सोचा-समझा
युवती के आँखों में झाँका
कलम से रंगे कुछ पन्ने
जो फाड़ कर फेके गए
फिर, अंत में उसने चूमा
प्रेयसी का हाथ
लिख दिया उसके हथेली पर ही
मेरे अंतस से आ रही आवाज
मैं तुमसे करता हूँ प्यार !
खुद से ज्यादा !!

प्रेमिका की डबडबाई आँखे 

बोझिल मुंदी पलकों के साथ
समेटा खुद को, उसके बांहों में
बाँधी मुट्ठी अपने हथेली की
चिपका कर उसे सीने से
बोल उठी लरजते हुए
अंग्रेजी के तीन लफ्ज़
लव यू टू !!

उफ़! क्या प्रेम का सम्प्रेषण व
बहते दिल के उद्गार से
बेहतरीन, हो भी सकती है
कोई प्रेम कविता??

प्रेम सिक्त चार आँखें
और, चार हाथ
बस हो साथ साथ
खुद-ब-खुद रच जाती है
प्रेम कविता !!!!
---------------------
क्या बन पायी प्रेम कविता ?



Monday, March 14, 2011

छज्जे छज्जे का प्यार

[पिछले दिनों "जी टीवी" पर के धारावाहिक "छज्जे छज्जे का प्यार" कि शुरुआत हुई, बस देखते देखते तुकबंदी सी कुछ बना दी है...अब आप लोग भी झेलें..........:)]



बड़े से और बड़े होते शहर

पर सिमटती हुई जमीन
जिस कारण कम होते घर
एक आम कोलोनी के घर.
अतृप्त प्रेमी-प्रेमिका के बाँहों जैसे
एक दूसरे में आलिंगनबद्ध 
जिस कारण संकरी से संकरी होती गलियां
जैसे हो गयी हो लखनऊ की  भूलभुलैया..

फिर इन घरों के छज्जे '
नए नवेले जोड़ो की  तरह
हर दूसरे  छज्जे को 
स्पर्श करने के लिए बेक़रार
इन्ही छज्जो पे सूखते कपडे 
तो सूखती बड़ियाँ और अचार 
कभी मर्दों के अर्थशास्त्र की  बहस
चाय की  चुस्कियों के साथ
तो कभी बीबियों के हाथ की सूखती मेहँदी...
और साथ में शिकायतें और गप्पे हजार..
या फिर बच्चो की हुड -दंग
जो अंततः कभी कभी बन जाता जंग-ए-मैदान  !!

पर इन सबके अलावा
कभी कभी इन छज्जो से मिल जाती है 
सोलह की छोरी तो अठारह का छोरा 
और दो जोड़ी बेक़रार आँखें
किताब या कपड़ो की  ओट  का सहारा लेकर 
पर इस डर में भी दीन-दुनिया से अलग
सिहर जाते  है दो शरीर..
पनप उठता है प्यार....
जो दिल से होते हैं बेक़रार..
ऐसा है छज्जे छज्जे का प्यार........
प्यार......
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