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Saturday, March 8, 2014

बदलाव


जब भी मैं उन्मुक्त हो कर 
खुशी से झूमकर 
बिन सोचे समझे 
खिल खिला उठता 
तो वो कहती 
बड़े बुरे दिखते हो आप 
क्योंकि आगे वाले दो दाँतो के बीच का 
खुला पट
दिख ही जाता है, दूर से !!

जब भी दिल से 
अन्तर्मन से 
बहुत सोच समझ कर 
उकेरता कागज पर 
तो वो कहती 
बड़े बुरे दिखते हो आप 
क्योंकि 
कलम की सोच व 
सारी भाव भंगिमाएँ 
चेहरे को बुरी बनाती है 
दिख जाता है दूर से .... 

तभी तो 
मैंने 
बिना सोचे हँसना 
व 
सोच समझ कर लिखना 
छोड़ ही दिया है 
ठीक ही किया न !! 


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