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Friday, May 18, 2012

~ कल और आज ~



"अगे मैया

मर जइबे"

छाती की बढती धड़कन

का दर्द

या,

कभी कभी न पढने का बहाना !

फिर

मचा देती थी

कोहराम......... मेरी दादी माँ!

.

आज पूरी रात

अथाह परेशानियों के दर्द तले

सो जाते हैं

सिसकते हुए, बिना आंसू के

और फिर नयी सुबह

"टिंच" पैंट शर्ट के साथ

हल्की मुस्कराहट के साथ

पहुँच जाते हैं ऑफिस ! ऑफिस !!


42 comments:

रश्मि प्रभा... said...

किस तरह वजनदार होती है ज़िन्दगी .... तकलीफों के बावजूद कोई शोर नहीं , सूजी आँखों की भी सफाई - रात सो नहीं सके .... और जिम्मेवारियां . अब तो दादी माँ का कोहराम भी काम नहीं आता आज की व्यवस्था में

अरुण चन्द्र रॉय said...

जिंदगी के दो रूपों का बहतु भावुक कर देने वाली तुलना... सुन्दर कविता..

anju(anu) choudhary said...

ऐसी ही हैं जिंदगी ....दुःख तकलीफ ..उफ्फ्फ

प्रवीण पाण्डेय said...

सहना ही है जीवन के हर पल..

सदा said...

भावमय करते शब्‍दों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति।

ऋता शेखर मधु said...

यही है आज की जीवन शैली...दर्द को भीतर रखना है और चेहरे पे मुस्कुराहट चिपकाना हैः)

neetta porwal said...

छाती की बढती धड़कन का दर्द या, कभी कभी न पढने का बहाना !फिर मचा देती थी कोहराम......... मेरी दादी माँ!

अपने वट वृक्षों के नेह ..सुरक्षा भरे स्पर्श और दुलार मनुहार की शीतल छाँव तलाशता मन ही मन सिसकता दुबका बाल हृदय .....

“सो जाते हैं ... ...सिसकते हुए, बिना आंसू के ...और फिर नयी सुबह हल्की मुस्कराहट के साथ "टिंच" पैंट शर्ट के साथ ” हल्की मुस्कराहट के साथ “...
बड़े होने के कुछ नुकीले दंश जिसे स्वीकारते अकुलाता मन ...
भावुक रचना .. बहुत शुभकामनाये !!

neetta porwal said...
This comment has been removed by the author.
Ankit Khare said...

jindagi ki aapdaaahpi her roj badastur jaari rehti hai , suraj ki kirano ki trha hum b kabhi kabhi kai kirdaro mai bikher jaate hai , to kabhi samunder ki trha her saahil per khud mai hi bandhe rehte hai , ... mukesh bhaiya , padhker achaa laga ,.. :)ultimate

शिवम् मिश्रा said...

जय हो ...

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - 'क्रांतिकारी विचारों के जनक' - बिपिन चंद्र पाल - ब्लॉग बुलेटिन

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

अमित श्रीवास्तव said...

अब तो दर्द भी बे-दर्द हो चला है |

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज की भागती दौड़ती ज़िंदगी .... रोने का भी वक़्त नहीं मिलता ... सुंदर प्रस्तुति

Anupama Tripathi said...

गहन भाव लिए ...बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ....!!
''न मिलता गम तो बर्बादी के अफ़साने कहाँ जाते ...?
अगर दुनिया चमन होती तो वीराने कहाँ जाते ...?

चलो अच्छा हुआ अपनों में कोई गैर तो निकला ...
अगर होते सभी अपने तो बेगाने कहाँ जाते ....?''

लाता जी का बहुत पुराना गाना याद आ गया ...आपकी कविता पढ़ कर ...!!
बहुत अच्छा लिखा है मुकेश ...
शुभकामनायें ...!!

kshama said...

Sach.....yahee hai zindagee!

anilanjana said...

बचपन एक हसीं ख्वाब.....इसमें कितने भी गोते लगाते रहे....एक दिन बहार निकलना ही पड़ेगा... यथार्थ की तेज़ धूप में...जीवन चाशनी को पकाना ही होगा...एक अनिवार्य अकाट्य सत्य..
तब मन ' पे बस नहीं था अब बस सब 'मन' में है ..अंतर्मन .''अथाह परेशानियों के दर्द तले सो जाते हैं.''..वाह्य आवरण..एक दम 'टिंच'..मुस्कान .वो तो एक तार की चाशनी में पगी.....सब जानते हैं..सब मानते हैं...परन्तु..स्वीकारते हैं...उसी 'टिंच' से रूप को..सहूलियत इसी में है....
हमेशा की तरह..एक गंभीर विषय पे सादगी सेभारी ..पूर्ण अभिव्यक्ति...ढेर सारा प्यार मुकेश..शुभकामनायें.....

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना...

lokendra singh rajput said...

भावुक कर देने वाली रचना....

नीरज गोस्वामी said...

बहुत अद्भुत रचना है आपकी....बधाई स्वीकारें

नीरज

Riya said...

वाह रे नखरे .......बाबूआ करे ढोंग ...ददिया उठाये नाज़
अच्छी कविता

Riya said...

आज कौन उठाएगा नाज़ ...खुदे दर्द झेलो खुदे खुश हो लो

Pallavi said...

यह जीवन है इस जीवन का यही है, यही है, रंग रूप थोड़े ग़म हैं थोड़ी खुशियाँ यही है,यही है रंग रूप....:-)
भावपूर्ण सार्थक अभिव्यक्ति...

सदा said...

कल 23/05/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


... तू हो गई है कितनी पराई ...

रवीन्द्र प्रभात said...

व्यक्तिक अनुभूतियों के माध्यम से आज की जीवन शैली का भावात्मक चित्रण बढ़िया है, सुन्दर शैली और मार्मिक कथ्य, बधाई स्वीकारें !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर और भावप्रणव..!

वन्दना said...

कितना सटीक चित्रण किया है ज़िन्दगी के दोनो रूपों का मुकेश ………कल और आज मे आये बदलाव को बहुत ही खूबसूरती से सहेजा है।

राजेश उत्‍साही said...

कविता बनते बनते रह गई।

वाणी गीत said...

अब कौन मनाये !!

निर्मला कपिला said...

ाब दादी माँ जैसी सहन शक्ति कहाँ रझी है । सुन्दर रचना\

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना...

रवीन्द्र प्रभात said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति..बहुत सुन्दर प्रस्‍तुति।

M VERMA said...

बहुत सुन्दर ...
सामंजस्य और समझौते जिंदगी के हिस्से हैं

मनोज कुमार said...

तस्वीरें लाजवाब हैं।
बहुत अच्छी प्रस्तुति।

rashmi ravija said...

बहुत ही संवेदनशील कविता..

पंछी said...

jindgi kabhi ek si nahi rahti na...parivartan badlav chalta rahta hai anvarat ...gahan abhivyakti

सुधाकल्प said...

बहुत कुछ कहते हुए चित्रों के साथ मर्म को छूती हुई कविता |

KAVITA said...

jindago ko aayene mein utar diya apne.. bahut achhi saarthak prastuti,,..
niyati ke aage kisi ka jor nahi..

Mukesh Kumar Sinha said...

Asha Pandey: मइया तो मइया ही होली ना उनकर जयसेन केहू ना .......Wednesday at 17:55 · UnlikeLike · 1.

Mukesh Kumar Sinha said...

Sunita Tiwari : yahi sach hai jeevan ka.....bt koi koi dard itna adhik hota hai ki us sev ubarne me samay lag jaata hai.......anyways...sundar abhivuakti.......Thursday at 16:00 · UnlikeLike · 1.

Mukesh Kumar Sinha said...

Roli Bindal Lath: kal se aaj tak ka safar...bade hone ka processThursday at 08:01 · UnlikeLike · 1.

Mukesh Kumar Sinha said...

Anand Dwivedi: अथाह परेशानियों के दर्द तले

सो जाते हैं

सिसकते हुए, बिना आंसू के
... ...
dadi ke bahut kareeb rahe ho tum lagta hai ?
sundar kavita bhai !See moreWednesday at 17:06 · UnlikeLike · 2.

Vijay Kumar Sappatti said...

this is it mukesh . kudos .