जिंदगी की राहें

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Monday, March 30, 2015

पुरुष मन और बच्चियां


छोटी छोटी
नन्ही, खुबसूरत व प्यारी सी बच्चियां !

पार्क में, घर के सामने
खिलखिलाती दौड़ती है
साथ ले जाती मन को
दुनियावी विसंगतियों से दूर
भुला  देती है हर स्याह सफ़ेद!
कुछ पलों के लिए
परियों के देश सा
अहसास देता है ये पार्क
जब चंचल, खुशियों भरी हंसी
ठुनकन व गुस्सा
सब गड्डमड्ड करके
एक साथ खिलती है कलियाँ
और, बच्चियां !!

हाँ! चाहता है मन
भूलूं  उम्र के रंग
भागूं खेलूं उनके संग
जी लूं सतरंगी बचपन!

उफ़, पर ये हर दिन की न्यूज
जिसमे होता है बच्चियों का शोषण व बलात्कार
कलंकित करती छुअन
फिर उनसे उपजते
उनको ही तार तार करते व्यूज
लग ही जाता है ब्रेक स्वयंमेव हाथों में
महसूसने लगता हूँ
नागफनी की टहनियां!!

खुद के हाथ ही लगते हैं ऐसे
जैसे दरिन्दे की लम्बी नाख़ून भरी हो झाड़ियाँ
न न न! ऐसे में लहुलुहान न हो जाएँ
ये बचपन, ये परियां !

दहलता है दिल
फुट पड़ता है ज्वालामुखी कहीं अन्दर! क्यूँ?
हर दिन! हर पल!
दिख ही जाता है खलनायक
खूनी आँखे ! आईने में !!

मर्द हूँ न!
साफ़ नज़र के लिए
आईना पोछने लगता हूँ
ढूंढ़ नहीं पाता रक्त सम्बन्ध
पर ये अखबार
उनके जलते समाचार
जलाते हैं यार !!
 इस जलन ने शायद
आज कुछ हौसला भर दिया
 सच ही तो हो तुम सब
मेरी परियां
हाँ सच ...
मेरी इसकी उसकी सबकी परियां

परों वाली परियां!!
तुम्हारे परों में
इन्द्रधनुषी रंगों में
एक रंग मेरा एक उसका
और एक उसका भी होगा
उड़ो जितना उड़ सको!!
पंखो की ताकत
तुम्हे तुम्हारे आस्मां तक ले जाएगी
खुद को अकेला ना समझना !!
____________________
नन्ही, खुबसूरत व प्यारी सी बच्चियां !


Friday, June 27, 2014

जूते के लेस


जूते के लेस 
बेचारे बंधे बंधे रहते हैं, हर समय 
छाती पर बंधे हाथों की तरह 
एक दम सिमटे, गांठ बांधे 
पर देते हैं एहसास 
सब कुछ समेटे रखने का 
चुस्त, दुरुस्त !! 

कभी कभी थके बाहों जैसे 
जूते के लेस भी 
चाहते हैं लहराना हाथों के तरह ही
एक आगे, एक पीछे के
तारतम्य के साथ
तो, कभी बेढ़ब चाल में
चाहते हैं फुदकना
मस्त अलमस्त !!

तभी तो लेफ्ट राइट होते
पैरों के नीचे, पैंट के सतह से
टकरा कर ये लेस
करते हैं कोशिश खुलने का
बहुत बार खुल कर
दिखा ही देते हैं, आजादी
कहते हैं, बहुत हुए त्रस्त और पस्त!!

बड़े होते हैं बदमाश
ये जूते के लेस
जान बुझ कर, खुद ही
दब जाते हैं जूते से
गिर जाता है बलखा कर
जूते पर जो खड़ा था
दिखा रहा था अकड़ !

आखिर "अहमियत" भी
है एक शब्द !
जूता हो, या हो जूते का लेस
या हो सर की टोपी, या हो बटन !!



Monday, July 1, 2013

'मैं हो चुकी किसी और की'..



'मैं हो चुकी किसी और की'..
कहते कहते फफक पड़ी थी
जब दिखाया था उसने..
मुझे अपने मेहँदी रचे हाथ..

था, साल रहा.. अब उम्र भर की
जुदाई का ख्याल
तभी तो ज़ोर से पकड़ा
हुआ था अंतिम बार मेरा हाथ !!

वो निशानियाँ प्यार की..
वो चिट्ठियाँ.. तोहफे..
सब धू-धू कर जल रहे थे
मेरे सामने.. मेरे साथ !!

खुद थी अश्कों से सराबोर..
और मुझे दिला रही थी दिलासा,
'अगले जनम में, पक्का-पक्का
रहेंगे न साथ-साथ!!'

था, मुझसे ज्यादा ग़म,
बिछड्ने का उसे..
तभी तो वक्त-ए-रुखसत
पर
भाग गयी थी.. छुड़ा कर मुझसे अपना हाथ!!




Tuesday, January 3, 2012

हाथ की लकीरें


























ये  हाथ की लकीरें
छपी होती है 
मकड़े के जालों जैसी 
हथेली पर 
जिसमे  रेखाएं
होती है अहम्
जिनके मायने 
होतें हैं ..हर बार
अलग अलग
एक छोटा सा क्रास 
एक नन्हा सा  तारा
बदल देता है 
उनके अर्थ
या फिर
लकीरों का
मोटापा या दुबलापन
भी बढ़ा देती है 
हमारी परेशानी

चन्द्र बुध
शुक्र बृहस्पति
जैसे ग्रहों को
इन जालों में समेटे 
हम लड़ते हैं ..
ढूंढते हैं खुशियाँ
इन लकीरों में ही 
कभी चमकता दिखता 
भाग्योदय
तो कभी ..प्रकोप
शनि दशा का !!!!!!
और हम  
रह जाते हैं...
मकड़े की तरह
फंसे इन लकीरों में..
इन जालों की तरह
उकेरी  हुए लकीरों 
को अपने वश में 
करने हेतु 
हम करते हैं धारण
लाल हरे पीले
चमकदार
महंगे-सस्ते  पत्थर
अपनी औकात को देखते हुए 
बंध के
रह जाते हैं..
पर..किन्तु परन्तु में
हो जाते हैं 
लकीर के फ़कीर


वहीँ जिसने ढूढी
एक और राह ..
तो फिर 
जहाँ चाह वहीँ राह..
इन लकीरों से 
भरी हथेलियों को
भींच लिया 
मुठी में 
एक इमानदार 
 कोशिश ..बस इतना ही 
शायद बन जाय शहंशाह 
तकदीर से ऊपर 
उठ कर 
मेहनत का बादशाह..........!!!!