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Thursday, July 18, 2013

शब्द सृजन



हर बार ऐसा क्यों होता है
अँधेरी सुकून भरी रात में
नरम बिछौने पर
नींद आने के बस
कुछ पल पहले
मन के अन्दर से
अहसासों के तरकश से
शब्दों के प्यारे बाण
चलने लगते हैं ....
मन ही मन
कभी कभी वास्तविक घटनाओं पर
तो कभी काल्पनिकता
की दुनिया में खो जाते हैं
बस फटाक से
कविता रच जाती है ...
.
पर ओह!
सुबह का ये नीला आकाश
दिखते ही
दूध-सब्जी लाने में
बच्चो को स्कुल भेजने में
न्यूज पेपर के व्यूज में
आफिस की तयारी में
सारे सहेजे शब्द खो जाते हैं
गडमगड हो जाते हैं

सारा रचना संसार
सारे शब्द भाव उड़ जाते हैं
शब्द सृजन की ऐसी की तैसी हो जाती है
दूसरी रात आने तक
ये क्यों होता है
हर दिन ???
___________________________________________
अगर हर रात का शब्द सृजन कागजों पर उतर जाये तो हम भी बड्डे वाले कवि होते !!
 


(एक क्लिक मेरे कैमरे से) 

39 comments:

सुज्ञ said...

सटीक अभिव्यक्ति!!

शान्तचित और व्यग्रता का भेद!!

Ranjana Verma said...

बहुत सही कहा आपने हर लिखने वाले के साथ यही होता है कविता के द्वारा बढियां अभिव्यक्ति ...!!

Pallavi saxena said...

ऐसा इसलिए होता है कि जब आप अकेले होते हैं तभी आप खुद से बात कर पाते हैं अपने मन में चल रहे द्वंद को समझ पाते हैं या समझने की कोशिश कर पाते हैं तभी जो भाव उमड़ते है वह कभी कहानी तो कभी कविता या आलेख का रूप बन जाते हैं।
वैसे हम जैसों के दिमाग में तो कभी भी कुछ भी आ जाता है और हम उसे तुरंत पन्नो पर उतार देते हैं। :)

डॉ. जेन्नी शबनम said...

सच में, उस वक़्त ही मन में ऐसे भाव क्यों आते हैं जब उसे मन में रख पाना या लिख पाना मुश्किल होता है. रोज़मर्रा के जीवन के अनुभव का सटीक वर्णन. शुभकामनाएँ.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

:):) बड़े वाले कवि पढ़ कर मुस्कुराहट आ गयी .... सबके साथ ही शायद ऐसा होता है ...

ranjana bhatia said...

sundar abhiwykti ...rachna to aese hi rachi jaati hai

प्रवीण पाण्डेय said...

जब मन हल्का होने लगता है, भाव अपनी स्पष्टता लिये चले आते हैं।

expression said...

यहाँ बड़ा कवि कौन है???
लिखते जाए बस....नापिए मत!!!

फोटो बहुत अच्छा है..nice click..

अनु

ARUN SATHI said...

वाह जी पर जिंदगी के इन्हीं दूध, सब्जी और बच्चों के बीच जो रची जाती है कविता वे आपकी इस कविता की तरह ही हमेशा खूबसूरत होती है. यथार्थ

Anju (Anu) Chaudhary said...

बेहद खूबसूरत सोच ....मुझे लगता है कि हर लिखने वाले के साथ ऐसा ही होता है ...मेरे ही अनुभव लिख दिए हो जैसे तुमने

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

kavita bahut achchi lagi.... sunder likha... aur photographs to bahut hi sunder hain....

SHIVE PRAKASH MISHRA said...

होता है ऐसा ही सबके साथ हर उस बार ,
जब हम चीजों को समय से नहीं सहेजते है,
क्या ठहरा है?कोई ज्वार,गुबार या फिर विचार ,
सागर का पानी, पानी की लहरे सब समझते है ,

बहुत सुंदर है कविता आपकी ।
शिव मिश्रा


इस्मत ज़ैदी said...

bahut sundar aur sachchi rachna !

Anupama Tripathi said...

कल्पना और यथार्थ के बीच जीवन और सृजन ...
सुंदर रचना .

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सशक्त अभिव्यक्ति, फ़ोटो बड्डी जोरदार है, शुभकामनाएं.

रामराम.

HARSHVARDHAN said...

सुन्दर रचना।।

नये लेख : आखिर किसने कराया कुतुबमीनार का निर्माण?

"भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक" पर जारी 5 रुपये का सिक्का मिल ही गया!!

Neelima sharma said...

sundar rachna .sab ke sath hota hain aisa .....

Arun Sharma said...

आपकी यह रचना आज शुक्रवार (19-07-2013) को निर्झर टाइम्स पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

Kailash Sharma said...

बिल्कुल सच...रोज़ ऐसा ही होता है...

Aparna Bhagat said...

शायद इसलिए की, ये बस वो ही क्षण होते हैं जब आप बस अपने साथ होते हैं.. बाकी सारे रूप सिमट जाते हैं.. विश्राम करते हैं.. और तब आप धीरे से स्वयं से साक्षात्कार करते हैं.. बतियाते हैं.. तब कविता फूटी है.. बह उठती है.. बहुत सुन्दर लिखा है मुकेशजी.. आपकी सादगी की कायल हूँ.. सीधे सादे ढंग से बहुत बड़ी बात कह देते हैं.. बहुत बड़े वाले कवि हैं आप.. शुभम्.

saroj said...

कल्पना को शब्दों में उतारने के लिए माकूल वक़्त की जरुरत होती है ....!
बहुत सुन्दर रचना आपकी !

vandana gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(20-7-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

कालीपद प्रसाद said...

नून तेल लकड़ी के चक्कर में कवी की हालत पतली हो जाती है -सही कहा आपने
latest post क्या अर्पण करूँ !

shashi purwar said...

sahi kaha mukesh ..srajan pal me ho jata hai pal me doop nikal aati hai shabdo ka khek tanhaiyon ke saath

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

बहुत उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

Anita (अनिता) said...

:) ख़याल कभी भी, कहीं भी.... बस....आ जाते हैं...
(आपकी ये रचना शायद पहले भी कहीं पढ़ी है... ऐसा लगता है...)
~सादर!!!

Saras said...

इसका बेस्ट तरीका है ...कलम किताब सिरहाने रखकर सोना......आजसे..!!!!

संजय भास्‍कर said...

खूबसूरत सोच .....!

Mahi S said...

:)Nice click

Mahi S said...

:)Nice click

sushma 'आहुति' said...

bhaut hi alag aur behtreen andaaz.....

सरिता भाटिया said...

सही कहा आपने मुकेश भाई बिलकुल ऐसे हि होता है मेरे साथ भी अब तो एक आँख खोल कर जल्दी से फ़ोन में लिख लेती हूँ कई बार

rohitash kumar said...

मुबारक हो जी....वड्डे कवि होने का सपना अब तक जिंदा है जी.....

उपासना सियाग said...

सच्ची बात , कोई -कोई ही कागज़ पर उतर पाता है

Onkar said...

हाँ,ऐसा सबके साथ होता है

sadhana vaid said...

भाव जगत एवं वस्तु जगत का यही फासला है जिसे विरले ही नाप पाते हैं ! बहुत सुंदर रचना !

sadhana vaid said...

भाव जगत एवं वस्तु जगत का यही फासला है जिसे विरले ही नाप पाते हैं ! बहुत सुंदर रचना !

राज चौहान said...

बहुत सुन्दर रचना आपकी मुकेश भाई

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !


राज चौहान
http://rajkumarchuhan.blogspot.in

Rewa tibrewal said...

sahi kaha apne apni rachna kay madhyam say.....aisa shayad har likhne wale kay saath hota hai