जिंदगी की राहें

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Friday, March 1, 2013

ऐ भास्कर !



10 फरवरी को विश्व पुस्तक मेला में लोकार्पित हुई 
मेरे सह सम्पादन मे साझा कविता संग्रह "पगडंडियाँ" से मेरी एक रचना आप सबके लिए...
ऐ भास्कर !
सुन रहे हो
आज मान लेना एक नारी का कहना 
आजकल हो जाती हूँ लेट
तो थोड़ा रुक कर डुबना !!
तुम सब ही तो कहते हो
नारियों आगे बढ़ो
घर से बाहर निकलो
निभाओ जिम्मेवारी
पर ये घूरती आंखे ??
डरा देती है यार
तो मान लेना मेरा कहना
थोड़ा रुक कर डुबना !!
क्या करूँ? क्या न करूँ?
समय जाता है बीत
फिर इस तिमिर में
आती है फब्तियों की आवाज
रखती हूँ साहस, पर
कंपकंपा ही जाती है हड्डियाँ
सुनो! मान लेना मेरा कहना
थोड़ा रुक कर डुबना !!
इस दौड़ते शहर मे
भागती जिंदगी मे
नहीं है समय किसी के पास
फिर भी दिखते ही अकेली नारी
सदाचारी, ब्रहमचारी या अत्याचारी
सबको मिल जाता है समय
इसलिए कहती हूँ प्यारे, सुन लेना
थोड़ा रुक का डुबना !!
ऐ रवि !!
इस रक्षा बंधन में
रख दूँगी रेशम का धागा तेरे लिए
अब तो तू भी बन गया भैया
करेगा रक्षा, मानेगा मेरा कहना
बस थोड़ा रुक कर डुबना !!
मेरे घर तक लौटने पर ही डुबना !!
मानेगा न कहना !!

अगर ये संग्रह आप खरीदना चाहें तो 150/- मूल्य की पुस्तक सिर्फ 120/- मे www.infibeam.com, ebay.in, bookadda.com etc. साइट से खरीद सकते हैं... 


27 comments:

Tamasha-E-Zindagi said...

बहुत सुन्दर रचना | बधाई


यहाँ भी पधारें और लेखन पसंद आने पर अनुसरण करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page

Unknown said...

nice words n thinking too ...
evry man must think like it ..
congrats !!!!!

रश्मि प्रभा... said...

तुम सब ही तो कहते हो
नारियों आगे बढ़ो
घर से बाहर निकलो
निभाओ जिम्मेवारी
पर ये घूरती आंखे ??
डरा देती है यार
तो मान लेना मेरा कहना
थोड़ा रुक कर डुबना !! ......... शरीर,मन दोनों सिहर गए

Archana Chaoji said...

बहुत ही अच्छी रचना...
एक निवेदन सिर्फ़ अपनों से ....

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

अच्छी रचना!
अंधेरे से डरने वाले क्या जानें...
हैवानों को तो भास्कर का भी... नहीं कोई डर..
~सादर!!!

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...
This comment has been removed by the author.
Sarika Mukesh said...

बहुत सुन्दर रचना | बधाई

Aditi Poonam said...

बहुत सुंदर और सार्थक रचना..........
बधाई....

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज की ब्लॉग बुलेटिन ये कि मैं झूठ बोल्यां मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सटीक भाव ... गहरी अभिव्यक्ति लिए रचना

shikha varshney said...

बहुत ही बढ़िया..शब्द भाव दोनों उत्तम.
हाँ इंसान भाई कहने से माने न माने (आसाराम बापू के कहने पर) सूरज को तो मान ही लेना चाहिए कहना. अब महिलाओं को देवताओं का ही सहारा है.

अज़ीज़ जौनपुरी said...

बहुत ही सुन्दर रचना

Bhavna....The Feelings of Ur Heart said...

very nice ... Congrats

shalini rastogi said...

ऐ रवि !!
इस रक्षा बंधन में
रख दूँगी रेशम का धागा तेरे लिए
अब तो तू भी बन गया भैया....... वाह ! क्या खूबसूरत रिश्ता जोड़ा है.... बहुत मर्मस्पर्शी रचना!

Saras said...


वाह मुकेश ...बहुत सुन्दर आयाम दिया इस समस्या को ...बिलकुल नई पेशकश

vandan gupta said...

बहुत सुन्दर

Dinesh pareek said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है ......
सादर , आपकी बहतरीन प्रस्तुती

आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
पृथिवी (कौन सुनेगा मेरा दर्द ) ?

ये कैसी मोहब्बत है

shalini rastogi said...

बहुत सुन्दर भावों से परिपूर्ण रचना ...ह्रदय के भावों को उद्द्वेलित करती ...!

प्रवीण पाण्डेय said...

तिमिर हटेगा, जीवन बढ़ेगा।

Anupama Tripathi said...

कोमल भाव ...
सुंदर रचना ...

POETESS said...

इस दौड़ते शहर मे
भागती जिंदगी मे
नहीं है समय किसी के पास
फिर भी दिखते ही अकेली नारी
सदाचारी, ब्रहमचारी या अत्याचारी
सबको मिल जाता है समय
इसलिए कहती हूँ प्यारे, सुन लेना
थोड़ा रुक का डुबना !!


मर्मस्पर्शी निवेदन

नीलिमा शर्मा said...

अंधेरे से डरने वाले क्या जानें...
हैवानों को तो भास्कर का भी... नहीं कोई डर..


इस दौड़ते शहर मे
भागती जिंदगी मे
नहीं है समय किसी के पास
फिर भी दिखते ही अकेली नारी
सदाचारी, ब्रहमचारी या अत्याचारी
सबको मिल जाता है समय
इसलिए कहती हूँ प्यारे, सुन लेना
थोड़ा रुक का डुबना !!

एक करुण पुकार .......उत्तम रचना

रचना त्यागी 'आभा' said...

बहुत सुंदर कविता ..........यथार्थवादी :)

geet said...

मुकेशजी आपने आज के समय के अनुसार नारी के बारे मै बहुत ही अच्छी कविता लिखी है पद कर मान खुश हो गया दिल तक जाने वाली कविता है

Pallavi saxena said...

बहुत ही बढ़िया भाव संयोजन के साथ एक अलग तरह की बहतरीन रचना... :)

Ragini said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...यथार्थवादी ....

संजय भास्‍कर said...

आजकल हो जाती हूँ लेट
तो थोड़ा रुक कर डुबना !!
....निवेदन बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।


बहुत मर्मस्पर्शी रचना.......मुकेश जी