जिंदगी की राहें

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Monday, November 11, 2019

ब्यूटी लाइज इन द आइज ऑफ द बीहोल्डर


हो बेहद खूबसूरत
इतना ही तो कहा था
कि बोल उठी
लजाती भोर सी
हल्की गुलाबी स्नेहिल प्रकाश के साथ
रंग बिखेरती हुई
- ब्यूटी लाइज इन द आइज ऑफ द बीहोल्डर
तत्क्षण
आंखों की पुतलियों संग
छमकते प्रदीप्त काली चकमक संगमरमर सी
कोर्निया और रेटिना के मध्य
लहरा उठा सारा संसार
कहाँ तक निहारूं ?
हो सकता है,
खूबसूरती की वजह थी
निकटता का अक्षुण्ण एहसास
या फिर
आखों के उस
गहरे लहराते संसार में
प्रेम का चप्पू थामे
डूबता उतराते महसूस रहा था
भीग चुके मन के अन्दर की नमी को
या पता नहीं
थी एक अलग तरह की उष्णता
उसके पास आने के वजह से
दूसरों के आवाजाही से इतर
प्रेम के रौशनदान सरीखे
उसके आँखों में ही
सिमटते हुए
चाह रहा था समझना कि
क्यों न एक सपनों का घोंसला हो
इन पलकों के भीतर
और बरौनियों का झीना पर्दा रहे हरसमय
ताकि प्रेम के आगोश का सुख
ताकते हुए ले सके चुपचाप
निहारने का सुख
निकटता के भाव को नवीनीकृत करने का
एक तर्कसंगत युक्ति भर ही तो है
.... है न !!!
~मुकेश~
साहित्य आज तक 2019 में कविता पढ़ते हुए

Monday, September 30, 2019

प्रेमसिक्त धड़कन



तेज धड़कनों का सच
समय के साथ बदल जाता है

कभी देखते ही
या स्पर्श भर से
स्वमेव तेज रुधिर धार
बता देती थी
हृदय के अलिंद निलय के बीच
लाल-श्वेत रक्त कोशिकाएं भी
करने लगती थी प्रेमालाप
वजह होती थीं 'तुम'


इन दिनों उम्र के साथ
धड़कनों ने फिर से
शुरू की है तेज़ी दिखानी
वजह बेशक
दिल द मामला है
जहाँ कभी बसती थी 'तुम'

तुम और तुम्हारा स्पर्श
उन दिनों
कोलेस्ट्रॉल पिघला देते थे
शायद!
पर, इन दिनों उसी कोलेस्ट्रॉल ने
दिल के कुछ नसों के भीतर
बसा लिया है डेरा
बढ़ा दिया करती हैं धड़कनें
ख़ाम्ख़्वाह!

मेडिकल रिपोर्ट्स
बता रही हैं
करवानी ही होगी
एंजियोप्लास्टी
आखिर तुम व तुम्हारा स्पर्श
सम्भव भी तो नहीं है

Friday, September 6, 2019

जिंदगी का ओवेरडोज़


बचपन में थी चाहतें कि
बनना है क्रिकेटर
मम्मी ने कहा बैट के लिए नहीं हैं पैसे
तो अंदर से आई आवाज ने भी कहा
नहीं है तुममे वो क्रिकेटर वाली बात
वहीं दोस्तों ने कहा
तेरी हैंडराइटिंग अच्छी है
तू स्कोरर बन
और बस
इन सबसे इतर
फिर बड़ा हो गया
जिंदगी कैसे बदल जाती है न
सुर चढ़ा बनूंगा कवि, है न सबसे आसान
पर
हिंदी की बिंदी तक तो लगाने आती नहीं
फिर भी घालमेल करने लगे शब्दों से
भूगोल में विज्ञान का
प्रेम में रसायन का
गणित के सूत्रों से रिश्ते का
रोजमर्रा के छुए अनछुए पहलुओं का
स्वाद चखने और चखाने की
तभी किसी मित्र जैसे, ने मारा तंज़
कभी व्याकरण पढ़ लो पहले
तुकबंदी मास्टर
पर होना क्या था
मृत पड़े ज्वालामुखी से रिसने लगी
श्वेत रुधिर की कुछ बूँदें
जो सूख कर
हो गई रक्ताभ,
खैर न बन पाये तथाकथित कवि
बदलती जिंदगी कहाँ कुछ बनने देता है
कभी दिल से रही करीब, एक खूबसूरत ने
कहा, रहो तुम अपने मूल आधार से करीब
यही अलग करती है तुमको, सबसे
दिमाग का भोलापन ऐसा कि
स्नेह से सिक्त उसके माथे से चुहचुहाती बूंद के
प्रिज़्मीय अपवर्तन में खोते हुए
की कोशिश ध्यान की
की कोशिश मूलाधार चक्र को जागृत करने की
अजब गज़ब पहल करने की ये कोशिश कि
कोशिकाओं की माइटोकॉन्ड्रिया
जो कहलाती है पावर हाउस,
ने लगा दी आग
तन बदन में
जिंदगी फिर भी कहकहे लगाती हुई खुद से कहती है
क्या कहूँ अब जिंदगी झंड ही होती रही
फिर भी बना रहा है घमंड
आखिर खुशियों का ओवेरडोज़
दर्द भरी आंखो मे कैसे बहता होगा
पर बहाव ओवरडोज़ का हो या भावो के अपचन का
लेकिन इंद्रधनुष देखने को भीगापन तो चाहिए ही।
है न।

Wednesday, September 4, 2019

जन्मदिन


जब सैंतालीस,
धप्पा करते हुए बोले अड़तालीस को
जी ले तू भी उम्मीदों भरा साल
है भविष्य के गर्त में कुछ फूल
जो बींधेंगे उंगलियों को
क्योंकि है ढेरों काटें भरे तने
तब तुम सब हैप्पी बड्डे कहना।
जब सैंतालीस
करे याद छियालीस की झप्पी को
जो सर्द निगाहों से ताक कर
नम हो चुकी आवाज में
पिछले बरस थी, बोली
स्नेह पापा का भी समेटो
बरस भर ही तो हुआ
जब गए थे पप्पा इसी दिन
बेशक मम्मी के फोन पर झिझक कर
थैंक यू कह लेना
पर तुम सब मुझे हैप्पी बड्डे कहना
जब सैंतालीस
के सपने में
पैंतालीस ने सिसकते हुए
पापा की जलती चिता की गर्मी को महसूसा
जिसने नम आंखों से था देखा
ऊष्मा में आशीर्वाद
समय बीत गया अब तो
सुनो तुम सब हैप्पी बड्डे जरूर कहना।
जब सैंतालीस
आने वाले उनचास और
फिर खिलखिलाते पचास को
आसमां के सितारों में ढूंढे
और जाते जाते कह दे मुस्कुरा कर
बेशक मर जाना, पर मुक्कू तुम न बदलना
तुम, तुम्हारा बचपना
तुम्हारी सुनहरी छवियां जो अब बता रही उम्र
फिर भी ख़ुश ही रहना
इसलिए मैं खुद कह रहा हूँ
तुम सब, सब सब
हैप्पी बड्डे जरूर कहना।
कहोगे न।
~मुकेश~

Wednesday, August 7, 2019

सावन-भादों

ब्लॉगर ऑफ द इयर के उपविजेता का अवार्ड 

तुम्हारी अनुपस्थिति में
है न,
सावन-भादो
बादल

बारिश
बूँदें !
पर,
हर जगह
चमकती-खनकती
तस्वीर
सिर्फ तुम्हारी !
पारदर्शी हो गयी हो क्या?
या
अपवर्तन के बाद
परावर्तित किरणों के समूह सी
ढ़ल जाती हो
तुम !!
बूँद और तुम
दोनों में
शायद है न
प्रिज्मीय गुण !!
तभी तो चमकती हो
छमकती भी हो
चमकते ही रहना
तुम !!



💝

Wednesday, July 17, 2019

'एक्वारजिया'



'एक्वारजिया'
या करूँ उसका अनुवाद तो
अम्लराज ! या शाही जल !
पर, अम्लरानी क्यों नहीं ?
ज़िन्दगी की झील में
बुदबुदाते गम
और उसका प्रतिफल
जैसे सांद्र नाइट्रिक अम्ल और
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का ताजा मिश्रण
एक अनुपात तीन का सम्मिश्रण
उफ़ ! धधकता बलबलाता हुआ
सब कुछ
कहीं स्वयं न पिघल जाएँ
दुःख दर्द को समेटते हुए
जैसे लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल के उस पार से
ताक रहा पाकिस्तान
और फिर उसकी ताकती नज़रों से
खुद की औकात दिखाते
कुलबुलाते कुछ कीड़े इस पार
वही तीन अनुपात एक जैसा ही
और फिर ऐसे ही एक असर का नतीजा
आखिर
क्यों नहीं समझ पाते हम
रोकना ही होगा इस सम्मिश्रण के
कनेक्शन को
रूमानी शब्दों में कहूँ तो
तुम और तुम्हारी नज़र
वही ख़ास अनुपात
कहर बन कर गिरती है मुझपर
अम्लीय होती जिंदगी में
खट्टा खट्टा सा
नमकीन अहसास हो तुम
द्रवीय अम्लराज का दखल
जिंदगी के हर परिपेक्ष्य में
अलग अलग नज़रिये से
फिर से बस यही सोच
कहीं पिघल न जाऊं !!
~मुकेश~


Sunday, June 23, 2019

फितरत



मान लो 'आग'
टाटा नमक के
आयोडाइज्ड पैक्ड थैली की तरह
खुले आम बिकती बाजार में
मान लो 'दर्द'
वैक्सड माचिस के डिब्बी की तरह
पनवाड़ी के दूकान पर मिलती
अठन्नी में एक !
मान लो 'खुशियाँ' मिलती
समुद्री लहरों के साथ मुफ्त में
कंडीशन एप्लाय के साथ कि
हर उछलते ज्वार के साथ आती
तो लौट भी जाती भाटा के साथ
मान लो 'दोस्ती' होती
लम्बी, ऐंठन वाली जूट के रस्सी जैसी
मिलती मीटर में माप कर
जिसको करते तैयार
भावों और अहसासों के रेशे से
ताकि कह सकते कि
किसी के आंखों में झांककर
मेरी दोस्ती है न सौ मीटर लम्बी
छोड़ो, मानते रहो
क्यूंकि, फिर भी, हम
हम ठहरे साहूकार
आग की नमकीन थैली में
दर्द की तीली घिस कर
सीली जिंदगी जलाने की
कोशिश में खर्च कर देते है
पर, नहीं चाहते तब भी
कमर में दोस्ती की रस्सी बांध
समुद्री लहरों पर थिरकना
खुशिया समेटना, खिलखिलाना
खैर, दोस्त-दोस्ती भी तो
माँगने लगी है इनदिनों
फेस पाउडर की गुलाबी चमक
जो उतर ही जाती है
एक खिसियाहट भरी सच्चाई से
सीलन की दहन
बंधन की थिरकन
नामुमकिन है सहन
आखिर यही तो है इंसानी फितरत
है न!!!
~मुकेश~