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Tuesday, July 28, 2015

"बुद्धं शरणम् गच्छामि................."

ऐ धरती
मैं तुम पर खड़ा रहने के बदले
चाहता हूँ तुम्हारे गोद में सोना,
चाहता हूँ महसूसना
चाहता हूँ मेरे देह में
लिपटी हो मिटटी
जहाँ तहां घास और खर पतवार भी
और फिर, वही पड़े निहारूं
नीली चमकीली कोंपल से भरी दरख्ते,
और उस पर बैठी काली मैना !!

मेरे चेहरे पर, हो लगी
जीवनदायिनी नम कीचड़
उसके सौंधेपन में
खोया हुआ मैं !
ताकूं नीले गगन को
और दिख जाए दूर उडती हुई
झक्क सफ़ेद, घर लौटते
हंसो का समूह !! एक समूह में !!

ऐ धरती !!
तुम्हे छूना, तुम्हारा स्पर्श
ठीक वैसे ही न
जैसे मिलती हो ममता माँ की
या प्रेमिका का दैहिक, उष्ण स्पर्श
दोनों ही प्रेम, संवेदनाओं का अतिरेक !!
आनंद की पराकाष्ठा !!

ओ मेरी वसुधा
तुममें लेट जाना
ठीक वैसे ही न
जैसी बौधि वृक्ष के नीचे
बुद्ध ने पाया हो परम ज्ञान
या फिर जैसे मरने पर मिलेगी
मुझे शांति !! या बहुतों को शांति !!

अभी तो बस मैंने ये
महसूसा, हूँ तुम पर लेटा
और दूर से बोध मठ से आ रही आवाज
"बुद्धं शरणम् गच्छामि................."
_____________________
ज्ञानं शरणम् गच्छामि.......

2 comments:

Samta Sahay said...

एक सुखद अनुभूति होती है आपकी रचना को पढ़ने के बाद !

सदा said...

एहसासों के शिखर पर कई बार ऐसा भी महसूस होता है
और सुनता है मन भी कई ऐसी ही आवाजों को जो उसे देती हैं सुकून और जिंदगी को नये आयाम ..... बहुत ही अच्छा लिखा है आपने