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Monday, April 14, 2014

मनीप्लांट



मनी प्लांट की लताएँ

हरी भरी होकर बढ़ गई थी

उली पड़ रही थी गमले से बाहर

तोड़ रही थी सीमाएं


शायद पौधा अपने सपनों मे मस्त था

चमचमाए हरे रंगे में लचक रहा था

ढूंढ रहा था उसका लचीला तना

आगे बढ्ने का कोई जुगाड़

मिल जाये कोई अवलंब तो ऊपर उठ जाए

या मिल जाए कोई दीवार तो उस पर छा जाए


पर तभी मैंने हाथ में कटर लेकर

छांट दी उसकी तरुणाई

गिर पड़ी कुछ लंबी लताएँ

जमीन पर, निढाल होकर

ऐसे लगा मानों, हरा रक्त बह रहा हो

कटी लताएँ, थी थोड़ी उदास

परंतु थी तैयार, अस्तित्व विस्तार के लिए

अपने हिस्से की नई जमीन पाने के लिए

जीवनी शक्ति का हरा रंग वो ही था शायद


और गमले में शेष मनी प्लांट

था उद्धत अशेष होने के लिए

सही ही तो है, जिंदगी जीने की जिजीविषा


आखिर जीना इतना कठिन भी नहीं ...... 




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