जिंदगी की राहें

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Monday, April 14, 2014

मनीप्लांट



मनी प्लांट की लताएँ
हरी भरी होकर बढ़ गई थी
उली पड़ रही थी गमले से बाहर
तोड़ रही थी सीमाएं

शायद पौधा अपने सपनों मे मस्त था
चमचमाए हरे रंगे में लचक रहा था
ढूंढ रहा था उसका लचीला तना
आगे बढ़ने का कोई जुगाड़
मिल जाये कोई अवलंब तो ऊपर उठ जाए
या मिल जाए कोई दीवार तो उस पर छा जाए

पर तभी मैंने हाथ में कटर लेकर
छांट दी उसकी तरुणाई
गिर पड़ी कुछ लंबी लताएँ
जमीन पर, निढाल होकर
ऐसे लगा मानों, हरा रक्त बह रहा हो
कटी लताएँ, थी थोड़ी उदास
परंतु थी तैयार, अस्तित्व विस्तार के लिए
अपने हिस्से की नई जमीन पाने के लिए
जीवनी शक्ति का हरा रंग वो ही था शायद

गमले की शेष मनी प्लांट
थे उद्धत अशेष होने के लिए
सही ही तो है, जिंदगी जीने की जिजीविषा

आखिर जीना इतना कठिन भी नहीं ......।
.. तमसो मा ज्योतिर्गमय ।।

~मुकेश~




Monday, March 14, 2011

छज्जे छज्जे का प्यार

[पिछले दिनों "जी टीवी" पर के धारावाहिक "छज्जे छज्जे का प्यार" कि शुरुआत हुई, बस देखते देखते तुकबंदी सी कुछ बना दी है...अब आप लोग भी झेलें..........:)]



बड़े से और बड़े होते शहर

पर सिमटती हुई जमीन
जिस कारण कम होते घर
एक आम कोलोनी के घर.
अतृप्त प्रेमी-प्रेमिका के बाँहों जैसे
एक दूसरे में आलिंगनबद्ध 
जिस कारण संकरी से संकरी होती गलियां
जैसे हो गयी हो लखनऊ की  भूलभुलैया..

फिर इन घरों के छज्जे '
नए नवेले जोड़ो की  तरह
हर दूसरे  छज्जे को 
स्पर्श करने के लिए बेक़रार
इन्ही छज्जो पे सूखते कपडे 
तो सूखती बड़ियाँ और अचार 
कभी मर्दों के अर्थशास्त्र की  बहस
चाय की  चुस्कियों के साथ
तो कभी बीबियों के हाथ की सूखती मेहँदी...
और साथ में शिकायतें और गप्पे हजार..
या फिर बच्चो की हुड -दंग
जो अंततः कभी कभी बन जाता जंग-ए-मैदान  !!

पर इन सबके अलावा
कभी कभी इन छज्जो से मिल जाती है 
सोलह की छोरी तो अठारह का छोरा 
और दो जोड़ी बेक़रार आँखें
किताब या कपड़ो की  ओट  का सहारा लेकर 
पर इस डर में भी दीन-दुनिया से अलग
सिहर जाते  है दो शरीर..
पनप उठता है प्यार....
जो दिल से होते हैं बेक़रार..
ऐसा है छज्जे छज्जे का प्यार........
प्यार......
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