जिंदगी की राहें

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Wednesday, September 4, 2013

ये सेलफोन !


कमबख्तये सेलफोन!
जब आया तो लगा
जैसे संपर्क सूत्र बढ़ाएगा..
हर अपने को..
बतियाते हुए
और करीब लाएगा
पर विज्ञान का
एक साधारण आविष्कार..
उस छुरी-चाकू की तरह है
जो काटता है फल..
वो काट सकता है गरदनें..
इस मुए सेलफोन ने
छिन ली मिलने की लालसा..
बस बतिया कर,
पूछ कर क्षेम-कुशल..
रह जाते हैं,
स्वयं को सिमेट कर
खुद अपने ही खोल मे !
जिन रिश्तों के लिए मरते थे
वो अब 'हाय! हैलो!'
 में लगा है मरने..

कहीं ऐसा तो नहीं
किइस मोबाइल के
कारण ही रिश्ते भी
लगे हैं रिसने..
मुट्ठी में भरे रेत की तरह
भरभराने लगे हैं...
है न... सच.. कुछ ऐसा ही !!

काश,
सेलफोन-रिचार्ज की तरह
रिसते हुए रिश्ते
भी हो पाते रिचार्ज..
पुल बांधता ये सेलफोन..
ले आता रिश्तों में सामिप्य..

काश!
जैसे तरंगे भर देती हैं
मुर्दे में भी जान..
ठीक वैसे,
सेल फोन की ध्वनि तरंग
से भीबज उठती मन के भीतर...
आनंद की एक मृदंग..
काश!
हम वाकई महसूस कर पाते

एक मोबाइल की सार्थकता.....


Monday, August 26, 2013

नर व मादा



एक स्त्री आ रही थी
पुरुष ने दूर से निहारा
उसका चेहरा
उसकी अदा
उसकी संरचना
उसकी खूबसूरती
उसकी कमर
उसका तनबदन !
और एक खूबसूरत स्त्री आ कर गुजर गई.......

एक पुरुष आ रहा था
वो आया और चला गया
स्त्री ने कहा/सोचा
इंसान अच्छा लगता है ...

एक ने देखा जिस्म
दूजे ने देखे भाव .......
नर व मादा की अलग पहचान

ऐसा ही होता है न........!!


Sunday, August 18, 2013

रिश्ता लिफाफे में, सिमटा हुआ..


ईमेल एसएमएस की दुनिया में
डाकिये ने पकड़ाया लिफाफा
29 रुपए के स्टेम्प से सुसज्जित
भेजा गया था रजिस्टर्ड पोस्ट
पते के जगह, जैसे ही दिखी
वही पुरानी घिसी पिटी लिखावट
जग गए, एक दम से एहसास
सामने आ गए, सहेजे हुए दृश्य
वो झगड़ा, बकबक, मारपीट
सब साथ ही दिखा

प्यार के छौंक से सना वो
मनभावन, अलबेला चेहरा
उसकी वो छोटी सी चोटी,
उसमे लगा काला क्लिप जो होती थी,
मेरे हाथों कभी
एक दम से आ गया सामने
उसकी फ्रॉक, उसका सैंडल
ढाई सौ ग्राम पाउडर से पूता चेहरा
खूबसूरत दिखने की ललक
एक सुरीली पंक्ति भी कानों में गूंजी
“भैया! खूबसूरत हूँ न मैं??”

हाँ! समझ गया था,
लिफाफा में था
मेरे नकचढ़ी बहना का भेजा हुआ
रेशमी धागे का बंधन
था साथ में, रोली व चन्दन
थी चिट्ठी.....
था जिसमे निवेदन
“भैया! भाभी से ही बँधवा लेना !
मिठाई भी मँगवा लेना !!”
हाँ! ये भी पता चल चुका था
आने वाला है रक्षा बंधन
आखिर भाई-बहन का प्यारा रिश्ता
दिख रहा था लिफाफे में ......
सिमटा हुआ...........!!!
~मुकेश~


Wednesday, August 14, 2013

"आल इज वेल"


एक आम भारतीय को
सुनाई पड़ती आवाज़
उसकी वाणी से निकालता
विवश स्वर
और दिल के किसी कोने में
एक मासूम सी दमित इच्छा
काश सच हो जाये
कहना सुनना
और बोलना
"आल इज वेल"

अरे बाबा !
आतंकवादियों की गोली
नेताओं की टोली
और बोली
आश्वासन की रंगोली
हो जाये सच
फिर तो
होगा ही होगा
"आल इज वेल"

जाति वाद का दंगा..
या फिर हो खाकी वर्दी से पंगा
बुद्धि विवेक को मित्र बनाओ
बनाओ मंदिर राम लाला का
या फिर मस्जिद में करो अजान
या फिर सोचो और बनाओ..
विद्या दान का मंदिर महान
फिर तो
होगा ही होगा
"आल इज वेल"

आतंक वाद को दे दो फांसी..
चलने न दो दाउद का धंधा
चाहे पड़े विदेशी फंदा..
अनमोल है रक्त हमारा
समझे नहीं इन्हें कोई मंदा
अमन का पैगाम..
तब फैलेगा
जब मिट जायेगा
कथनी करनी का अंतर
पहला कदम जब होगा खुद का
फिर तो
होगा ही होगा
"आल इज वेल"
"आल इज वेल"
"आल इज वेल"
___________________________________________________________
अंत में सौ बात की एक बात...काश हम सब भारतीय ये शपथ लें की हम अमन और शांति के समर्थक रहेंगे...........
HAPPY INDEPENDENCE DAY !!!
— feeling सुंदर और खूबसूरत भारतवर्ष के सपने के साथ :)

Wednesday, August 7, 2013

टाइम मशीन मे बंधती जिंदगी




लगता है !
फिर से हो जाऊंगा लेट
ऑफिस जाते समय
जूते के लेस को बांधते हुए
जब गई दीवाल घड़ी पर नजर
हर दिन, छोटी-मोटी वजह
और अंततः
ऑफिस एंट्री गेट पर लगी
पंचिंग मशीन पर रखी उंगली
बता ही देती थी
हो ही गए न, दस-बीस मिनट लेट!

कल तो पक्का
समय पर नहीं, समय से पहले पहुंचूंगा
दिया खुद को ढाढ़स
आधे घंटे पहले का लगाया एलार्म
श्रीमती जी को भी दी हिदायत
सुबह उठा भी समय से, जगा
फिर आँखों ने ली एक हल्की सी झपकी
जो बन गया खर्राटा
फिर वही ढाक के तीन पात
पंचिंग मशीन में दर्ज दस-बीस मिनट लेट !

टाइम मशीन में बंधती जिंदगी
हर सुबह लाती खुद पर खीज
हर नया दिन बदल जाता है कल में
आने वाला नया कल होगा न परफेक्ट
इसी सोच में कटती जा रही जिंदगी
इस्स! ये कल आएगा कब
काश मिल पाती
समय की स्वतन्त्रता
ताकि हर दिन खुद को न लगता
फिर से हो गए न दस-बीस मिनट लेट!



Friday, August 2, 2013

मौसम सा बदलता रिश्ता


मौसम की आवोहवा रिश्तों पर करती है असर !

ठंडी संवेदनाएं
और जम कर बनता बरफ
जैसा हो जाता है रिश्ता
अंधेरी सर्द भरी रात
बिलकुल घुप्प एवं ठंडी
दूरी मे रहती है गर्माहट
तो नज़दीकियाँ से हो जाती है सर्द
ये रिश्ता भी है अजीब
मौसम की आवोहवा रिश्तों पर करती है असर !

कभी कभी रिश्तों के बीच
चलती है लू जैसी गरम हवा
ढाती है कहर
झुलसा देती है अंदर तक
क्षण भर के कडवे गरम बोल
बना देते हैं पराये
तो ग्रीष्म ऋतु की दोपहरी के तरह
मौसम की आवोहवा रिश्तों पर करती है असर !

ये संबंधो का अलबेला रिश्ता
सुख-दुख के दामन के बीच
खेलता है, अठखेलियाँ करता है
फिर कभी कभी यही रिश्ता
सावन के मूसलाधार बारिश की तरह
आँखों से झर-झराने लगता है
ला देती है अंदर तक नमी  
फिर यही बरसता सावन  
लाता है गर्मजोशी
रिस जाता है दर्द …..
तो सही है कहा 

मौसम की आवोहवा रिश्तों पर करती है असर !


Monday, July 29, 2013

युवा शिखर सम्मान (परिकल्पना ब्लॉग गौरव युवा सम्मान) 2013



एक खुशी का पल मिल जाए तो बात बने :)

ऐसा ही कुछ पिछले दिनों हुआ, जब सुबह फेसबूक लोग ऑन किया और एक मैसेज चमका, जो शिवम मिश्रा जी का था, सिर्फ उन्होने लिखा था – “हार्दिक बधाई स्वीकार करें”!! मैंने आश्चर्यचकित होकर पूछा – वजह?? उन्होने परिकल्पना का लिंक पोस्ट कर दिया। अब जैसे ही वहाँ पहुंचा तो एक बहुत बड़ी वजह मेरे इंतजार कर रही थी, जो मुझे अंदर से खुशी दे रही थी।  परिकल्पना ब्लॉग जो हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन करवाती है ने युवा शिखर सम्मान (परिकल्पना ब्लॉग गौरव युवा सम्मान) के लिए संतोष त्रिवेदी (ब्लॉग – बेंसवारी) के साथ मुझे भी चुना । इस सम्मान के अंतर्गत 5100/- की धनराशि, स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र,श्री फल, पुस्तकें और अंगवस्त्र प्रदान किए जाएंगे। आगामी 13-14 सितंबर 2013 को काठमाण्डू में आयोजित "अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन" में ये सम्मान दिया जाएगा । 

सम्मान किस वजह से मिला, क्यों मिला, कैसे मिला ये आयोजक के सोच का विषय है। मैं इस पचरे से दूर रह कर ही खुश हूँ।  मुझे खुश होने की आदत है, और बस... इस सम्मान के घोषणा के कारण मेरी खुशी वाजिब है। 

पिछले दिनों मैंने खुद अपने फेसबूक प्रोफ़ाइल पर ये स्वीकार किया था, और ये मैं मानता भी हूँ 

एक स्वीकारोक्ति :

# मेरे पास शब्दो की कमी होती है . 
# मेरे पास अपने सोच को शब्द रूप देने की क्षमता कम है .
# मेरे पास हिन्दी व्याकरण/पद्य विद्या का तकनीकी ज्ञान नहीं है .
# मैं गणित/विज्ञान से जुड़ा एक साधारण सा छात्र रहा हूँ .
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पर हाँ, मेरे पास संवेदना है, एहसास है और इसी कारण मैं अपने सीमित शब्दो को जोड़कर “कविता जैसी कुछ” सृजित करता हूँ .......

अब पसंद/नापसंद आपके हाथों में .........  —  feeling भईयाजी इस्माइल टाइप :)

अंत मे बस मैं इतना कहूँगा पांच साल पहले अपना ब्लॉग बनाया था, और तब से  अपने संवेदनाओं /अहसासों के वजह से धीरे धीरे ही सही, आप सबके साथ आगे बढ़  रहा हूँ… और आगे भी लगातार ये यात्रा जारी रहे, ऐसी कोशिश रहेगी ...

रवीद्र प्रभात जी और परिकल्पना टीम का दिल से आभार प्रकट करता हूँ ... !!