जिंदगी की राहें

जिंदगी की राहें

Followers

Friday, April 1, 2011

इतिहास

फुर्सत के कुछ खास पलो में

एक दिन खोल बैठा

एक पुस्तक इतिहास कि

जैसे ही मेरे अँगुलियों ने

पलटे कुछ पन्ने,

तो फरफराते पन्नों

से उछल उछल कर बहुत सारे शब्द

करने लगे गुण-गान

कि कैसे बंद पड़ी थी म्यान

जहाँ से निकली तलवार

जिसके कारण बन गए राजा महान

कैसे राजाओं ने, रण-बांकुड़ो ने

दुश्मनों के खिंच लिए जबान

किसने बनवाया ताजमहल या कुतुबमीनार

किसके प्यार कि ये थी दास्तान.........



पर उस इतिहास कि पुस्तक

के हर पन्नो पर

उन उछलते कूदते शब्दों से बने वाक्य

जहाँ भी थमते थे

जहाँ भी होता था कोमा या पूर्ण विराम!

कुछ अनदेखे चेहरे

कुछ बेनामी लोगो

के साहस और दर्द कि आवाज

धीमे से कह रही थी.....

"इतिहास में हम बेशक हैं नहीं

पर हमने भी रचा है इतिहास.............."

Monday, March 14, 2011

छज्जे छज्जे का प्यार

[पिछले दिनों "जी टीवी" पर के धारावाहिक "छज्जे छज्जे का प्यार" कि शुरुआत हुई, बस देखते देखते तुकबंदी सी कुछ बना दी है...अब आप लोग भी झेलें..........:)]



बड़े से और बड़े होते शहर

पर सिमटती हुई जमीन
जिस कारण कम होते घर
एक आम कोलोनी के घर.
अतृप्त प्रेमी-प्रेमिका के बाँहों जैसे
एक दूसरे में आलिंगनबद्ध 
जिस कारण संकरी से संकरी होती गलियां
जैसे हो गयी हो लखनऊ की  भूलभुलैया..

फिर इन घरों के छज्जे '
नए नवेले जोड़ो की  तरह
हर दूसरे  छज्जे को 
स्पर्श करने के लिए बेक़रार
इन्ही छज्जो पे सूखते कपडे 
तो सूखती बड़ियाँ और अचार 
कभी मर्दों के अर्थशास्त्र की  बहस
चाय की  चुस्कियों के साथ
तो कभी बीबियों के हाथ की सूखती मेहँदी...
और साथ में शिकायतें और गप्पे हजार..
या फिर बच्चो की हुड -दंग
जो अंततः कभी कभी बन जाता जंग-ए-मैदान  !!

पर इन सबके अलावा
कभी कभी इन छज्जो से मिल जाती है 
सोलह की छोरी तो अठारह का छोरा 
और दो जोड़ी बेक़रार आँखें
किताब या कपड़ो की  ओट  का सहारा लेकर 
पर इस डर में भी दीन-दुनिया से अलग
सिहर जाते  है दो शरीर..
पनप उठता है प्यार....
जो दिल से होते हैं बेक़रार..
ऐसा है छज्जे छज्जे का प्यार........
प्यार......
.

Tuesday, March 1, 2011

आइना




मेरे कमरे में रखी 
गोदरेज के अलमारी में
लगा आदमकद "आइना"
जब भी देखता हूँ अपना अक्स
खुल जाती है पोल
न चाहकर भी चेहरे पर
दिख जाते हैं अशुद्ध विचार
हो ही जाता है सच का सामना...
बहुत की कोशिश
मिटा पाऊं बुरी इच्छाएं
मन में रह पाए सत्य
और सुगन्धित विचार
ताकि चेहरा दिखे विशुद्ध
जब सामने हो चमकीला आइना...
पर बदल न पाया
अन्दर का विचार
अत्तः नहीं आने देता
मैं चेहरे पे भाव
ताकि वो दिखे निर्विकार
पहचान न पाए आइना...
आखिर क्यों आईने के कांच के
अन्दर की गयी कलई
खोल ही देती है मेरी कलई
ऐसा ही तो करती है नारियां
पर दर्पण तब नहीं पढ़ पाता
भावनाओ को छुपाता
उद्गारों को दबाता
नारी का स्याह चेहरा
परिपक्वता के रंग में रंगा
बेशक दिखा देता है
काला हुआ सफ़ेद बाल
हमेशा की तरह
जिसको कभी
महसूस भी नहीं कर पाता आइना
इसलिए हमने भी सोच लिया
या तो रहे शुद्ध विचार
या फिर चेहरा दिखे निर्विकार
जब रहे सामने
ये आदमकद आइना !!

Sunday, February 20, 2011

वेलेंटाइन डे
























पिछले दिनों वैलेंटाइन डे पर मेरी ये रचना वट वृक्ष
पर आयी, जिसको मैं फिर से आप लोगो के समक्ष रखना चाहता हूँ........




वेलेंटाइन डे 
शब्द विदेशी
याद भी विदेशी
लेकिन एक साधारण दिन में असाधारण अहसास
वो भी बिलकुल देशी...
क्योंकि मोहब्बत का
प्रेम का, प्यार का साथ
देता है खुबसूरत विश्वास.....
एक दूसरे के प्रति चाहत हो जाती है उस दिन खास...

वैसे ये मुआ प्रेम है क्या?
हमारी देशी सोच कहती है
सब कुछ समर्पित कर देना
बिना सोचे सब कुछ खो देना
और फिर चहकते रहना.
किसी दूसरे के लिए सिर्फ जीना....है न...

प्रेम - अपने अन्दर
समेटे रखता है पूरी कायनात
जिंदगी की अनगिनत सच्चाई
होती है उस में लिपटी..
ये है वीरान जिंदगी में
खिला ऐसा फुल
जो महकाता है ब्रह्माण्ड

पर हाँ! इस खास दिन का प्रेम
बन गया ग्लोबल प्रेम
क्यूंकि इस प्रेम में उपस्थित
सेक्स व देहिक सोंदर्य
हो गया है लौकिक और फिजिकल !!

अगर इस दिन
हो जाए हमारी सोच निर्मल
बन जाये हमारा प्यार पवित्र गंगा जल
बिलकुल कोमल जैसे नदी की कल कल...
फिर हमारा कथन
होगा सच्चा चरितार्थ करता हुआ
"यू आर माय वैलेंटाइन ..."


Wednesday, February 9, 2011

इंडिया मांगे वर्ल्ड कप




एक बार फिर आया मौसम

बल्ले और बाल के बीच युद्ध का 
जमीनी चौकों और उड़ते छक्को का
विकेट के ऊपर से उडती गिल्लियों का
"हॉउस देट: के सम्मिलित अपील का
अपने ग्यारह नौजवानों के हौसला अफजाई का ...........

बहुत हुआ इंतज़ार
"धोनी" जल्दी से हो जा तैयार
ताकि हम देख सकें तुम सबो को
जीत के घोड़े पे सवार...
पता नहीं कब तुम सब हमारे मन में बसे
क्योंकि तुम्हारी जीत हम आम भारतियों में
लती है खुशियों का संचार....
तभी तो आटा गुंथती अम्मा का चेहरा
भी चहक उठता है...
जब "सचिन" तुम्हारा बल्ला बोलता है....
हमारे दिल की बजे मृदंग
यदि "सहवाग" का बल्ला बोले "हुर्र हुर्र दबंग"
"विराट, रैना व गंभीर"
जिनके शाट बताये ये हैं वीर, शुर वीर
"युसूफ और युवराज"...तुम इतने मरो चौक्के छक्के
की पूरा स्टेडियम गूंजे "चक दे, चक दे फट्टे"
"हरभजन-पियूष" अपनी फिरकी के दिखा दे जलवे
ताकि हम नाचते हुए कहेँ "बल्ले बल्ले"
"जाहिर, मुनाफ और नेहरा"
काश! तुम बालर्स पर बांध जाये जीत का सेहरा...

अंततः 
हम सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों का सपना
ये प्यारा विश्व क्रिकेट का कप कर दो अपना.............
यही है हमारी दिली तमन्ना.........:)



आप सबो से गुजारिश है ...अपनी शुभकामना सन्देश जरुर पोस्ट करें...........:)

Thursday, February 3, 2011

आज की अदालत



हमारे देश के आज की अदालत!

जो बनी थी, दूर करने के लिये अदावत!!

पर क्यूं फरियादी यहाँ सहता है जलालत!!!

क्यूं खून चूसते है, वकील जो करते हैं वकालत!!!!



अदालत का शांत कमरा

सन्तरी की तेज आवाज

बा-अदब बा-मुलायजा होशियार!

जज साहब पधार रहे हैं...

एक कटघरे में खड़ा फरियादी

भींगी आँखों में जिसकी है उम्मीद....!!

जज साहब की कड़क आवाज

आर्डर आर्डर!!!

जिसका अर्थ तथाकथित वकील समझता है

सच का कर दो "मर्डर"!!

काले लबादे में खड़ा वकील ...

अदब से...."माई लोर्ड"!!

दुसरे कटघरे में खड़ा ये मुजरिम

है बहुत बड़ा "फ्रॉड"!!

पर वो दे चूका है "रिवार्ड" !!

अत्तः दे दो इसको 'वेल' का "अवार्ड"!!



हाय रे न्याय का मंदिर!

तेरी अजब कहानी है

अपनी भूख मिटाने वाला

पांच - दस रूपये का चोर

हो जाता है अन्दर!!

और करोडो रूपये डकारने वाले

नेता....कहलाते हैं सिकंदर!!!

क्योंकि जज साहब के नजर में

वो होते हैं देश के जरुरत

देश के पालनहार..!!!!



यहाँ तक की अपनी अस्मत लुटा चुकी एक अबला

करती है रुदन चीत्कार..!

माई लोर्ड ! करें मेरे साथ न्याय

सामने खड़े व्यक्ति ने किया है बलात्कार!!

दानव रूपी वकील की ठहरती हुई आवाज

जो भूल चूका भारतीय संस्कार!!!

ऐसे ऐसे प्रश्नों की करता है बौछार!!!!

लगता है भरी सभा में फिर से

कईयों ने किया उस अबला का फिर से बलात्कार...!!!!!



फिर भी जब भी दिखती है

ढकी आँखों वाली न्याय के देवी की मूर्ति!

हर न्याय पसंद इंसान की उम्मीद...

कभी तो ये पट्टी हटेगी!

कभी तो न्याय का तराजू का पलड़ा होगा बराबर

कभी तो अमीरी गरीबी के न्याय में

नहीं होगी पैसे की दीवार...

कभी तो सबको मिलेगा न्याय

नहीं होगा अन्याय....

कभी तो ऐसा होगा...

कभी तो.............!!
 
 
 

Friday, January 14, 2011

जिम्मेवारियों तले दबता सपना....


















जवान हो रहा था बचपन
जब उसके आँखों में
खिलने लगे थे स्वप्न
वैसे तो जिंदगी में
थी खिलखिलाहट
मिला वो प्यार व दुलार
जिसका था वो हकदार
पर वो सपना
जो उसने आँखों
में था संजोया...
वो टिमटिमा रहा था
.
क्योंकि उस सपने को
जहाँ था देखा
मन के उस झक्क सफ़ेद
कैनवेस में भरने वाले
रंगों में थी
चमचमाहट की जरुरत
पर कुछ जिम्मेवारियों ने
उधेर दी थी रंगों की चमक
चहकता दमकता सपना
थोड़ा फीका होकर हुआ अपना....
.
सपनो की जगमग बगिया में
जैसे ही जिम्मेवारी की छाया
ने लिया बसेरा...
सतरंगी सपना
हुआ धूमिल
पर कोई नहीं.....
.
जो थी मृग-तृष्णा
हम में भी है 'दम'
कुछ जरुर कर पाएंगे हम
वास्तविकता के धरातल तले
जिम्मेवारी के बोझ तले
बस उस से थोड़े ही हैं कम....
आज कल कभी कभी
आँखे हो जाती है नम
जब बंद आँखों के सामने
थिरक जाती है...
वो पुराने सपने का जखम...
.
लेकिन फिर से चौंधियाने लगी है
वो नम आँखे
क्योंकि सुनहले सपने
फिर से लगे झिलमिलाने
बस बदल गए किरदार
पहले होता था स्वयं
अब होते हैं उसके पुत्र....
शायद कोई तो हो
सपनो का तारणहार..........
उसको कर सके
गुलजार...........
होगा न............???.

ऐसे ही .......... J कुछ भी J