जिंदगी की राहें

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Friday, May 28, 2010

ब्लोगोत्सव 2010





















ब्लोगोत्सव २०१० के पर रश्मि दी के निर्देशन के कारण मेरी एक कविता "कन्वेस" http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7945.html


और "MALL CULTURE" पे मेरा एक आलेख


उपरोक्त साईट पे प्रकाशित हुई...आप सबो से अनुरोध है , कृपया एक बार जरुर है उत्सव वर्धन के लिए वहां पहुचें..........:)

धन्यवाद्!!













Monday, May 17, 2010

खुले आँखों से देखा सपना!





खुले आँखों से देखा है मैंने सपना
जो था बहुत सुहाना......
.
माना अपने चालीसवें बसंत में कदम रख चुका हूँ
पर उस दिन
जब टीवी के परदे पर
दिखा थिरकता सैफ
और उसके बाँहों
हसीन कटरीना कैफ
तो मेरी मटर सी आँखे हो गयी स्थिर!!
.
पहले तो परदे पे चेहरा झिलमिलाया
फिर आँखे बौरायीं
हो गया चमत्कार
दिख रह था मेरा हमशक्ल
ख़्वाबों सा मस्त, कड़क, जवान!!......:)
.
ओंठो पे तैर उठी मुस्कान
आँखें चमकीं मटक के
दिल...."वो तो बच्चा है जी"
की तर्ज़ पर हो गया नादान!!
.
इस सुहाने सपने में ही
था पूरा डूबा
की एक आवाज ने
कर दी तन्द्रा भंग..........
"पापा!!!!!!!!!!
साईकल में हवा भरवा दो........!!"
हकीकत का झटका दिया!
.
उफ़!
खुले आँखों से देखा था जो सपना
जो था सुहाना......
पर ... सब हुआ बेगाना ! !!







Monday, April 26, 2010

कैनवस



एकांत में बैठे-बैठे सोचा
काश! मैं होता ऐसा चित्रकार
कि हाथ में होती तक़दीर की ब्रश
और सामने होती, एक ऐसी कैनवस
जो होती खुद की ज़िन्दगी
जिसमें मैं रंग पाता अपनी चाहत
भर पाता वो कुछ खास रंग,
जो होते मेरे सपने, होते जो बेहद अपने

जरूरत होती कुछ चटक रंगों की
लाल, पीले, हरे, नारंगी
या सुर्ख सुफैद व आसमानी
जैसे शांत सौम्य रंग
ताकि मेरे तक़दीर की ब्रश
सजा पाए ज़िन्दगी को
जहाँ से झलके बहुत सारी खुशियाँ
सिर्फ खुशियाँ !!

तभी किसी ने दिलाया याद
इन चटक और सौम्य रंगों के मिश्रण में
है एक और रंग की जरूरत
जिसे कहते हैं "स्याह काला"
जो है रूप अंधकार का
जो देता है विरोधाभास
ताकि जिंदगी में हो सब-सब
मलिन, निराशाजनक, अंधेरा, विषादपूर्ण

तब आया समझ
जब तक दुःख न होगा
दर्द न होगा
नहीं भोग पाएंगे सुख
अहसास न हो पायेगा ख़ुशी का
और इस तरह
मैंने अपने सोच को समझाया
अब हूँ मैं खुश, प्रफुल्लित
अपनी ज़िन्दगी से
अपने इस रंगीन कैनवस से

जिसमें भरे है मैंने सारे रंग
दुःख के भी
दर्द के भी
साथ में सहेजे हैं,
खुशियों के कुछ बेहतरीन पल..............!!!


Wednesday, March 31, 2010

वो बचपन!!!



जाड़े की शाम
धुल धूसरित मैदान
बगल की खेत से
गेहूं के बालियों की सुगंध
और मेरे शरीर से निकलता दुर्गन्ध !
तीन दिनों से
मैंने नहीं किया था स्नान
ऐसा था बचपन महान !
.
दादी की लाड़
दादा का प्यार
माँ से जरुरत के लिए तकरार
पढाई के लिए पापा-चाचा की मार
खेलने के दौरान दोस्तों का झापड़
सर "जी" की छड़ी की बौछाड़
क्यूं नहीं भूल पाता वो बचपन!!
.
घर से स्कूल जाना
बस्ता संभालना
दूसरे हाथों से
निक्कर को ऊपर खींचे रहना
नाक कभी कभी रहती बहती
जैसे कहती, जाओ, मैं नहीं चुप रहती
फिर भी मैया कहती थी
मेरा राजा बेटा सबसे प्यारा ..
प्यारा था वो बचपन सलोना !
.
स्कूल का क्लास
मैडम के आने से पहले
मैं मस्ती में कर रह था अट्टहास
मैडम ने जैसे ही मुझसे कुछ पूछा
रुक गयी सांस
फिर भी उन दिनों की रुकी साँसें ,
देती हैं आज भी खुबसूरत अहसास !
वो बचपन!!
.
स्कूल की छुट्टी के समय की घंटी की टन टन
बस्ते के साथ
दौड़ना , उछलना ...
याद है, कैसे कैसे चंचल छिछोड़े
हरकत करता था बाल मन
सबके मन में
एक खास जगह बनाने की आस लिए
दावं, पेंच खेलता था बचपन
हाय वो बचपन!!
.
वो चंचल शरारतें
चंदामामा की लोरी
दूध की कटोरी
मिश्री की चोरी !
आज भी बहुत सुकून देता है
वो बचपन की यादें
वो यादगार बचपन!!!!!!

.

Tuesday, March 16, 2010

~अख़बार~







दिन था रविवार,
सुबह की अलसाई नींद
ऊपर से श्रीमती जी की चीत्कार...
देर से ही सही, नींद का किया बहिष्कार
फिर, चाय की चुस्की, साथ में अख़बार
आंखे जम गई दो शीर्षक पर
"दिल्ली की दौड़ती सड़क पर, कार में बलात्कार"
"सचिन! तेरा बैट कब तक दिखायेगा चमत्कार"
.

सचिन के बल्ले के चौके-छक्के की फुहार
हुआ खुशियों का मंद इजहार
दिल चिहुंका! हुआ बाग-बाग! चिल्लाया॥
सचिन! तू दिखाते रह ऐसा ही चमत्कार
कर बार-बार! हजारो बार......
.
तदपुरांत, धीरे धीरे पलटने लगा अखबार
पर, तुरंत ही आँखें और उँगलियों ने किया मजबूर
आँखे फिर से उसी शीर्षक पर जा कर हो गयी स्थिर
एक दृश्य बिना किसी टेक-रिटेक के गयी सामने से गुजर
सोच भी गयी थम!
आँखे हो गयी नम!!
.
उसी दिल से, वहीँ से, उसी समय
एक और बिना सोचे, समझे, हुआ हुंकार
क्या ये भी होगा बार-बार!! हजारो बार॥
क्या ऐसे ही महिलाओं की इज्जत होगी तार-तार.....
.
.
आखिर कब तक...........!!!!!!!!!!!!!!!


Thursday, February 4, 2010

~ लाइफ इन मेट्रो ~

कल की ही तो बात थी,
इस बड़े मानव जंगल में
सूर्यास्त के समय
रोड़े पत्थर के जंगलो के
बीच चलता जा रह था
एक आम जानवर की तरह
अपनी मांद की ऑर!!
.
तभी चौंका!
रस्ते में पड़ी थी
मेरे जैसे एक जानवर की "लाश"!!
घेर रखा था बहुतो ने........
शायद किसी अत्याचारी शिकारी ने
कर दिया था शिकार!
हो गया था बेचारा ढेर,
खून से लथ-पथ
निस्तेज, निर्विकार!!
.
उफ़!! चारो ऑर था!
कलरव, कोलाहल! मचा हुआ
परन्तु जो थे उसके चारो ऑर
वो भी थे तो जानवर ही
क्योंकि चिल्ला रहे थे
चीख रहे थे
पर, फिर खिसक रहे थे, चुपचाप..
जैसे वो ऐसे हादसे से थे बिलकुल अनभिज्ञ .......
.
मैं भी रुका,
हुआ स्तंभित!!
एक टीस सी उठी मन में!
अन्दर से एक हलकी सी आवाज आई --
"भगवन! इसकी आत्मा को शांति देना!"
लेकिन फिर! मैं भी
बढ़ गया आगे, धीरे से
आखिर मैं भी तो हूँ
इसी मानव जंगल का हिस्सा
भावना- शून्य !!
"एक जानवर"....................!!
.

Wednesday, February 3, 2010

विमोचन: अनमोल संचयन!!





३१ जनवरी २०१० को विश्वा पुस्तक मेला, प्रगति मैदान, दिल्ली में हिंदी युग्म दोग कॉम के तत्वाधान में इस पुस्तक "अनमोल संचयन" का विमोचन पद्म श्री बल स्वरुप राही के द्वारा हुआ, प्रशिध कवि, चित्रकार श्री इमरोज भी उपस्थित थे........इस पुस्तक को शर्मी मति रश्मि प्रभा ने सम्पादित किया और श्री मति प्रीती मेहता ने इसके कवर को डिज़ाइन किया है! इस पुस्तक में मेरी एक कविता भी शामिल थी..............."प्यार,प्यार और प्यार!"