जिंदगी की राहें

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Thursday, April 11, 2013

ये वाइल्ड फेंटेसिस (Wild Fantasies)



ये वाइल्ड फेंटेसिस
और उसमे सिर्फ तुम
सच में, ढाती है कहर !

अस्पताल का
बेड न. 26, वार्ड न. 3
उसके जिस्म से जुड़ा मशीन
दिखा रहा था
सारे ग्राफ मौत के करीब ..
उसके बदन से जुड़े थे ढेरों पाइप
जिसमें से जा रहा था ब्लड,
फूड पाइप भी थी जुड़ी 
आंखो के सामने धुंधला दृश्य
पावर शायद होगा +15 या +16
पर डाक्टर का आश्वासन
जिंदगी अभी बाकी है ....

पर वो वाइल्ड फेंटेसिस
जिसमे थी सिर्फ तुम ! तुम !
एक कातिल मुस्कुराहट के साथ!
और फिर
10-12 दिन से एडमिट रोगी ..
जिस्म हो गया उसका
ठंडा-निस्तेज-निर्विकार !

उफ़्फ़ !! ओ कातिल हसीना......




Thursday, March 28, 2013

मैं व मेरी परछाई





10 वाट के बल्व की हलकी रौशनी
हाथो में काली चाय से भरा
बड़ा सा मग
बढ़ी हुई दाढ़ी
खुरदरी सोच व
मेरी, मेरे से बड़ी परछाई !

है न आर्ट फिल्म
के किसी स्टूडियो का सेट
एवं मैं !
ओह मैं नहीं ओमपुरी
जैसा खुरदरा नायक !

परछाई से मुखातिब
हो कर -
तू कब छोड़ेगा मुझे
'उसने'
'उसकी मुस्कराहट ने'
और 'उसके साथ की मेरी ख़ुशी'
सब तो चले गए ....

फफोले आ गए होंठो पर
मुस्कुरा न पाने की वजह से
पर तू ...
रौशनी दीखते ही
मेरे वजूद से निकल पड़ता है
और रौशनी छुटते ही
फिर से
सिमट आता है मेरे आगोश में
मेरे इतने करीब की
समा जाता है मुझमे
एक अहसास की तरह
'मैं हूँ न तेरे साथ'
वजूद मेरा खुरदडा थोडा
और थोडा कड़वा-गरम
जैसे ड्रामेटिक क्लाइमेक्स के साथ
मैं व मेरी परछाई ............!!


Wednesday, March 13, 2013

लाइफ आफ्टर डैथ


कहाँ जनता था उसे??? 
पर कुछ लोगों का ज़िन्दगी में शामिल होने या खोने पर अपना जरा भी बस नहीं होता.. सब यूँ होता है जैसे कोई ख्वाब देखा हो...
कब और कैसे, मेरी आभासी दुनिया में शामिल हो गया और फिर उस दायरे को लांघ गया .... बिलकुल दबे पाओं, हौले से,चुपचाप मुझे खबर तक न चली...
ये सोशल मीडिया की साइट्स पता नहीं क्यों, मुझे बहुत भाती रही हैं | कभी कभी लगता है इसकी मुख्य वजह मेरे लिए ज़िन्दगी में दोस्ती को तरजीह देना है तो कभी लगता है कहीं इसकी वजह मेरी दोहरी जिंदगी जीना तो नहीं? खुद को तनावमुक्त करने में बहुत मददगार रही हैं ये मित्रता भरी दुनिया... दरअसल मैं हूँ भी वास्तविकता मे थोड़ा चुप! शांत! पर इस सोशल मीडिया पर मुखर व मित्रवत।
उसने कब मुझे फ्रेंड रिकुएस्ट भेजी, कब मैंने एक्सेप्ट की, याद नहीं। फिर याद करने लायक कोई वजह भी तो नहीं था। सरसरी तौर पर एक फेक प्रोफ़ाइल जैसा ही तो था, बिना रियल फोटो के, यहाँ तक की "अबाउट मी" में भी ज्यादा कुछ खास नहीं लिख रखा था उसने।
हाँ ! उसकी पहली बात जो याद है मुझे, जब मैंने अपने एक मित्र की कविता शेयर की थी अपने वाल पर, कविता वास्तव मे मुझे ऐसी लगी थी जो बेहतरीन थी, पर उसको बड़ी नागावर गुजरी, और मेरे इनबॉक्स में उसका मैसेज चमका - "कुमार साब! इस कविता को शेयर करने की वजह?"
उफ़्फ़! एक दम से मैंने चिढ़ कर कहा - क्यों? तुम्हें क्या परेशानी, मुझे पसंद आया, शेयर किया, बस। और जिसकी रचना है, मुझे नहीं लगता उसको कोई दिक्कत होगी।
बस ये छोटी सी "तू-तू में-में" जान पहचान की शुरुवात थी , फिर कब और कैसे वो इतना करीबी हो गया, पता ही नहीं चल पाया। बाद में उसी मित्र ने बताया, जिसकी कविता मैंने शेयर की थी, कि "इस बंदे की जिंदगी के कुछ गिने चुने दिन ही बचे हैं, किसी ऐसे रोग से ग्रसित है।" इस्स !!!!!!
शायद ये जान कर मैं खुद में बदलाव महसूस कर रहा था... उसके पोस्ट पर बरबस नज़र चली जाती, उसका सबसे बात करना दीखता तो ख्याल आता जरुर की कैसे जीता होगा ये...जानते हुए भी की... ज़िन्दगी उसे पहले ही दाँव पर लगा चुकी है...
तो बस ऐसे ही हमारे नेट लाइफ मे शामिल हुआ ये शख्स , हर दिन लाइक्स और छोटे मोटे कमेंट्स के माध्यम से प्रागाढ़ता बढ्ने लगी, फिर धीरे धीरे म्यूचुअल दोस्तों की संख्या भी बढ्ने लगी। वो जब भी ऑनलाइन आता तो उसकी ज़िंदादिली व मस्ती अंदर तक खुशी ला देती। उसके शब्दों से खुशियाँ छलकती थी, बेशक वो दर्द में डूबा होता। एक दम जोकर जैसी जिंदगी, खुद दर्द में डूबकर सबको खुश देखना, कोई उस से सीखे। कहीं पढ़ा भी था - "वेदना के सुरों में ही स्वर्गिक संगीत की सृष्टि होती है"
उसके इस ज़िंदादिली के कारण कभी-कभी मुझे संदेह भी होता था कि ऐसा कैसे हो सकता है, इतने दर्द में जीता हुआ व्यक्तित्व ऐसे खुशियों से बगिया महकाए।  मैंने अपने मित्र से इस बात को कनफर्म करने की कोशिश भी की, क्या वास्तव में उसकी जिंदगी इतनी छोटी है?  हमारे एक ग्रुप का अहम सदस्य कब बन गया, ये भी नहीं समझ मे आया, हर कोई बस इसी बंदे को मिस करते ... । पर हाँ, मुझे उसका कुमार साब या सिन्हा साब कहना उतनी खुशी नहीं देता था , हर वक़्त लगता, मैं इस से उम्र मे बड़ा तो हूँ, मुझे इसको भैया संबोधित करना चाहिए। शायद ये मेरी उसके लिए अपनेपन की वो भावना थी जो मैं व्यक्त ही नहीं कर पा रहा था..पर हाँ मेरे अंदर उसमे मेरा छोटा भाई दिखने जरुर लगा, कह नहीं पा रहा था बस...पर कोई नहीं, उस बंदे का सिर्फ खुश होना ही खुशी देता था। मैं मन ही मन चाहता जरुर था और मानता भी था... एक दो बार अपने मित्र से ही उसका हाल चल पूँछ कर अपने बड़े भाई होने की जरुरत और अनुभूति को निभा लेता था... इस से ज्यादा कुछ करने के काबिल भी नहीं था।
पर अब वो अब वो बंदा धीरे धीरे 4-5 दिन में एक बार आता। पर जब भी आता, सिर्फ और सिर्फ खुशियाँ उसके चारो और बिखरी नजर आती। अब उसके ऑनलाइन दिखने का समय धीरे धीरे कम होने लगा था, कहीं अंदर से बुरा भी लगता। पर क्या करना, जिंदगी तो रुकती नहीं, कुछ पल या क्षण के लिए याद आ जाता फिर हम भी अपने दुनिया मे मस्त हो जाते, अपने दिनचर्या मे भूल जाते थे।
कुछ मित्रों के सहयोग से मैंने उसके शब्दो से बुनी हुई कुछ रचनाओं को एक साझा कविता संग्रह मे भी शामिल करने की कोशिश की थी, ताकि शायद इसी बहाने वो कुछ पल के लिए सच में मुस्कुराया हो।
पर जैसे वो हम सब की दुनिया में एकदम से शामिल हुआ था, वैसे ही एक दम से गायब भी हो गया। वो पिछले करीबन एक महीने से ज्यादा दिनों से नहीं दिखा। शायद ............ पर इस शायद में कितने सारे सोच शामिल हो जाते हैं, है न...... ।
उसके लाइक पेज में सबसे ज्यादा पेज डेथ से रिलेटेड थे... जैसे "लाइफ आफ्टर डैथ" उसका ज़िन्दगी जीने का ज़ज्बा बस इसी जन्म तक सीमित नहीं था... वो शायद और जीना चाहता था...जो वो किसी से कह नहीं पता था...उसकी विवशता...उसकी नियति... सब एक तरफ और उसकी जिंदादिली...सब पर हावी... यही वजह थी की वो कम समय में ही कई मित्रों का बेस्ट फ्रेंड बस चूका था... पर उसके मन की उथल पुथल का अंदाज़ा भी कोई नहीं लगा पा रहा था...
और फिर....
उसके पेज में उसके अभिन्न ने पिछले दिनों स्टेटस डाला था "पिछले शनिवार को वो गुजर गया" ....... उफ़्फ़! उस क्षण का अनुभव शब्दों में बयान करना मेरे लिए मुश्किल है... मैं उस वक़्त सोच में पड गया खुद के लिए कुछ ज्यादा दिक्कत सी बात नही पर... मेरा अन्तर्मन कह रहा था, काश वो सच में फेक प्रोफ़ाइल ही होता, जो एक दिन एक दम से मेरे लिस्ट से गायब हो जाता, और फिर....
फिर क्या 1074 मित्रों की सूची से एक कम होना, किसको फरक पड़ता है... 
जिंदगी कहाँ रुकती है.... सच है |


Thursday, March 7, 2013

ऐ हसीना !!


आज महिला दिवस पर कुछ पंक्तियाँ अपने जिंदगी से जुड़ी सबसे खूबसूरत महिला को समर्पित करता हूँ, आखिर जिंदगी तो उसी से है .... कुछ साधारण से शब्द उसके लिए

ऐ हसीना !!
क्या तू बन पाएगी मेरी रचना
शब्द मे सज पाएगी कभी
क्या कभी चंचल शोख अदा
ढल पाएंगे, बन पाएंगे नज्म
बालों का झटकना
कैसे दिखाऊँ अपने हरफ़ों मे
गोरा सुर्ख चेहरा, छरहरा बदन
नारी की नजाकत
कैसे लाऊं शब्दो मे ??
.
चलो कोई नहीं
तुम्हारे से ही
हो जाएगी कविता सृजित
आखिर ये रचना तुम्हें ही तो
करनी थी अर्पित
अब तो मुस्कुरा दो........

कुछ ट्रोफिज में से एक सबसे अहम .....:):):

Friday, March 1, 2013

ऐ भास्कर !



10 फरवरी को विश्व पुस्तक मेला में लोकार्पित हुई 
मेरे सह सम्पादन मे साझा कविता संग्रह "पगडंडियाँ" से मेरी एक रचना आप सबके लिए...
ऐ भास्कर !
सुन रहे हो
आज मान लेना एक नारी का कहना 
आजकल हो जाती हूँ लेट
तो थोड़ा रुक कर डुबना !!
तुम सब ही तो कहते हो
नारियों आगे बढ़ो
घर से बाहर निकलो
निभाओ जिम्मेवारी
पर ये घूरती आंखे ??
डरा देती है यार
तो मान लेना मेरा कहना
थोड़ा रुक कर डुबना !!
क्या करूँ? क्या न करूँ?
समय जाता है बीत
फिर इस तिमिर में
आती है फब्तियों की आवाज
रखती हूँ साहस, पर
कंपकंपा ही जाती है हड्डियाँ
सुनो! मान लेना मेरा कहना
थोड़ा रुक कर डुबना !!
इस दौड़ते शहर मे
भागती जिंदगी मे
नहीं है समय किसी के पास
फिर भी दिखते ही अकेली नारी
सदाचारी, ब्रहमचारी या अत्याचारी
सबको मिल जाता है समय
इसलिए कहती हूँ प्यारे, सुन लेना
थोड़ा रुक का डुबना !!
ऐ रवि !!
इस रक्षा बंधन में
रख दूँगी रेशम का धागा तेरे लिए
अब तो तू भी बन गया भैया
करेगा रक्षा, मानेगा मेरा कहना
बस थोड़ा रुक कर डुबना !!
मेरे घर तक लौटने पर ही डुबना !!
मानेगा न कहना !!

अगर ये संग्रह आप खरीदना चाहें तो 150/- मूल्य की पुस्तक सिर्फ 120/- मे www.infibeam.com, ebay.in, bookadda.com etc. साइट से खरीद सकते हैं... 


Wednesday, February 27, 2013

"राष्ट्र हित मे आप भी इस मुहिम से जुड़ें "



सन 1945 मे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तथाकथित हवाई दुर्घटना या उनके जापानी सरकार के सहयोग से 1945 के बाद सोवियत रूस मे शरण लेने या बाद मे भारत मे उनके होने के बारे मे हमेशा ही सरकार की ओर से गोलमोल जवाब दिया गया है उन से जुड़ी हुई हर जानकारी को "राष्ट्र हित" का हवाला देते हुये हमेशा ही दबाया गया है ... 'मिशन नेताजी' और इस से जुड़े हुये मशहूर पत्रकार श्री अनुज धर ने काफी बार सरकार से अनुरोध किया है कि तथ्यो को सार्वजनिक किया जाये ताकि भारत की जनता भी अपने महान नेता के बारे मे जान सके पर हर बार उन को निराशा ही हाथ आई !

मेरा आप से एक अनुरोध है कि इस मुहिम का हिस्सा जरूर बनें ... भारत के नागरिक के रूप मे अपने देश के इतिहास को जानने का हक़ आपका भी है ... जानिए कैसे और क्यूँ एक महान नेता को चुपचाप गुमनामी के अंधेरे मे चला जाना पड़ा... जानिए कौन कौन था इस साजिश के पीछे ... ऐसे कौन से कारण थे जो इतनी बड़ी साजिश रची गई न केवल नेता जी के खिलाफ बल्कि भारत की जनता के भी खिलाफ ... ऐसे कौन कौन से "राष्ट्र हित" है जिन के कारण हम अपने नेता जी के बारे मे सच नहीं जान पाये आज तक ... जब कि सरकार को सत्य मालूम है ... क्यूँ तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया जाता ... जानिए आखिर क्या है सत्य .... अब जब अदालत ने भी एक समय सीमा देते हुये यह आदेश दिया है कि एक कमेटी द्वारा जल्द से जल्द इस की जांच करवा रिपोर्ट दी जाये तो अब देर किस लिए हो रही है ??? 


आप सब मित्रो से अनुरोध है कि यहाँ नीचे दिये गए लिंक पर जाएँ और इस मुहिम का हिस्सा बने और अपने मित्रो से भी अनुरोध करें कि वो भी इस जन चेतना का हिस्सा बने !
  Set up a multi-disciplinary inquiry to crack Bhagwanji/Netaji mystery



 यहाँ ऊपर दिये गए लिंक मे उल्लेख किए गए पेटीशन का हिन्दी अनुवाद दिया जा रहा है :- 

सेवा में,
अखिलेश यादव, 
माननीय मुख्यमंत्री
उत्तर प्रदेश सरकार 
लखनऊ 
प्रिय अखिलेश यादव जी,

इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर, आप भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री इस स्थिति में हैं कि देश के सबसे पुराने और सबसे लंबे समय तक चल रहे राजनीतिक विवाद को व्यवस्थित करने की पहल कर सकें| इसलिए देश के युवा अब बहुत आशा से आपकी तरफ देखते हैं कि आप माननीय उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के हाल ही के निर्देश के दृश्य में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भाग्य की इस बड़ी पहेली को सुलझाने में आगे बढ़ेंगे|
जबकि आज हर भारतीय ने नेताजी के आसपास के विवाद के बारे में सुना है, बहुत कम लोग जानते हैं कि तीन सबसे मौजूदा सिद्धांतों के संभावित हल वास्तव में उत्तर प्रदेश में केंद्रित है| संक्षेप में, नेताजी के साथ जो भी हुआ उसे समझाने के लिए हमारे सामने आज केवल तीन विकल्प हैं: या तो ताइवान में उनकी मृत्यु हो गई, या रूस या फिर फैजाबाद में | 1985 में जब एक रहस्यमय, अनदेखे संत “भगवनजी” के निधन की सूचना मिली, तब उनकी पहचान के बारे में विवाद फैजाबाद में उभर आया था, और जल्द ही पूरे देश भर की सुर्खियों में प्रमुख्यता से बन गया| यह कहा गया कि यह संत वास्तव में सुभाष चंद्र बोस थे। बाद में, जब स्थानीय पत्रकारिता ने जांच कर इस कोण को सही ठहराया, तब नेताजी की भतीजी ललिता बोस ने एक उचित जांच के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने उस संत के सामान को सुरक्षित रखने का अंतरिम आदेश दिया।

भगवनजी, जो अब गुमनामी बाबा के नाम से बेहतर जाने जाते है, एक पूर्ण वैरागी थे, जो नीमसार, अयोध्या, बस्ती और फैजाबाद में किराए के आवास पर रहते थे। वह दिन के उजाले में कभी एक कदम भी बाहर नहीं रखते थे,और अंदर भी अपने चयनित अनुयायियों के छोड़कर किसी को भी अपना चेहरा नहीं दिखाते थे। प्रारंभिक वर्षों में अधिक बोलते नहीं थे परन्तु उनकी गहरी आवाज और फर्राटेदार अंग्रेजी, बांग्ला और हिंदुस्तानी ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया, जिससे वह बचना चाहते थे। जिन लोगों ने उन्हें देखा उनका कहना है कि भगवनजी बुजुर्ग नेताजी की तरह लगते थे। वह अपने जर्मनी, जापान, लंदन में और यहां तक कि साइबेरियाई कैंप में अपने बिताए समय की बात करते थे जहां वे एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु की एक मनगढ़ंत कहानी "के बाद पहुँचे थे"। भगवनजी से मिलने वाले नियमित आगंतुकों में पूर्व क्रांतिकारी, प्रमुख नेता और आईएनए गुप्त सेवा कर्मी भी शामिल थे।
2005 में कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश पर स्थापित जस्टिस एम.के. मुखर्जी आयोग की जांच की रिपोर्ट में पता चला कि सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु 1945 में ताइवान में नहीं हुई थी। सूचनाओं के मुताबिक वास्तव में उनके लापता होने के समय में वे सोवियत रूस की ओर बढ़ रहे थे।
31 जनवरी, 2013 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ललिता बोस और उस घर के मालिक जहां भगवनजी फैजाबाद में रुके थे, की संयुक्त याचिका के बाद अपनी सरकार को भगवनजी की पहचान के लिए एक पैनल की नियुक्ति पर विचार करने का निर्देशन दिया।

जैसा कि यह पूरा मुद्दा राजनैतिक है और राज्य की गोपनीयता के दायरे में है, हम नहीं जानते कि गोपनीयता के प्रति जागरूक अधिकारियों द्वारा अदालत के फैसले के जवाब में कार्यवाही करने के लिए किस तरह आपको सूचित किया जाएगा। इस मामले में आपके समक्ष निर्णय किये जाने के लिए निम्नलिखित मोर्चों पर सवाल उठाया जा सकता है:

1. फैजाबाद डीएम कार्यालय में उपलब्ध 1985 पुलिस जांच रिपोर्ट के अनुसार भगवनजी नेताजी प्रतीत नहीं होते।
2. मुखर्जी आयोग की खोज के मुताबिक भगवनजी नेताजी नहीं थे।
3. भगवनजी के दातों का डीएनए नेताजी के परिवार के सदस्यों से प्राप्त डीएनए के साथ मेल नहीं खाता।
वास्तव मे, फैजाबाद एसएसपी पुलिस ने जांच में यह निष्कर्ष निकाला था, कि “जांच के बाद यह नहीं पता चला कि मृतक व्यक्ति कौन थे" जिसका सीधा अर्थ निकलता है कि पुलिस को भगवनजी की पहचान के बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला।

हम इस तथ्य पर भी आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग की जांच की रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकला है कि "किसी भी ठोस सबूत के अभाव में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि भगवनजी नेताजी थे"। दूसरे शब्दों में, आयोग ने स्वीकार किया कि नेताजी को भगवनजी से जोड़ने के सबूत थे, लेकिन ठोस नहीं थे।

आयोग को ठोस सबूत न मिलने का कारण यह है कि फैजाबाद से पाए गए भगवनजी के तथाकथित सात दातों का डी एन ए, नेताजी के परिवार के सदस्यों द्वारा उपलब्ध कराए गए रक्त के नमूनों के साथ मैच नहीं करता था। यह परिक्षण केन्द्रीय सरकार प्रयोगशालाओं में किए गए और आयोग की रिपोर्ट में केन्द्र सरकार के बारे मे अच्छा नहीं लिखा गया। बल्कि, यह माना जाता है कि इस मामले में एक फोरेंसिक धोखाधडी हुई थी।
महोदय, आपको एक उदाहरण देना चाहेंगे कि बंगाली अखबार "आनंदबाजार पत्रिका" ने दिसंबर 2003 में एक रिपोर्ट प्रकाशित कि कि भगवनजी ग्रहण दांत पर डीएनए परीक्षण नकारात्मक था। बाद में, "आनंदबाजार पत्रिका", जो शुरू से ताइवान एयर क्रेश थिओरी का पक्षधर रहा है, ने भारतीय प्रेस परिषद के समक्ष स्वीकार किया कि यह खबर एक "स्कूप" के आधार पर की गयी थी। लेकिन समस्या यह है कि दिसंबर 2003 में डीएनए परीक्षण भी ठीक से शुरू नहीं किया गया था। अन्य कारकों को ध्यान में ले कर यह एक आसानी से परिणाम निकलता है कि यह "स्कूप" पूर्वनिर्धारित था।
जाहिर है, भारतीय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश, एम.के. मुखर्जी ऐसी चालों के बारे में जानते थे और यही कारण है कि 2010 में सरकार के विशेषज्ञों द्वारा आयोजित डी एन ए और लिखावट के परिक्षण के निष्कर्षों की अनदेखी करके,उन्होंने एक बयान दिया था कि उन्हें "शत प्रतिशत यकीन है" कि भगवनजी वास्तव में नेताजी थे।यहाँ यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि सर्वोच्च हस्तलेख विशेषज्ञ श्री बी लाल कपूर ने साबित किया था कि भगवनजी की अंग्रेजी और बंगला लिखावट नेताजी की लिखावट से मेल खाती है।
भगवनजी कहा करते थे की कुछ साल एक साइबेरियाई केंप में बिताने के बाद 1949 में उन्होंने सोवियत रूस छोड़ दिया और उसके बाद गुप्त ऑपरेशनो में लगी हुई विश्व शक्तियों का मुकाबला करने में लगे रहे। उन्हें डर था कि यदि वह खुले में आयेंगे तो विश्व शक्तियां उनके पीछे पड़ जायेंगीं और भारतीय लोगो पर इसके दुष्प्रभाव पड़ेंगे। उन्होंने कहा था कि “मेरा बाहर आना भारत के हित में नहीं है”। उनकी धारणा थी कि भारतीय नेतृत्व के सहापराध के साथ उन्हें युद्ध अपराधी घोषित किया गया था और मित्र शक्तियां उन्हें उनकी 1949 की गतिविधियों के कारण अपना सबसे बड़ा शत्रु समझती थी।
भगवनजी ने यह भी दावा किया था कि जिस दिन 1947 में सत्ता के हस्तांतरण से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जाएगा, उस दिन भारतीय जान जायेंगे कि उन्हें गुमनाम/छिपने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा।
खासा दिलचस्प है कि , दिसम्बर 2012 में विदेश और राष्ट्रमंडल कार्यालय, लंदन, ने हम में से एक को बताया कि वह सत्ता हस्तांतरण के विषय में एक फ़ाइल रोके हुए है जो "धारा 27 (1) (क) सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम (अंतरराष्ट्रीय संबंधों) के तहत संवेदनशील बनी हुई है और इसका प्रकाशन संबंधित देशों के साथ हमारे संबंधों में समझौता कर सकता है" ।

महोदय, इस सारे विवरण का उद्देश्य सिर्फ इस मामले की संवेदनशीलता को आपके प्रकाश में लाना है। यह बात वैसी नहीं है जैसी कि पहली नजर में लगती है। इस याचिका के हस्ताक्षरकर्ता चाहते है कि सच्चाई को बाहर आना चाहिए। हमें पता होना चाहिए कि भगवनजी कौन थे। वह नेताजी थे या कोई "ठग" जैसा कि कुछ लोगों ने आरोप लगाया है? क्या वह वास्तव में 1955 में भारत आने से पहले रूस और चीन में थे, या नेताजी को रूस में ही मार दिया गया था जैसा कि बहुत लोगों का कहना है।

माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति वीरेन्द्र कुमार दीक्षित, भगवनजी के तथ्यों के विषय में एक पूरी तरह से जांच के सुझाव से काफी प्रभावित है। इसलिए हमारा आपसे अनुरोध है कि आप अपने प्रशासन को अदालत के निर्णय का पालन करने हेतू आदेश दें। आपकी सरकार उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेषज्ञों और उच्च अधिकारियों की एक टीम को मिलाकर एक समिति की नियुक्ति करे जो गुमनामी बाबा उर्फ भगवनजी की पहचान के सम्बन्ध में जांच करे।

यह भी अनुरोध है कि आपकी सरकार द्वारा संस्थापित जांच -

1. बहु - अनुशासनात्मक होनी चाहिए, जिससे इसे देश के किसी भी कोने से किसी भी व्यक्ति को शपथ लेकर सूचना देने को वाध्य करने का अधिकार हो । और यह और किसी भी राज्य या केन्द्रीय सरकार के कार्यालय से सरकारी रिकॉर्ड की मांग कर सके।

2. सेवानिवृत्त पुलिस, आईबी, रॉ और राज्य खुफिया अधिकारी इसके सदस्य हो। सभी सेवारत और सेवानिवृत्त अधिकारियों, विशेष रूप से उन लोगों को, जो खुफिया विभाग से सम्बंधित है,उत्तर प्रदेश सरकार को गोपनीयता की शपथ से छूट दे ताकि वे स्वतंत्र रूप से सर्वोच्च राष्ट्रीय हितों के लिए अपदस्थ हो सकें।

3. इसके सदस्यों में नागरिक समाज के प्रतिनिधि और प्रख्यात पत्रकार हो ताकि पारदर्शिता और निष्पक्षता को सुनिश्चित किया जा सके। ये जांच 6 महीने में खत्म की जानी चाहिए।

4. केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा आयोजित नेताजी और भगवनजी के बारे में सभी गुप्त रिकॉर्ड मंगवाए जाने पर विचार करें। खुफिया एजेंसियों के रिकॉर्ड को भी शामिल करना चाहिए। उत्तर प्रदेश कार्यालयों में खुफिया ब्यूरो के पूर्ण रिकॉर्ड मंगावाये जाने चाहिए और किसी भी परिस्थिति में आईबी स्थानीय कार्यालयों को कागज का एक भी टुकड़ा नष्ट करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

5.सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भगवनजी की लिखावट और अन्य फोरेंसिक सामग्री को किसी प्रतिष्ठित अमेरिकन या ब्रिटिश प्रयोगशाला में भेजा जाये.
हमें पूरी उम्मीद है कि आप, मुख्यमंत्री और युवा नेता के तौर पर दुनिया भर में हम नेताजी के प्रसंशकों की इस इच्छा को अवश्य पूरा करेंगे |

सादर
आपका भवदीय
अनुज धर
लेखक "India's biggest cover-up"

चन्द्रचूर घोष
प्रमुख - www.subhaschandrabose.org और नेताजी के ऊपर आने वाली एक पुस्तक के लेखक

Friday, February 15, 2013

लोकार्पण: पगडंडियाँ



(लोकार्पण के अविस्मरनीय पल)
(पगडंडियाँ कवर पेज)

कुछ मेहनत, कुछ शुभकामनायें, कुछ लोगो का साथ, कुछ काव्यात्मक सोच और रच गई, हम सबकी "पगडंडियाँ" ... साथ मे श्रीमति अंजु चौधरी, श्रीमति रंजना भाटिया और श्री शैलेश भारतवासी की अदम्य ताकत तो थी ही....... फिर क्यों नहीं होता एक सफल आयोजन।
जीवन से रूबरू होते कभी कोई रास्ता नज़र नहीं आता तब हम सब अक्सर गंतव्य तक पहुंचेंने केलिए पगडंडियाँ बना ही लेते हैं ...और सम्हाल लेते हैं अपने आपको .. वर्तमान सुरक्षित करते हुए एक प्रतीक्षारत सार्थक भविष्य की ओर मंथर किन्तु निरंतर रूप से गतिमान भी रहते हैं ..
(चेहरे की चमक बता रही, हम खुश हैं)
  (श्री आनंद द्विवेदी, नीता पोरवाल, रंजना भाटिया, नीता कोटेचा, मैं व अंजू चौधरी) 
आखिर "पगडंडियाँ" के सभी 28 रचनाकारों के उत्साह का प्रतिफल नजर आया, जब 10.02.2013 को इसके लोकार्पण के अवसर पर वरिष्ठ कथाकार श्रीमति चित्रा मुदगल, श्री विजय किशोर मानव, कवि व पूर्व संपादक "कादंबनी", श्री बलराम, कथाकार व संपादक, "लोकायत", श्री विजय राय, कवि व प्रधान संपादक, "लमही" एवं श्री ओम निश्चल, कवि-आलोचक पधारे ...

   (श्री शैयेद, न्यूज़ रीडर, आजतक, मीनाक्षी मिश्र के पति के साथ मैं और रंजू जी)
इस आयोजन को सफल करने हेतु, बहुत से रचनाकार बाहर से आए, ये उनकी प्रतिबद्धता दर्शा रही थी॥ उनमे से श्री सैयद, न्यूज़ रीडर, आजतक, श्रीमति गुंजन श्रीवास्तवा, श्रीमति गीता पंडित, श्रीमति नीता पौरवाल, श्रीमति अनुपमा त्रिपाठी, श्रीमति नीता कोटेचा, श्रीमति रेखा श्रीवास्तवा, श्रीमती सरस दरबारी, श्री कमल शर्मा, श्रीमति नीलम पूरी, श्रीमति मीनक्षी तिवारी, श्री गुरमीत सिंह, श्रीमति सुनीता शानू, श्री अशोक अरोरा, श्री आनंद द्विवेदी, श्री संतोष त्रिवेदी, श्री अविनाश वाचस्पति, श्री किशोर चौधरी, श्रीमति मीनाक्षी पंत, श्री राजीव तनेजा, श्रीमति वंदना गुप्ता, श्री खुशदीप सहगल, श्री मोहिंदर श्रीवास्तव, श्री मोहिंदर कुमार, सुश्री आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति", श्री अभिषेक जैसे रचनाकारो को देख कर मन प्रसन्नता से भर गया॥! मेरी धर्मपत्नी श्रीमति अंजु व बहन श्रीमति रीना सिन्हा  भी मेरे साथ रह कर बता रही थी, बेशक हिन्दी की ज्यादा समझ नहीं पर आपके साथ मेरा साथ है।  मेरे मित्र श्री अनूप, श्री आदर्श व श्री राकेश मोहन भी पधारे.....  
      (सरस दरबारी दी, गुंजन श्रीवास्तव जी, नीलू नीलम जी, नीता पोरवाल, रेखा दी)
(मैं और मेरी अंजू)
 (अविनाश वाचस्पति जी, संतोष सर,पीछे किशोर चौधरी जी अपनी धर्मपत्नी के साथ)
एक बार फिर हिन्दी के किसी समारोह मे इतनी अधिक उपस्थिती देखी गई, पूरा हाल भरा हुआ था, उपस्थिती करीबन 125 लोगो की थीइस पुस्तक के साथ साथ "ए री सखी" (कवियत्री श्रीमति अंजु चौधरी) और उनके सम्पादन मे साझा कविता संग्रह "अरुणिमा" (जिसमे मैं भी शामिल हूँ) का भी लोकार्पण साथ ही हुआ...
      (श्री बलराम,श्री विजय मानव, श्री निश्छल व श्रीमती गीता पंडित )                  

घिरी है घटाएं सकुचाई हैं पगडंडियाँ

प्राण प्रण से सहेज रही राह की दुश्वारियां

सृजन के उत्सव संग अंतस की बोलियाँ

वृष्टि से सृष्टि तृप्त ..दृष्टि आस्मानियाँ

                     (मेरी बहन श्रीमती रीना सिन्हा, पत्नी अंजू,  नीलू सरस दी, आदि )
             (अशोक अरोरा जी, नीता कोटेचा, राजीव तनेजा जी )
आप सब की उपस्थिती और शुभकामनाओं के कारण, हम बहुत खुश हैं... धन्यवाद ... मुकेश !!
                   (श्रीमती चित्र मुदगल जी के साथ हम दोनों )