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Friday, March 28, 2014

उदास कविता

दिल्ली फिल्म फेस्टिवल से ली गई एक तस्वीर

मैं भी लिखना चाहता हूँ

एक कविता उदासी पर

पाब्ला नेरुदा की तरह !

उकेरुंगा पन्नो पर

अंधकार, दर्द, व तिरस्कार

दर्द व घुटन का लबादा ओढ़ कर

रचूँगा शब्दचित्र

अश्कों भरी स्याही से

पर, मेरे अंदर की सोच

कभी कलम की नोक से

फूटती है मुस्कान

तो कभी दाँत दिखाते

झिलमिलाते सितारे

क्या जरूरी है उदास होना

एक उदास कविता के सृजन हेतु !


चलो काटो चिकोटी

या मारो थप्पड़

शायद ऐसे ही उदास सोच जन्में

या फिर सोचता हूँ वो चेहरा

हाँ वही !!

मेरे असफल प्रेम का प्रतीक !!

अब तो लिख पाऊँगा न !!

एक उदास कविता !!

गूगल से


Wednesday, March 26, 2014

वक़्त




तुम्हारा गुस्से से कहना कि

“कभी वक़्त है आपके पास मेरे लिए !”

अपने लिए समय का मांगना

मेरे अंदर की 

जलती प्रेम की मोमबत्ती से

तुम्हारे प्यारे के हलचल से

डबक कर मोम के गिरने सा

देता है अनुभव

आखिर ये अतिरेक प्रेम

ही तो कहती है

“हर दम चाहिए साथ”

काश! तुम ताजिंदगी

ऐसे ही मेरे साथ की

रखना चाहत !

वैसे भी, प्रेम के सिक्के में

दूसरे ओर ऐसे ही होती है

गुस्सा व क्षोभ

पर सिक्का उछलने पर

जीतना प्रेम का ही है !

विशुद्ध प्रेम !!

“लव यू” 


Friday, March 21, 2014

प्रेम व चुइंग-गम


कल जब टहल रहा था सड़कों पर

तो मुंह में थी चुइंग-गम

और मन में उभरी एक सोच

क्या ढाई अक्षर का प्यार

और चुइंग-गम है नहीं पर्यायवाची ?

नवजीवन की नई सोच !

फिर चूंकि सोच को देनी थी सहमति

इसलिए मुंह में घुलने लगा चुइंग-गम !


देखो न शुरुआत में अधिक मिठास

जैसे मुंह से निकलती मीठी “आई लव यू” की आवाज

अंतर तक जाते ठंडे-ठंडे प्यारे एहसास

वाह रे मिंट और मिठास


कुछ वक्त तक चुइंग गम का मुंह में घुलना

जैसे कुछ समय तक प्यार का

दो दिलों के भीतर प्यारे से एहसास को

तरंगित करते हुए महसूसना ...


पर समय के साथ

यही मिठास और ठंडे एहसास

घूल कर रिस जाते हैं

रह जाती है इलास्टिक खिंचवाट

जो न देती है उगलने, न ही निगलने

उगलो तो कहीं चिपकेगा

निगले तो सितम ढाएगा


ऐसा ही कुछ गुल खिलता है

ये आज का प्यार

और मुंह में डाला हुआ चुइंग गम !


जो फिर भी होता है सबका पसंदीदा

आखिर वो पहला मिठास

और तरंगित खूबसूरत एहसास

है न सबकी जरूरत !!


अंत में मेरी रचना चाय का एक कप सुनिए यू ट्यूब पर :)


Tuesday, March 18, 2014

मृत्यु



काश ! वतन के लिए

हो पाता शहीद

फिर चरकुटठे काफिन में

लायी जाती ....... !!

मेरा शरीर

अगरबती व लोबान के सुगंध में

फूल-मालाओं से प्रदीप्त होता

शायद, कुछ टोपियाँ भी झुकती

आंखे तो नम होती ही ॥ !!


पर लग रहा

किसी भेड़िये के आतंक से

डर कर, हो जाऊंगा शिथिल

फिर वो नोच लेगा बोटी बोटी

कहीं आत्मा भी न मर जाए

क्योंकि फिर

मरे हुए जानवर सा

बदबू देगा ........ मेरा शरीर !!


पता नहीं !!

भविष्य का ???




साथ में, वेब मैगजीन साहित्य रागिनी में मेरा साक्षात्कार पढ़ें, मुझे अच्छा लगेगा ! 

Friday, March 14, 2014

होली


होली का पर्व है अलबेला

है मस्ती भरा!!


जब भी आती है ये मनभावन होली

आता है याद

गाँव का कीचड़, साथ में गोबर, मिट्टी राख़ भी ...


जब भी आती है ये स्वादिष्ट होली

आता है मुंह में पानी

क्योंकि बनते ये घर घर में

मालपूआ, दहीबड़ा, गुजिया और बहुत से पकवान


जब भी आती है ये रोमांचक होली

मन के आंखो से दिख जाती है

माँ के उम्र की भौजियाँ

उनका रंगा हुआ गाल और खुद का छोटा सा

रंगो भरा हाथ


जब भी आती है ये यादगार होली

स्मृतियों मे होती है

मैया-बाबा को मेरा चरण-स्पर्श

अबीर-गुलाल के साथ

व माथे पर, मैया का प्रेम से अतिरेक चुम्मा


जब भी आती है रंग बिरंगी होली

दिख जाता है खुद का

झक्क सफ़ेद कुर्ता व पैजामा

और फिर उसके रंग जाने के कारण

मेरे बचपन की खीज और गुस्सा


जब भी आती है मस्त मस्त होली

तो आती है आवाज़

ढ़ोल मजीरे और भांग के साथ

मस्ती में गाते होली के गीत

खुशियाँ और संगीत


और अब जब भी आती है ये नशीली होली

होता है अपना

दो कमरे का घर

सिर्फ बीबी व बच्चो का साथ

थोड़ा अकेलापन, थोड़ा अनमनापन !! 


Saturday, March 8, 2014

बदलाव


जब भी मैं उन्मुक्त हो कर 
खुशी से झूमकर 
बिन सोचे समझे 
खिल खिला उठता 
तो वो कहती 
बड़े बुरे दिखते हो आप 
क्योंकि आगे वाले दो दाँतो के बीच का 
खुला पट
दिख ही जाता है, दूर से !!

जब भी दिल से 
अन्तर्मन से 
बहुत सोच समझ कर 
उकेरता कागज पर 
तो वो कहती 
बड़े बुरे दिखते हो आप 
क्योंकि 
कलम की सोच व 
सारी भाव भंगिमाएँ 
चेहरे को बुरी बनाती है 
दिख जाता है दूर से .... 

तभी तो 
मैंने 
बिना सोचे हँसना 
व 
सोच समझ कर लिखना 
छोड़ ही दिया है 
ठीक ही किया न !!