जिंदगी की राहें

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Friday, September 6, 2019

जिंदगी का ओवेरडोज़


बचपन में थी चाहतें कि
बनना है क्रिकेटर
मम्मी ने कहा बैट के लिए नहीं हैं पैसे
तो अंदर से आई आवाज ने भी कहा
नहीं है तुममे वो क्रिकेटर वाली बात
वहीं दोस्तों ने कहा
तेरी हैंडराइटिंग अच्छी है
तू स्कोरर बन
और बस
इन सबसे इतर
फिर बड़ा हो गया
जिंदगी कैसे बदल जाती है न
सुर चढ़ा बनूंगा कवि, है न सबसे आसान
पर
हिंदी की बिंदी तक तो लगाने आती नहीं
फिर भी घालमेल करने लगे शब्दों से
भूगोल में विज्ञान का
प्रेम में रसायन का
गणित के सूत्रों से रिश्ते का
रोजमर्रा के छुए अनछुए पहलुओं का
स्वाद चखने और चखाने की
तभी किसी मित्र जैसे, ने मारा तंज़
कभी व्याकरण पढ़ लो पहले
तुकबंदी मास्टर
पर होना क्या था
मृत पड़े ज्वालामुखी से रिसने लगी
श्वेत रुधिर की कुछ बूँदें
जो सूख कर
हो गई रक्ताभ,
खैर न बन पाये तथाकथित कवि
बदलती जिंदगी कहाँ कुछ बनने देता है
कभी दिल से रही करीब, एक खूबसूरत ने
कहा, रहो तुम अपने मूल आधार से करीब
यही अलग करती है तुमको, सबसे
दिमाग का भोलापन ऐसा कि
स्नेह से सिक्त उसके माथे से चुहचुहाती बूंद के
प्रिज़्मीय अपवर्तन में खोते हुए
की कोशिश ध्यान की
की कोशिश मूलाधार चक्र को जागृत करने की
अजब गज़ब पहल करने की ये कोशिश कि
कोशिकाओं की माइटोकॉन्ड्रिया
जो कहलाती है पावर हाउस,
ने लगा दी आग
तन बदन में
जिंदगी फिर भी कहकहे लगाती हुई खुद से कहती है
क्या कहूँ अब जिंदगी झंड ही होती रही
फिर भी बना रहा है घमंड
आखिर खुशियों का ओवेरडोज़
दर्द भरी आंखो मे कैसे बहता होगा
पर बहाव ओवरडोज़ का हो या भावो के अपचन का
लेकिन इंद्रधनुष देखने को भीगापन तो चाहिए ही।
है न।

Friday, October 25, 2013

फ्लावर वेस (flower vase)



महंगे कीमती फ्लावर वेस में
करीने से लगा व सजा मेरा जीवन

मूल पौधे से कट कर फिर भी
पानी व खाद के साथ
एसी कमरे मे सजा कर
बढ़ा दी गई लाइफ मेरी
पर कहाँ रह पाता मेरा जीवन

वो पौधे से जुड़े रह कर खिलना
और फिर गर्मी व अंधड़ में
जल्द ही मुरझा जाना
मुझे तो दे दो ऐसा ही जीवन

दरख्तों से जुड़े रह कर
मुसकाना, खिलखिलाना
और फिर यूं ही गिरती पंखुड़ियों की  
बिछती शैया  मे शामिल हो जाना
मैं तो चाहता  बस ऐसा ही जीवन

पर रासायनिक खादों से भरपूर
जीवन देकर, फिर तोड़ कर
अंततः फ्लावर वेस में सजा कर
मत करो  बरबाद मेरा  जीवन

बिखेरने दो सुरभि मुझे
पराग निषेचन के लिए
आने दो मेरी पंखुड़ियों पर
तितलियों व भँवरों को
जुड़े रहने दो मुझे कंटीली झड़ियों से
मानों न एक खिलते फूल
का सादर निवेदन

मुझे दे दो मेरा जीवन !!


Wednesday, March 13, 2013

लाइफ आफ्टर डैथ


कहाँ जनता था उसे??? 
पर कुछ लोगों का ज़िन्दगी में शामिल होने या खोने पर अपना जरा भी बस नहीं होता.. सब यूँ होता है जैसे कोई ख्वाब देखा हो...
कब और कैसे, मेरी आभासी दुनिया में शामिल हो गया और फिर उस दायरे को लांघ गया .... बिलकुल दबे पाओं, हौले से,चुपचाप मुझे खबर तक न चली...
ये सोशल मीडिया की साइट्स पता नहीं क्यों, मुझे बहुत भाती रही हैं | कभी कभी लगता है इसकी मुख्य वजह मेरे लिए ज़िन्दगी में दोस्ती को तरजीह देना है तो कभी लगता है कहीं इसकी वजह मेरी दोहरी जिंदगी जीना तो नहीं? खुद को तनावमुक्त करने में बहुत मददगार रही हैं ये मित्रता भरी दुनिया... दरअसल मैं हूँ भी वास्तविकता मे थोड़ा चुप! शांत! पर इस सोशल मीडिया पर मुखर व मित्रवत।
उसने कब मुझे फ्रेंड रिकुएस्ट भेजी, कब मैंने एक्सेप्ट की, याद नहीं। फिर याद करने लायक कोई वजह भी तो नहीं था। सरसरी तौर पर एक फेक प्रोफ़ाइल जैसा ही तो था, बिना रियल फोटो के, यहाँ तक की "अबाउट मी" में भी ज्यादा कुछ खास नहीं लिख रखा था उसने।
हाँ ! उसकी पहली बात जो याद है मुझे, जब मैंने अपने एक मित्र की कविता शेयर की थी अपने वाल पर, कविता वास्तव मे मुझे ऐसी लगी थी जो बेहतरीन थी, पर उसको बड़ी नागावर गुजरी, और मेरे इनबॉक्स में उसका मैसेज चमका - "कुमार साब! इस कविता को शेयर करने की वजह?"
उफ़्फ़! एक दम से मैंने चिढ़ कर कहा - क्यों? तुम्हें क्या परेशानी, मुझे पसंद आया, शेयर किया, बस। और जिसकी रचना है, मुझे नहीं लगता उसको कोई दिक्कत होगी।
बस ये छोटी सी "तू-तू में-में" जान पहचान की शुरुवात थी , फिर कब और कैसे वो इतना करीबी हो गया, पता ही नहीं चल पाया। बाद में उसी मित्र ने बताया, जिसकी कविता मैंने शेयर की थी, कि "इस बंदे की जिंदगी के कुछ गिने चुने दिन ही बचे हैं, किसी ऐसे रोग से ग्रसित है।" इस्स !!!!!!
शायद ये जान कर मैं खुद में बदलाव महसूस कर रहा था... उसके पोस्ट पर बरबस नज़र चली जाती, उसका सबसे बात करना दीखता तो ख्याल आता जरुर की कैसे जीता होगा ये...जानते हुए भी की... ज़िन्दगी उसे पहले ही दाँव पर लगा चुकी है...
तो बस ऐसे ही हमारे नेट लाइफ मे शामिल हुआ ये शख्स , हर दिन लाइक्स और छोटे मोटे कमेंट्स के माध्यम से प्रागाढ़ता बढ्ने लगी, फिर धीरे धीरे म्यूचुअल दोस्तों की संख्या भी बढ्ने लगी। वो जब भी ऑनलाइन आता तो उसकी ज़िंदादिली व मस्ती अंदर तक खुशी ला देती। उसके शब्दों से खुशियाँ छलकती थी, बेशक वो दर्द में डूबा होता। एक दम जोकर जैसी जिंदगी, खुद दर्द में डूबकर सबको खुश देखना, कोई उस से सीखे। कहीं पढ़ा भी था - "वेदना के सुरों में ही स्वर्गिक संगीत की सृष्टि होती है"
उसके इस ज़िंदादिली के कारण कभी-कभी मुझे संदेह भी होता था कि ऐसा कैसे हो सकता है, इतने दर्द में जीता हुआ व्यक्तित्व ऐसे खुशियों से बगिया महकाए।  मैंने अपने मित्र से इस बात को कनफर्म करने की कोशिश भी की, क्या वास्तव में उसकी जिंदगी इतनी छोटी है?  हमारे एक ग्रुप का अहम सदस्य कब बन गया, ये भी नहीं समझ मे आया, हर कोई बस इसी बंदे को मिस करते ... । पर हाँ, मुझे उसका कुमार साब या सिन्हा साब कहना उतनी खुशी नहीं देता था , हर वक़्त लगता, मैं इस से उम्र मे बड़ा तो हूँ, मुझे इसको भैया संबोधित करना चाहिए। शायद ये मेरी उसके लिए अपनेपन की वो भावना थी जो मैं व्यक्त ही नहीं कर पा रहा था..पर हाँ मेरे अंदर उसमे मेरा छोटा भाई दिखने जरुर लगा, कह नहीं पा रहा था बस...पर कोई नहीं, उस बंदे का सिर्फ खुश होना ही खुशी देता था। मैं मन ही मन चाहता जरुर था और मानता भी था... एक दो बार अपने मित्र से ही उसका हाल चल पूँछ कर अपने बड़े भाई होने की जरुरत और अनुभूति को निभा लेता था... इस से ज्यादा कुछ करने के काबिल भी नहीं था।
पर अब वो अब वो बंदा धीरे धीरे 4-5 दिन में एक बार आता। पर जब भी आता, सिर्फ और सिर्फ खुशियाँ उसके चारो और बिखरी नजर आती। अब उसके ऑनलाइन दिखने का समय धीरे धीरे कम होने लगा था, कहीं अंदर से बुरा भी लगता। पर क्या करना, जिंदगी तो रुकती नहीं, कुछ पल या क्षण के लिए याद आ जाता फिर हम भी अपने दुनिया मे मस्त हो जाते, अपने दिनचर्या मे भूल जाते थे।
कुछ मित्रों के सहयोग से मैंने उसके शब्दो से बुनी हुई कुछ रचनाओं को एक साझा कविता संग्रह मे भी शामिल करने की कोशिश की थी, ताकि शायद इसी बहाने वो कुछ पल के लिए सच में मुस्कुराया हो।
पर जैसे वो हम सब की दुनिया में एकदम से शामिल हुआ था, वैसे ही एक दम से गायब भी हो गया। वो पिछले करीबन एक महीने से ज्यादा दिनों से नहीं दिखा। शायद ............ पर इस शायद में कितने सारे सोच शामिल हो जाते हैं, है न...... ।
उसके लाइक पेज में सबसे ज्यादा पेज डेथ से रिलेटेड थे... जैसे "लाइफ आफ्टर डैथ" उसका ज़िन्दगी जीने का ज़ज्बा बस इसी जन्म तक सीमित नहीं था... वो शायद और जीना चाहता था...जो वो किसी से कह नहीं पता था...उसकी विवशता...उसकी नियति... सब एक तरफ और उसकी जिंदादिली...सब पर हावी... यही वजह थी की वो कम समय में ही कई मित्रों का बेस्ट फ्रेंड बस चूका था... पर उसके मन की उथल पुथल का अंदाज़ा भी कोई नहीं लगा पा रहा था...
और फिर....
उसके पेज में उसके अभिन्न ने पिछले दिनों स्टेटस डाला था "पिछले शनिवार को वो गुजर गया" ....... उफ़्फ़! उस क्षण का अनुभव शब्दों में बयान करना मेरे लिए मुश्किल है... मैं उस वक़्त सोच में पड गया खुद के लिए कुछ ज्यादा दिक्कत सी बात नही पर... मेरा अन्तर्मन कह रहा था, काश वो सच में फेक प्रोफ़ाइल ही होता, जो एक दिन एक दम से मेरे लिस्ट से गायब हो जाता, और फिर....
फिर क्या 1074 मित्रों की सूची से एक कम होना, किसको फरक पड़ता है... 
जिंदगी कहाँ रुकती है.... सच है |


Tuesday, July 26, 2011

"क्वालिटी ऑफ़ लाइफ"



























कर रहे थे मेहनत
जी रहे थे कुछ रोटियों के साथ..
जो कभी कभी होती
थी बिना सब्जी के साथ...
पर रात की नींद 
होती थी गहरी
होती थी
रंग बिरंगे सपने के साथ 
पर इन्ही सुनहरे सपनो ने
फिर उकसाया
मेहनत की कमाई
महीने में एक बार मिलता वेतन
नहीं दे पायेगा..
ऐश से भरी जिंदगी
कैसे पाओगे
"क्वालिटी ऑफ़ लाइफ" 

क्या करोगे तो 
पा जाओगे ऐसा जीवन
कि हर सांसारिक सुख
हो जाये हासिल
जिसकी हो तमन्ना!!

चाहत थी बड़ी 
पर कोशिश में नहीं था दम
चाहिए था धन..
इसलिए किया 
जीवन मूल्यों से खिलवाड़ 
लिप्त हो गए
करने लगे भ्रष्टाचार
लगाई सरकारी खजाने में
घुसपैठ
हो गए वो सब अपने
जिसके देखे थे सपने...
पर जो न मिल पाया
वो था चैन
उड़ गयी थी घर कि शांति
फिर नहीं देख पा रहा था सपना
क्यूंकि नींद भी तो उड़ गयी थी अपनी .

क्वालिटी ऑफ़ लाइफ 
पाने कि चाहत
ने उड़ा दी थी चेहरे कि रंगत
उड़ा चुकी थी चेहरे कि रंगत..............


Thursday, February 4, 2010

~ लाइफ इन मेट्रो ~

कल की ही तो बात थी,
इस बड़े मानव जंगल में
सूर्यास्त के समय
रोड़े पत्थर के जंगलो के
बीच चलता जा रह था
एक आम जानवर की तरह
अपनी मांद की ऑर!!
.
तभी चौंका!
रस्ते में पड़ी थी
मेरे जैसे एक जानवर की "लाश"!!
घेर रखा था बहुतो ने........
शायद किसी अत्याचारी शिकारी ने
कर दिया था शिकार!
हो गया था बेचारा ढेर,
खून से लथ-पथ
निस्तेज, निर्विकार!!
.
उफ़!! चारो ऑर था!
कलरव, कोलाहल! मचा हुआ
परन्तु जो थे उसके चारो ऑर
वो भी थे तो जानवर ही
क्योंकि चिल्ला रहे थे
चीख रहे थे
पर, फिर खिसक रहे थे, चुपचाप..
जैसे वो ऐसे हादसे से थे बिलकुल अनभिज्ञ .......
.
मैं भी रुका,
हुआ स्तंभित!!
एक टीस सी उठी मन में!
अन्दर से एक हलकी सी आवाज आई --
"भगवन! इसकी आत्मा को शांति देना!"
लेकिन फिर! मैं भी
बढ़ गया आगे, धीरे से
आखिर मैं भी तो हूँ
इसी मानव जंगल का हिस्सा
भावना- शून्य !!
"एक जानवर"....................!!
.