Followers

Monday, April 14, 2014

मनीप्लांट



मनी प्लांट की लताएँ

हरी भरी होकर बढ़ गई थी

उली पड़ रही थी गमले से बाहर

तोड़ रही थी सीमाएं


शायद पौधा अपने सपनों मे मस्त था

चमचमाए हरे रंगे में लचक रहा था

ढूंढ रहा था उसका लचीला तना

आगे बढ्ने का कोई जुगाड़

मिल जाये कोई अवलंब तो ऊपर उठ जाए

या मिल जाए कोई दीवार तो उस पर छा जाए


पर तभी मैंने हाथ में कटर लेकर

छांट दी उसकी तरुणाई

गिर पड़ी कुछ लंबी लताएँ

जमीन पर, निढाल होकर

ऐसे लगा मानों, हरा रक्त बह रहा हो

कटी लताएँ, थी थोड़ी उदास

परंतु थी तैयार, अस्तित्व विस्तार के लिए

अपने हिस्से की नई जमीन पाने के लिए

जीवनी शक्ति का हरा रंग वो ही था शायद


और गमले में शेष मनी प्लांट

था उद्धत अशेष होने के लिए

सही ही तो है, जिंदगी जीने की जिजीविषा


आखिर जीना इतना कठिन भी नहीं ...... 




8 comments:

Dimple Kapoor said...

Really awesome words ..Mukesh ji jeena rehna itna kathin nhi par zindagi ko jeena sach mein kathin hi hai ....

parul chandra said...

बहुत सुंदर है मनी प्लांट की कहानी..जीना सिखाती हुई।

Shalini Kaushik said...

very nice expression .

Aparna Sah said...

jine ki jijivisha ko puri tarah puri karti hai...Maniplant...kitni lachili..kitna samayojan...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (15-04-2014) को "खामोशियों की सतह पर" (चर्चा मंच-1574) पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

आशीष भाई said...

बढ़िया रचना , मुकेश सर धन्यवाद व स्वागत है मेरे लिंक पे -
Information and solutions in Hindi ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )
~ ज़िन्दगी मेरे साथ - बोलो बिंदास ! ~ ( एक ऐसा ब्लॉग -जो जिंदगी से जुड़ी हर समस्या का समाधान बताता है )

Digamber Naswa said...

जीने कि आशा लिए ... मनी प्लांट .. बहुत खूब ...

Agyaat said...

सच कहा..जीना इतना कठिन भी नहीं !