जिंदगी की राहें

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Wednesday, August 19, 2015

अर्ध-निर्मित घर





अर्ध-निर्मित घर
और उसमे रहने वाले लोग

प्लास्टर, रंग रोगन व साज सज्जा की
बाट जोहता अधूरा घर
ठीक वैसे ही जैसे
उसको बनवाने वाला शख्स
उम्र गुजर चुकने के बाद भी
नही मिला उसे वो स्तर,
वो तकदीर
जिसकी थी उम्मीद,
उस बौद्धिक मेहनतकश को ,
पर रही उम्मीदें बरकरार, इन्टैक्ट
उस ढीले हो चुके किवाड़ की तरह
जो है बेअसर, लग चुकने के बाद भी
अर्ध निर्मित घर की प्राइवेसी को
समेटने में

फिर भी वो ढीला ढाला किवाड़
हर बार चर्र की प्रतिध्वनि के साथ
खुलता बंद होता
याद दिलाता रहता है,
कि एक बार है जरूरी रीकन्स्ट्रकशन का

शायद, जल्द ही
हो पाए प्लास्टर विथ प्लास्टर ऑफ़ पेरिस
एंड वाइट सीमेंट !
फिर लगेगा जरुर रंग व पेंट
साथ में, मेरा वाला ग्रीन !

शायद जल्द ही
मिल पाए वो सब कुछ
हर दिन करता है वो
भगवन की मिन्नतें -
पैसा भगवान् तो नही
पर उसके बाद है सब कुछ !

अपेक्षाओं की है प्रतीक्षा
क्योंकि उस अर्धनिर्मित घर की
ढिबरी की लौ में
पढ़ने वाला जोड़ेगा नया सीमेंट
क्योंकि
दसवीं में वो पा चुका 96 परसेंट !

उम्मीदें सुकून देती हैं, और
अर्ध निर्मित घर की नींव को
बनाती हैं अम्बर सरिया सा मजबूत
फिर
आशाएँ जीने के लिए
विटामिन बी काम्प्लेक्स की गोलियां ही तो हैं !

याद रखना
हर अधूरा बेशक नहीं होता पूरा
पर नहीं होता बुरा

~मुकेश~

Monday, March 30, 2015

पुरुष मन और बच्चियां


छोटी छोटी
नन्ही, खुबसूरत व प्यारी सी बच्चियां !

पार्क में, घर के सामने
खिलखिलाती दौड़ती है
साथ ले जाती मन को
दुनियावी विसंगतियों से दूर
भुला  देती है हर स्याह सफ़ेद!
कुछ पलों के लिए
परियों के देश सा
अहसास देता है ये पार्क
जब चंचल, खुशियों भरी हंसी
ठुनकन व गुस्सा
सब गड्डमड्ड करके
एक साथ खिलती है कलियाँ
और, बच्चियां !!

हाँ! चाहता है मन
भूलूं  उम्र के रंग
भागूं खेलूं उनके संग
जी लूं सतरंगी बचपन!

उफ़, पर ये हर दिन की न्यूज
जिसमे होता है बच्चियों का शोषण व बलात्कार
कलंकित करती छुअन
फिर उनसे उपजते
उनको ही तार तार करते व्यूज
लग ही जाता है ब्रेक स्वयंमेव हाथों में
महसूसने लगता हूँ
नागफनी की टहनियां!!

खुद के हाथ ही लगते हैं ऐसे
जैसे दरिन्दे की लम्बी नाख़ून भरी हो झाड़ियाँ
न न न! ऐसे में लहुलुहान न हो जाएँ
ये बचपन, ये परियां !

दहलता है दिल
फुट पड़ता है ज्वालामुखी कहीं अन्दर! क्यूँ?
हर दिन! हर पल!
दिख ही जाता है खलनायक
खूनी आँखे ! आईने में !!

मर्द हूँ न!
साफ़ नज़र के लिए
आईना पोछने लगता हूँ
ढूंढ़ नहीं पाता रक्त सम्बन्ध
पर ये अखबार
उनके जलते समाचार
जलाते हैं यार !!
 इस जलन ने शायद
आज कुछ हौसला भर दिया
 सच ही तो हो तुम सब
मेरी परियां
हाँ सच ...
मेरी इसकी उसकी सबकी परियां

परों वाली परियां!!
तुम्हारे परों में
इन्द्रधनुषी रंगों में
एक रंग मेरा एक उसका
और एक उसका भी होगा
उड़ो जितना उड़ सको!!
पंखो की ताकत
तुम्हे तुम्हारे आस्मां तक ले जाएगी
खुद को अकेला ना समझना !!
____________________
नन्ही, खुबसूरत व प्यारी सी बच्चियां !


Monday, April 14, 2014

मनीप्लांट



मनी प्लांट की लताएँ
हरी भरी होकर बढ़ गई थी
उली पड़ रही थी गमले से बाहर
तोड़ रही थी सीमाएं

शायद पौधा अपने सपनों मे मस्त था
चमचमाए हरे रंगे में लचक रहा था
ढूंढ रहा था उसका लचीला तना
आगे बढ़ने का कोई जुगाड़
मिल जाये कोई अवलंब तो ऊपर उठ जाए
या मिल जाए कोई दीवार तो उस पर छा जाए

पर तभी मैंने हाथ में कटर लेकर
छांट दी उसकी तरुणाई
गिर पड़ी कुछ लंबी लताएँ
जमीन पर, निढाल होकर
ऐसे लगा मानों, हरा रक्त बह रहा हो
कटी लताएँ, थी थोड़ी उदास
परंतु थी तैयार, अस्तित्व विस्तार के लिए
अपने हिस्से की नई जमीन पाने के लिए
जीवनी शक्ति का हरा रंग वो ही था शायद

गमले की शेष मनी प्लांट
थे उद्धत अशेष होने के लिए
सही ही तो है, जिंदगी जीने की जिजीविषा

आखिर जीना इतना कठिन भी नहीं ......।
.. तमसो मा ज्योतिर्गमय ।।

~मुकेश~




Wednesday, February 19, 2014

कैनवेस


गूगल से 

था एकांत! मन में आया विचार
काश! मैं होता एक ऐसा चित्रकार
हाथ में होती तक़दीर की ब्रश

और सामने होती,
कैनवेस सी खुद की ज़िन्दगी
जी भर के भरता, वो सब रंग
जो होती चाहत, जो होते सपने

होते सारे चटक रंग
लाल, पीले, हरे, नारंगी
या सफ़ेद, आसमानी
जैसे शांत सौम्य रंग

ताकि मेरे तक़दीर की ब्रश
सजा पाती ज़िन्दगी को
जहाँ से दीदार कर पाते हैं ढेरों खुशियाँ
सिर्फ खुशियाँ !!

पर इन चटक और सौम्य रंगों के
मिश्रण से ही एक और रंग बना
जो था श्याम, थी कालिख
जो है रूप अंधकार का
जो देता है विरोधाभास!!

दी जिंदगी ने समझ
अगर नहीं होगा दुख और दर्द
तो नहीं भोग पाएंगे सुख
अहसास न हो पायेगा ख़ुशी का.... !!

फिर दर्द से भरे चित्र अनमोल होते है, ये भी सुना मैंने 


~मुकेश~


Friday, January 14, 2011

जिम्मेवारियों तले दबता सपना....


















जवान हो रहा था बचपन
जब उसके आँखों में
खिलने लगे थे स्वप्न
वैसे तो जिंदगी में
थी खिलखिलाहट
मिला वो प्यार व दुलार
जिसका था वो हकदार
पर वो सपना
जो उसने आँखों
में था संजोया...
वो टिमटिमा रहा था
.
क्योंकि उस सपने को
जहाँ था देखा
मन के उस झक्क सफ़ेद
कैनवेस में भरने वाले
रंगों में थी
चमचमाहट की जरुरत
पर कुछ जिम्मेवारियों ने
उधेर दी थी रंगों की चमक
चहकता दमकता सपना
थोड़ा फीका होकर हुआ अपना....
.
सपनो की जगमग बगिया में
जैसे ही जिम्मेवारी की छाया
ने लिया बसेरा...
सतरंगी सपना
हुआ धूमिल
पर कोई नहीं.....
.
जो थी मृग-तृष्णा
हम में भी है 'दम'
कुछ जरुर कर पाएंगे हम
वास्तविकता के धरातल तले
जिम्मेवारी के बोझ तले
बस उस से थोड़े ही हैं कम....
आज कल कभी कभी
आँखे हो जाती है नम
जब बंद आँखों के सामने
थिरक जाती है...
वो पुराने सपने का जखम...
.
लेकिन फिर से चौंधियाने लगी है
वो नम आँखे
क्योंकि सुनहले सपने
फिर से लगे झिलमिलाने
बस बदल गए किरदार
पहले होता था स्वयं
अब होते हैं उसके पुत्र....
शायद कोई तो हो
सपनो का तारणहार..........
उसको कर सके
गुलजार...........
होगा न............???.

ऐसे ही .......... J कुछ भी J

Monday, April 26, 2010

कैनवस



एकांत में बैठे-बैठे सोचा
काश! मैं होता ऐसा चित्रकार
कि हाथ में होती तक़दीर की ब्रश
और सामने होती, एक ऐसी कैनवस
जो होती खुद की ज़िन्दगी
जिसमें मैं रंग पाता अपनी चाहत
भर पाता वो कुछ खास रंग,
जो होते मेरे सपने, होते जो बेहद अपने

जरूरत होती कुछ चटक रंगों की
लाल, पीले, हरे, नारंगी
या सुर्ख सुफैद व आसमानी
जैसे शांत सौम्य रंग
ताकि मेरे तक़दीर की ब्रश
सजा पाए ज़िन्दगी को
जहाँ से झलके बहुत सारी खुशियाँ
सिर्फ खुशियाँ !!

तभी किसी ने दिलाया याद
इन चटक और सौम्य रंगों के मिश्रण में
है एक और रंग की जरूरत
जिसे कहते हैं "स्याह काला"
जो है रूप अंधकार का
जो देता है विरोधाभास
ताकि जिंदगी में हो सब-सब
मलिन, निराशाजनक, अंधेरा, विषादपूर्ण

तब आया समझ
जब तक दुःख न होगा
दर्द न होगा
नहीं भोग पाएंगे सुख
अहसास न हो पायेगा ख़ुशी का
और इस तरह
मैंने अपने सोच को समझाया
अब हूँ मैं खुश, प्रफुल्लित
अपनी ज़िन्दगी से
अपने इस रंगीन कैनवस से

जिसमें भरे है मैंने सारे रंग
दुःख के भी
दर्द के भी
साथ में सहेजे हैं,
खुशियों के कुछ बेहतरीन पल..............!!!