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Monday, August 3, 2015

मेरा और नदी का सफ़र


सफ़र के आगाज में मैं था
जैसे उद्गम से निकलती
तेज बहाव वाली नदी की कल कल जलधारा
बड़े-बड़े पत्थरों को तोडती
कंकडो में बदलती, रेत में परिवर्तित करती
बनाती खुद के के लिए रास्ता.
थे जवानी के दिन
तभी तो कुछ कर दिखाने का दंभ भरते
जोश में रहते, साहस से लबरेज !!
सफ़र के मध्यान में हूँ
कभी चपल, कभी शांत, कभी खिलखिलता
नदी का मैदानी सफ़र हो जैसे
तेज पर संतुलित सा जलधारा
किसानों का पोषक, नाविकों का खेवैया
उम्मीद व ख्वाहिशों का बोलबाला
जो बेशक पूरा न हो, आगे बढ़ते जाता
जैसे कभी बाढ़ लाती तो
कभी खुशियों की संवाहक नदी !!
होगा एक दिन अंतिम सफ़र
जब शिथिल होगा शरीर
थम जायेगा या फिर मंथर होगा बहाव
थमते रुकते धीरे-धीरे
जैसे नदी अपने अंतिम क्षण में
डेल्टा पर जमा करती हो अवशेष
फिर पा जायेगी परिणति!!
ख़त्म हो जायेगा शरीर
जैसे मिल गये
क्षितिज जल पावक गगन व समीर !!
हे ईश्वर !!
मेरा और नदी का सफ़र
सब है नश्वर !!
-------------
जिंदगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र......?


6 comments:

Upasna Siag said...

bahut sundar rachna ...jindgi ka safar aisa hi to hota hai ...

Samta Sahay said...

बेमिसाल रचना !

रचना दीक्षित said...

बहुत ही सुंदर कविता.

Madhulika Patel said...

नदी और इन्सान दोनों की गति इक समान चलती रहती है । बहुत सुंदर ।

Aparna Sah said...

sundar,gatisheel rachna..nadi ke prawah ki tarah.

Onkar said...

बहुत सुंदर