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Tuesday, January 3, 2012

हाथ की लकीरें


























ये  हाथ की लकीरें
छपी होती है 
मकड़े के जालों जैसी 
हथेली पर 
जिसमे  रेखाएं
होती है अहम्
जिनके मायने 
होतें हैं ..हर बार
अलग अलग
एक छोटा सा क्रास 
एक नन्हा सा  तारा
बदल देता है 
उनके अर्थ
या फिर
लकीरों का
मोटापा या दुबलापन
भी बढ़ा देती है 
हमारी परेशानी

चन्द्र बुध
शुक्र बृहस्पति
जैसे ग्रहों को
इन जालों में समेटे 
हम लड़ते हैं ..
ढूंढते हैं खुशियाँ
इन लकीरों में ही 
कभी चमकता दिखता 
भाग्योदय
तो कभी ..प्रकोप
शनि दशा का !!!!!!
और हम  
रह जाते हैं...
मकड़े की तरह
फंसे इन लकीरों में..
इन जालों की तरह
उकेरी  हुए लकीरों 
को अपने वश में 
करने हेतु 
हम करते हैं धारण
लाल हरे पीले
चमकदार
महंगे-सस्ते  पत्थर
अपनी औकात को देखते हुए 
बंध के
रह जाते हैं..
पर..किन्तु परन्तु में
हो जाते हैं 
लकीर के फ़कीर


वहीँ जिसने ढूढी
एक और राह ..
तो फिर 
जहाँ चाह वहीँ राह..
इन लकीरों से 
भरी हथेलियों को
भींच लिया 
मुठी में 
एक इमानदार 
 कोशिश ..बस इतना ही 
शायद बन जाय शहंशाह 
तकदीर से ऊपर 
उठ कर 
मेहनत का बादशाह..........!!!!




81 comments:

anju(anu) choudhary said...

हाथ की लकीरे ...और अन्धविश्वास पर अच्छे से लिख डाला ...बहुत खूब


कहते है की हाथ की लकीरे भी बदल जाती है
जब कोई अपना हर हाल में साथ देने चला आता हैं
बन कर वो माझी इस जीवन का ,डूबने से बचाने
चला आता हैं ||

Dr. vandana singh said...

अमूमन सभी जिंदगी के इस मकड़ जाल में जब तब उलझते रहते हैं... किन्तु कितना सार्थक है ये उलझना.... आपकी रचना ने बखूबी बयाँ कर दिया... इस सकारात्मक रचना और संवेदनशील सृजन पर आपको बहुत बहुत बधाई...

Rakesh Kumar said...

तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!!!!

वाह! कमाल की प्रस्तुति है आपकी.
अंधविश्वास का परदाफाश करती.

प्रस्तुति के लिए आपका आभार.

ऋता शेखर 'मधु' said...

बहुत सुंदर रचना...परिश्रम का महत्व तो है,यह जानते हुए भी लकीरों के पीछे भागते हैं हम!

Er. सत्यम शिवम said...

बहुत सुंदर और सटीक वर्णन...भाग्य की रेखा खुद बनती है इंसान के मेहनत और लगन से।

कुश्वंश said...

वाह मुकेश जी बेहतरीन कविता ,शुभकामनाएं

shikha varshney said...

जय हो ज्योतिष महाराज :) ..मजाक के अलावा एक बेहतरीन सोच की कविता.कथ्य और शिल्प दोनों शानदार.

JAINA said...

Zara Si Zindagi Hain,Armaan Bohat Hain
Hamdard Nahin Koi,Insaan Bohat Hain
Dil Ka Dard Sunaye To Sunaye Kis Ko
Jo Dil Ke Qarib Hain,Wo Anjan Bohat Hain........bhut hi achha mukesh ji

JAINA said...

Zara Si Zindagi Hain,Armaan Bohat Hain
Hamdard Nahin Koi,Insaan Bohat Hain
Dil Ka Dard Sunaye To Sunaye Kis Ko
Jo Dil Ke Qarib Hain,Wo Anjan Bohat Hain........bhut hi achha mukesh ji

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुन्दर भावों को सजाये अच्छी रचना ..

Pallavi said...

मेहनत काश इंसान ही असल ज़िंदगी का शहशाह होता है जैसे वो कहते है न गब्बर सिंह क्या कह कर गया जो दर गाया वो मर गया...वाह बहुत सुंदर भावों से सजी प्रभावशाली रचना

Rajiv said...

Andhvishwas ki lakiron ko kuredane ke liye badhai,bhai Mukesh.

रेखा said...

सुन्दर और सार्थक भावों के साथ लिखी गई रचना ...

ρяєєтii said...

Haath ki Lakire - kya kya bata jaati hai, seekha jaati hai, samjha jaati hai... yeh Haath ki Lakire...

Bahut hi Umdaa ... :)

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया सर!


सादर

कुमार संतोष said...

वाह क्या बात है !
बहुत ही सुंदर लिखा है आपने !

आभार !

Mahima Mittal said...

bahut hi sundar kavita

नीरज गोस्वामी said...

बेजोड़ रचना...

नीरज

दीप्ति शर्मा said...

bahut umda rachna

Rajesh Kumari said...

इन लकीरों से
भरी हथेलियों को
भींच लिया
मुठी में
एक इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!!!!
jitni bhi tareef ki jaaye utni kam hai behtreen rachna.

संजय भास्कर said...
This comment has been removed by the author.
संजय भास्कर said...

वाह !!!वाह !!! वाह!!!!इतने दिनों बाद दर्शन दिए....मुकेश जी
सुन्दर कविता.. आपकी श्रेश्तम कविताओ में एक...

Neelima said...

वहीँ जिसने ढूढी
एक और राह ..
तो फिर
जहाँ चाह वहीँ राह..
इन लकीरों से
भरी हथेलियों को
भींच लिया
मुठी में
एक इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!!!!ek ssshakt post ........ ek ek shabd beendha hua sa ....... antarman mai bhi hamare isi tarah vicharo ka makr jal hota hai kitna mushkil hota hai na is makarjal se niaklna bhi ............ aap badhai k patr hai is khoobsurat rachna k lie . hamare jaise navoditt person ke lie ek prerna strotra

रश्मि प्रभा... said...

लकीरों से बढ़कर अपना विश्वास होता है ... बहुत अच्छा , कितनी प्रखर होती जा रही है तुम्हारी लेखनी

kshama said...

Wah! Bahut,bahut sundar!Ekdam anoothee rachana!

kshama said...

Aapko naya saal mubarak ho!

प्रवीण पाण्डेय said...

हमने मेहनत कर हाथ की लकीरें बदलना सीख लिया है।

मनोज कुमार said...

वैचारिक ताजगी लिए हुए रचना विलक्षण है।

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन और सार्थक अभिवयक्ति......

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 29 -12 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज... अगले मोड तक साथ हमारा अभी बाकी है

अरुण चन्द्र रॉय said...

बेहतरीन कविता ...एक बेहतरीन सोच की कविता

vidya said...

वाह...
बेहतरीन कविता..
सार्थक सोच...
बहुत खूब............

anjana said...

अच्छा लिखा है आप ने ....हाथ की लकीरो ओर अन्धविश्वास पर ..... सुंदर प्रस्तुति....

Abhishek said...

मुझे इसे पढ़कर बस एक गाना याद आ रहा है

हाथों की चंद लकीरों का, ये खेल है सब तकदीरों का!

तक़दीर भला मैं क्या जानू, मैं आशिक हूँ तदबीरों का!!

सदा said...

तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!
वाह ...बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

pravesh soni said...

अच्छी रचना है ...अन्धविश्वास पर तंज ...किस्मत हाथ की लकीरों से नहीं हाथ से मेहनत करने पर बनती हे ,तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते

pravesh soni said...
This comment has been removed by the author.
soma said...

बहुत अच्छा लिखा है मुकेश जी जीवन का सार्थक सच

निवेदिता said...

कभी-कभी आत्मबल संभालने के लिए भी इस तरह की सोच का सहारा लिया जाता है .......अच्छा लिखा है ...:)

दिलबाग विर्क said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच-749:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

Mamta Bajpai said...

वहीँ जिसने ढूढी
एक और राह ..
तो फिर
जहाँ चाह वहीँ राह..
इन लकीरों से
भरी हथेलियों को
भींच लिया
मुठी में
एक इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!!!!
बहुत सुन्दर

कौशल किशोर said...

bahut badhiya likha...

दिलीप said...

bahut badhiya sir...

***Punam*** said...

हम करते हैं धारण
लाल हरे पीले
चमकदार
महंगे-सस्ते पत्थर
अपनी औकात को देखते हुए
बंध के
रह जाते हैं..
पर..किन्तु परन्तु में
हो जाते हैं
लकीर के फ़कीर

अन्धविश्वास.......विश्वास....???

Neelam said...

वाह मुकेश जी .. अब आप ज्योतिषी महाराज भी बन गए, वैसे आपका ये रूप भी सराहनीय है ! अब आप कवि बन चुके हैं . हमे भी सीखने को एक गुरु मिल गए आपके रूप मे!
सुन्दर और सार्थक भावों के साथ लिखी गई रचना है ये आप मेरी और से बधाई स्वीकार करें ...:)

Anand Dwivedi said...

इन लकीरों से
भरी हथेलियों को
भींच लिया
मुठी में
एक इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही ..
....
हाँ बंधु बस इतना ही तो ...मेरे ख्याल से इतना काफ़ी रहेगा ग्रह-गोचर कि शांति के लिए ! :)

ASHOK ARORA said...

इन
लकीरों से
भरी
हथेलियों को
भींच
लिया
मुठी
में
एक
इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद
बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ
कर
मेहनत का बादशाह..........!!!!

एक बेहतरीन रचना है ...अन्धविश्वास पर एक सटीक क़टाक्ष्...किस्मत हाथ की लकीरों से नहीं हाथ से मेहनत करने पर बनती है।..शब्दोँ का इस्तेमाल भी बहुत सुन्दरता के साथ साथ किया गया.है।...बधाई..आप को इस रचना के लिये...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

मुकेश भाई!
अपने चिर-परिचित अंदाज़ में आपने अंधविश्वास के मकडजाल और उसमें फंसे इंसान की व्यथा बयान की है.. एक ज़बरदस्त प्रवाह है कविता में... बहुत खूब!!
पुनश्च:
आपने ही बड़े भाई से मुँह मोड़ लिया था मुकेश भाई... कभी भूले भटके भी दरवाजा नहीं खटखटाया..!!वो तो भला हो बच्चे का जिसने हमें मिला दिया!! एक बार फिर, जीते रहो मेरे लाल!!

Reena Maurya said...

बहुत ही सुन्दर और सार्थक सन्देश देती रचना है...

दर्शन कौर 'दर्शी' said...

कमाल की लकीरे हें --इसीलिए तो कहते हैं 'तक़दीर का बादशाह ' यह लकीरे ही तो इंसान को फकीर बनाती हैं और शहंशाह भी ! पर इन सबसे ऊपर हें मेहनत और सच्चाई --जहाँ ये लकीरे हो वहाँ सारी स्किमे फेल हो जाती हें ---

modesty India said...

मत इंतज़ार कराओ हमे इतना
कि वक़्त के फैसले पर अफ़सोस हो जाये
क्या पता कल तुम लौटकर आओ
और हम खामोश हो जाएँ

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

रचना बहुत अच्छी है।
इसे एक सशक्त अभिव्यक्ति ही कहूँगा!

डॉ. जेन्नी शबनम said...

बहुत सशक्त रचना है. सच है हमारे अंधविश्वास हमें उलझाए रखते हैं. संदेशप्रद रचना , बधाई.

शिवम् मिश्रा said...

बस कोशिश यही होनी चाहिए ... ज़िन्दगी इन लकीरों में उलझ कर ना रह जाए ...

वन्दना said...

एक इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!!!………………सटीक व सार्थक अभिव्यक्ति…………सकारात्मक सोच को दर्शाती रचना ……।जीवन लकीरों मे नही मेहनत मे कैद होता है

अरुण चन्द्र रॉय said...

बहुत सुंदर रचना.....संवेदनशील सृजन पर आपको बहुत बहुत बधाई...

Dr. Ashok Kumar Palmist said...

बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति है । बहतरीन रचना के लिए आभार मुकेश भाई!

रेखाएँ बदलने के लिए महनत(कर्म) तथा सकारात्मकता की आवश्यकता होती है।अतः जो भी इंसान इस आवश्यकता को पूरा करेगा । वो ही आपकी इन अनमोल पंक्तियोँ मेँ सजीवता उत्पन्न कर देगा ।
आपका लेखन इसी तरह मानव मन को तरंगित करते रहना चाहिए।

आपको भी बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। मुकेश भाई!

रेखा श्रीवास्तव said...

vaah bahut sundar.!

रजनी मल्होत्रा नैय्यर said...

mukesh ji bahut khub likha hai aapne hath ki lakeeron par.......

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... सच तो ये है की मेहनत हाथ की लकीरों से आगे है ...

वाणी गीत said...

तदबीर से संवारी जाए तकदीर ...
बेहतरीन !

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर लिखा, हम लकीरों के चक्कर में औरों के सामने हाथ फैलाये घूमते हें कि कोई कुछ अच्छा बता दे लेकिन ये हाथ जब कर्म करते हें तो उसकी लकीरे खुद ब खुद बदल जाया करती हें और ये इस विद्या के विज्ञ भी बतलाते हें कि रेखाएं बनती और बिगड़ती रहती हें और इसके लिए मनुष्य के कर्म बहुत सहायक होते हें.
बड़ा सुंदर विश्लेषण किया हें. इसके लिए बधाई.

anilanjana said...

बुलबुलों की धरा पर जो बोये
वो बीज थे चाँद सितारे
ग्रहों नक्षत्रों की चाल में
कहीं उलझ गए वो बेचारे
X X X
गूलर के फूल पड़े ढीठ स्वप्न...
दिखाते रहे कितने ही नज़ारे
रूखे सूखे तिनके सा वक़्त
उड़ गया ले के
न जाने कितने बहाने
केंचुल बदल बदल कर
जिंदगी लग गयी ठिकाने
leking zindgi thikane to keede makodon ki bhi lag jati hai..par
एक इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह....aisi soch ek sarthak jeevan jeene ke liye dishasuchak ka karya karti hai.....hamesha ki tarah sehaj ..saral..hridaygrahya....aur vastvik jeevan ki jhalak dikhata..god bless u mukesh

अल्पना वर्मा said...

तदबीर से तकदीर बनाने का संदेश बखूबी देती हुई अच्छी कविता.

somali said...

sach kaha sir mehnat ka mahatv jante hue bhi hum haathon ki lakeeron me hi uljhe rehte hain....or shayad isiliye kai baar koshish bhi nahin karte

Udan Tashtari said...

वाह!! उम्दा अभिव्यक्ति!!

Mukesh Kumar Sinha said...

Kavita Rathi: इन लकीरों से
भरी हथेलियों को
भींच लिया
मुठी में
एक इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!!!! ye hui na baat...apni kismat hai apne hi hath...KISMAT TO UNKI BHI HOTI HAI JINKE HATH NAHI HOTEY..!!
12 January at 11:34 · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Chanda Jaiswal: बड़ा ही उम्दा लिक्खा है मुकेश ...मगर ...
------------------------------------
कुछ अपनी तक़दीर से डर लगता है
हाथ की उस लक़ीर से डर लगता है
----------------------------------
12 January at 13:57 · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Riya Agarwal: kismat ka tha khel jo na ho saka apna mail .

Dhosh ek dusre ko hum de nahi sakte .

Hathon ki lakeeron ko hum badal nahi sakte .
12 January at 14:08 · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Shweta Agarwal: bahut badhiya aur dil ko chune wali panktiyaan likhi hai aapne....lekin mere mann mein ye baat aa rahi hai....keh rahi hun....lekin pls bura na lagaiyega.....maafi chahti hun.....

Dosh hai ye us khuda ka jisne humare haathon me ye jaal banaya....Makde ki tarah isme hume fansaya.....aye kaash ke ye lakeerein na banyi hoti to humein bhi shayad.....Mutthi bheenchne ki koshish na karni padti.
12 January at 15:00 · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Amit Anand Pandey: इन लकीरों से

भरी हथेलियों को

भींच लिया

मुठी में

एक इमानदार

कोशिश ..बस इतना ही

sundar
12 January at 11:51 · Unlike · 2

Mukesh Kumar Sinha said...

Bhavana Thakkar: Too good and True also
12 January at 11:36 · Like

Mukesh Kumar Sinha said...

Shashi Purwar:wah bahut khoob
12 January at 12:29 · Unlike · 2

Mukesh Kumar Sinha said...

Sonal RastogiL:par inko nakaar bhi to nahi paate..haanthon mein hai apne
12 January at 13:56 · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Ragini Bharateesh : superlikeeeeeeeeeeeeeeeeeee
12 January at 14:13 · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Om Purohit Kagad : ये बात.....जय हो !
12 January at 17:28 · Unlike · 1
Shashi Mittal : itna viswas hath ki lakeero par...
12 January at 18:57 · Unlike · 1

Minakshi Pant said...

इन लकीरों से
भरी हथेलियों को
भींच लिया
मुठी में
एक इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!!!!
वाह क्या खूब पहचाना सच कहा आपने अगर सिर्फ इन आडी - तिरछी रेखाएं ही हमारा भविष्य होती तो मेहनत करने की तो कोई जरूरत ही न होती पर नहीं सच्चाई तो ये नहीं ये रेखाएं भी तभी बोलती हैं जब हम मेहनत से कुछ पाने के काबिल होते हैं .........बेहद खुसुरत रचना :)

Virendra Kumar Sharma said...


वहीँ जिसनेढूंढ़ी
एक और राह ..
तो फिर
जहाँ चाह वहीँ राह..
इन लकीरों से
भरी हथेलियों को
भींच लिया
मुठ्ठी में
एक ईमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!!!!

बेहद का प्रवाह लिए बढ़िया

रचना . मेरे चिठ्ठे पे aapkee tippani meri dharohar hai .

Kailash Sharma said...

इन लकीरों से
भरी हथेलियों को
भींच लिया
मुठी में
एक इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!!!!

.....लाज़वाब! सकारात्मक संदेश देती बहुत प्रभावी रचना...

abha khare said...

इन लकीरों से
भरी हथेलियों को
भींच लिया
मुठी में
एक इमानदार
कोशिश ..बस इतना ही
शायद बन जाय शहंशाह
तकदीर से ऊपर
उठ कर
मेहनत का बादशाह..........!!!!.. sach kaha apni kismat apne mehnatkash haathon me hoti hai ...sashakt abhivyakti

Samta Sahay said...

मेहनत से अपने हाथों की लकीरें खुद बना सकते हैं।
बहुत अच्छी कविता !