जिंदगी की राहें

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Tuesday, November 5, 2013

हाँ तुम !!


तुम हाँ तुम !! मेरे लिए हो रोटी-चावल-दाल जैसे ठोस जरूरी खाद्यान जीने के लिए जरूरी, अहम ! तुम मेरे लिए, मेरे अंदर पिघलता द्रव हो लाल बहते रक्त प्रवाह के तरह या फिर आंखो से बहते खारे पानी की जलधारा जो दर्द/खुशी हर समय बह निकलती है
तुम आक्सीजन हो साँसो में हर क्षण अंदर – बाहर जिया ही नहीं जा सकता तुम बिन ! तुम पदार्थ की हरेक अवस्था की तरह हो जरूरी ठोस-द्रव-गैस
तुम मेरी जरूरत मेरी शकसियत मेरी जिंदगी बस तुम ही तो हो !!
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मेरी धर्म पत्नी अंजू का आज जन्मदिन है, उसको शुभकामनायें !!



Thursday, October 31, 2013

स्पर्श !!


हाँ !
तुम्हारा वो पहला
स्पर्श !!
है मेरी में
कहीं समाहित
संयोजित
सहेजा हुआ !!

जो देती है
एक बहुत अलग सा कंपन
तरंग !!
वैसे ही
जैसे केहुनी पर
कभी कभी
टन्न से कुछ लगता है
तो झनझना उठता है
पूरा शरीर !! सर्वस्व!!

पर मैं
इस झन्नाहट को
महसूसना चाहता हूँ
बराबर! हरदम !!
संभव है ??
ए जिंदगी! तू खुद एक तरंग है कंपकंपी देती रहती है !! 




Friday, October 25, 2013

फ्लावर वेस (flower vase)



महंगे कीमती फ्लावर वेस में
करीने से लगा व सजा मेरा जीवन

मूल पौधे से कट कर फिर भी
पानी व खाद के साथ
एसी कमरे मे सजा कर
बढ़ा दी गई लाइफ मेरी
पर कहाँ रह पाता मेरा जीवन

वो पौधे से जुड़े रह कर खिलना
और फिर गर्मी व अंधड़ में
जल्द ही मुरझा जाना
मुझे तो दे दो ऐसा ही जीवन

दरख्तों से जुड़े रह कर
मुसकाना, खिलखिलाना
और फिर यूं ही गिरती पंखुड़ियों की  
बिछती शैया  मे शामिल हो जाना
मैं तो चाहता  बस ऐसा ही जीवन

पर रासायनिक खादों से भरपूर
जीवन देकर, फिर तोड़ कर
अंततः फ्लावर वेस में सजा कर
मत करो  बरबाद मेरा  जीवन

बिखेरने दो सुरभि मुझे
पराग निषेचन के लिए
आने दो मेरी पंखुड़ियों पर
तितलियों व भँवरों को
जुड़े रहने दो मुझे कंटीली झड़ियों से
मानों न एक खिलते फूल
का सादर निवेदन

मुझे दे दो मेरा जीवन !!


Wednesday, October 16, 2013

प्रेम-कविता




प्रेम! प्यार! इस ठहरती-दौड़ती जिंदगी में कभी एक बार तो आए मानो सितंबर महीने के मेंगों शावर की तरह.. या सुनहली साँझ के चमचमाते सूरज की तरह.. या फिर ऐसे समझो, मन में कोई प्रेम-कविता पनपी..... या फिर! अचानक मूसलाधार बारिश रेनिंग कैट्स एंड डॉग्स... बरसे प्यार, सिर्फ प्यार अंदर तक की संवेदनाएं हो जाएँ गीली ऐसे जैसे सूखे बंजर विस्तार में एक दम से उग आए.. जंगली घास... लहलहाए...... फिर?... फिर क्या ? जिंदगी! जीवन! प्यार! खुशी! सब आपस में गड्मगड.. फिर, बस रच जाएगा एक सुंदर “प्रेम-गीत”! और तब.. तब क्या ? तब भी हवाएँ सूखे पत्तों को उड़ा ले जायेंगी तब भी भौरें करेंगे पुष्प निषेचन पहले के तरह ही पर, प्रेम-गीत वो प्रेममय हो जाएगा बस इतना सा ही अंतर.. इसीलिए तो बस प्रेम! जीवन में एक बार तो आए ... बस एक बार!!



Wednesday, October 2, 2013

~: बापू :~


हैप्पी बड्डे बापू
तुमने हर समय, अपने जिंदगी के हर मोड़ पर
अहिंसा के पुजारी बन कर
सबको रास्ता दिखाया
ट्रेन से फेंके गए
पर बिना हल्ला-गुल्ला किये
गोरो को भारत से फेंक कर दिखाया
तुमने कहा
अहिंसा विज्ञान है
और विज्ञान असफल हो नहीं सकता
तभी तो बापू तुमने
अपने सोच व समझ को बांधे
अहिंसा का झण्डा थामे
बस दिखाई एक ही चाहत
कैसे हो स्वतंत्र भारत
और वो पूरा कर दिखाया
फिर भी लोगो का क्या
खूब जी भर कर गरियाते हैं
आखिर फैशन है,
इंटेलेक्चुअल दिख पाने का
बेशक, आज तक
सिर्फ अपने हक़ के लिए ही मरते हों
पर तुम्हे गरियाकर
अपना हक़ जताने की कोशिश करते हैं
बापू तुमने तो
देश के लोग जानवरों के प्रति
कितने रहमदिल हैं
इससे
देश की महानता और नैतिक विकास को
बड़े साधारण शब्दों में जोड़ कर कहा था
पर, लोग तो खून के प्यासे हो रहे
वो खून कैसा हो
इसकी कहाँ है फ़िक्र
पर फिर भी क्या बोलूं बापूू
बस कहूँगा कि
इतना भी आराम तुम पर नहीं भाता
मान लिया जन्नत में
आराम से चला रहे होगे चरखा
पर अभी कहाँ आराम बदा है
आ ही जाओ, कुछ तो करो
फिर से हम सब में
राष्ट्रीयता भर दो
देश के लिए मरने की चाहत यानि
एक चुटकी देश भक्ति दे देना बापू
बेशक अहिंसा छोड़ कर
चला ही देना लाठी
अब आ जाओ …………बापू
लव यू बापू !!
गांधी तेरी जय !
शास्त्री जी को भी नमन !
~मुकेश~


Monday, September 30, 2013

सरकारी बिल्डिंग का एक कमरा


हर दिन सुबह नौ बजे के घंटे के साथ
जिस कमरे में दाखिल होते हैं हम
वो पुरानी सरकारी बिल्डिंग का एक कमरा
पता नहीं क्यों??
उसे है, झूठ बोलने की बुरी लत
बेशक हम खुद को नहीं समझा पाये
पर, उसे हर क्षण समझाने की होती है कोशिश
'झूठ बोलना पाप है'.. 'भ्रष्टाचार गुनाह है'!
ढेरों फाइलों व पुराने आलमारियों से
लदा फदा ये अजीब सा कमरा
करता रहता है करोड़ो के हिसाब किताब!
पर, ये कमरा कभी नहीं बता पाता कि
इस कमरे में बैठे अधिकतर लोग
पैसों की तंगी झेलने वाले
हैं, दर्द से भरे, चुप्पी साधे, साधारण से लोग !!
कईयों बार, फाइलों के साथ, टेबल के नीचे
सुविधा युक्त कमरे में जीने वाले, दिखाते हैं नोटों की झलक
ला देती है कई आँखों में अनायास एक चमक
ये लुभाते हैं, खास होती है इनकी महक
पर उस साधारण से इंसान के धड़कते दिल की आवाज
“गुनाह है” के साथ रोक लेता है बढ़ता हाथ
फिर भी, ये सीलन भरी दीवार वाला कमरा
ब्रेकिंग न्यूज़ में शक जताती तस्वीर के साथ
बनता है लिविंग-रूम बहस का महत्वपूर्ण मुद्दा !!
महंगाई भत्ते की 4-5% की उतरोत्तर वृद्धि
जिसका एक-एक रुपया होता है अहम
तभी तो इसी कमरे मे हम बनाते हैं बजट
पर आम लोगों में ये बनती है एक ऐसी खबर
“सरकारी कर्मचारी के कारण 100 करोड़ का बोझ”
मानों हर डीए के बाद, वे बन जाते हैं करोड़पति
पर, इसी झूठ को सच बनाता है ये कमरा
बिना किसी सुविधा के धनवान बनाता कमरा !!
सच पर, झूठ का लबादा पहना ही देता है,
ये अजीब सा कमरा
खैर! बना ले हर सच को झूठ
दिखा दे कैसी भी तस्वीर
पर है तो, पालनहार, तारनहार
ये सरकारी कार्यालय का कमरा
बदलती जिंदगी में वाचाल होता ये कमरा
है न.....................
~मुकेश~
 


Monday, September 23, 2013

प्रेम गजल




अंततः एक कविता लिख ही डाली
मैंने
तुम पर !
कल रात ही तो
खबावों  के पन्ने पर
मन के कलम से.……
सच में !
बंद आँखों से
कुछ मानव जोड़े
लगते हैं बड़े खुबसूरत
प्यारा सा अहसास
प्यारी सी खुशबू
प्यारी सी फिजा
मैं तो हो गया फ़ना.!
काश !
किसी फ्रेम में टांक सकता
चलो कोई नहीं
कल गजल लिखूंगा
"प्रेम गजल"
सुनोगी न ………….  ?