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Sunday, November 18, 2012

लेंड-क्रूजर का पहिया




एक महानगर से सटे
एक छोटे से गाँव में
थी चहल पहल
चमक रहा था
कैमरे की लैंस 
न्यूजरूम के स्टीकर वाले
चौकुठे काले माइक्रोफोन पर
बोल रही थी
रोती कलपती 
मनसुख की मैया -
हमरा एक ही बेटा रहा
ऊ भी जवान
हाँ पीता था दारू
बीडी की लत तो रहबे करी 
पर था, हमरा जिगर का टुकड़ा 
हमरे बुढ़ापे का लाठी रहा
अब कैसे जियेंगे 
ई  फ़ट्ट्ल  साड़ी 
औ सुख्खल रोटी
तो मिल जात रही 
अब तक, ओकरा वजह से....
.
दूर पड़ी थी 
सफ़ेद कपडे में ढकी लाश 
पर मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज
मैं नहीं थी, मनसुख की मैया
या उसका  इंटरव्यू ...
टी.आर.पी. कहाँ बनती है ..
भूखी बेसहारा माँ से 
इसलिए टी.वी. स्क्रीन पर
चिल्ला रहे थे..
न्यूज रीडर...
लेंडक्रूजर के नीचे
सी.पी. के व्यस्त चौराहे पर
गया मेहनतकश नौजवान
और बार बार सिर्फ ...
दिख रहा था स्क्रीन पर
चमकता लेंड-क्रूजर
व उसका
निर्दयी पहिया...


46 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सत्य घटना पर आधारित एक संवेदनशील रचना ...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुन्दर रचना .सुन्दर सच अभिव्यक्त ब्यान हुआ है ....इस रचना में .........

Girish Billore said...

अच्छा आलेख

ऋता शेखर मधु said...

मर्मस्पर्शी...बेचारे गरीब को देखता भी कौन

Madan Mohan Saxena said...

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

expression said...

दिल को छू लेने वाली रचना....
सहज अभिव्यक्ति..

अनु

Rajesh Kumari said...

आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 20/11/12 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका स्वागत है

Bhavna....The Feelings of Ur Heart said...

ek aur kadva sach iss duniya ka jo aap ne apni iss rachana mein share kiya ....with simple words ....nice

Neelima sharrma said...

मर्मस्पर्शी

यादें....ashok saluja . said...

ये ही है ...टी.आर.पी. की सच्चाई .....

shikha varshney said...

एक बेहद सच्ची और संवेदनशील रचना.टी आर पी ने तो तबाह कर रखा है.

sangita said...

मन की पीड़ा हर हाल मे बयाँ होती है

ashish said...

ओह्ह ,ये टी आर पी, इंसानियत को खा गई है .--

Anju (Anu) Chaudhary said...

सच को भी दिखावे का आवरण चहिए
बहुत खूब ...और सच भी

प्रवीण पाण्डेय said...

मार्मिक घटना, संवेदनशील रचना।

shalini said...

संवेदन हीन होते समाज का क्रूर चेहरा ... जहाँ मौत भी टी.आर. पी, बढ़ाने का साधन है.....
हृदय स्पर्शी रचना!

शिवम् मिश्रा said...

मार्मिक ... :(

Reena Maurya said...

मार्मिक रचना...
यथार्थ चित्रण...

Rajesh Kumari said...

बहुत मार्मिक यही सच है इस देश का

Vaanbhatt said...

भयावह तस्वीर है...हमारी संवेदनहीनता की...

वाणी गीत said...

संवेदनाएं और दुःख भी इनके लिए बिकने की चीज है .
मार्मिक चित्रण .

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

अच्छी रचना
बहुत सुंदर प्रस्तुति
क्या बात

Kailash Sharma said...

बहुत प्रभावी संवेदनशील प्रस्तुति...

सदा said...

मन को छूती पोस्‍ट ... बेहद सशक्‍त लेखन

poonam matia said...

प्रभाव शाली अभिव्यक्ति .........

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

संवेदनशील अभिव्यक्ति!!

Saras said...

एक ऐसा तकलीफदेह सच , जिससे हम आये दिन रूबरू होते हैं....मर्मस्पर्शी!!!!

Meenakshi Mishra Tiwari said...

बेहद संवेदनशील !!

neetta porwal said...

उघाड़ती ओछी हो चुकी मानवीयता ... सोचने को बाध्य करती अच्छी रचना ....

Archana said...

दुखद ....
घटनाएँ बन जाती है खबर,
या बना दी जाती है कविता
फ़िर लोगों तक पहुँचती है,
और कुछ ही दिनों में खो जाती है खबर...
लेकिन वो बात, जो होती है उस खबर का हिस्सा,
या बनती है जिस पर कविता
कई दिनों, बल्कि सालों तक करती है असर...

वन्दना अवस्थी दुबे said...

मार्मिक रचना है मुकेश जी टीआरपी जो न कराये।

rashmi ravija said...

ओह बहुत ही संवेदनशील,मार्मिक कविता

Kulwant Happy "Unique Man" said...

सार्थक पोस्‍ट एवं संवेदना से भरी मर्मस्‍पर्शी अभिव्‍यक्‍ति

संतोष त्रिवेदी said...

...संवेदनहीन होते हम !

Anita said...

हर जगह 'टी आर पी' ही तो देखी जाती है... वो जिसके ऊपर निर्भर... वही छाया 'टी वी' पर...
दुख होता है... ये सब देख सुन कर... :(
~सादर !!!

Vibha Rani Shrivastava said...

न्यूज रीडर...,टी.आर.पी. की सच्चाई की बखिया उधारती रचना .... !!

Vibha Rani Shrivastava said...

न्यूज रीडर...,टी.आर.पी. की सच्चाई की बखिया उधारती रचना .... !!

संध्या शर्मा said...

संवेदनहीनता बढती ही जा रही है, आजकल मौत तक को भुनाते है लोग अपने फायदे के लिए...सच्चाई बयां करती मार्मिक रचना...

Vijay Kumar Shrotryia said...

सुंदर अभिव्यक्ति.....

neetta porwal said...

मशीनों पर चलती उंगलियों से संवेदनाए भी शून्य हुई ...बहुत दुखद .. मन आद्र हो उठा !!
आपका भावुक मन पल में ही माँ की विचलित मनः स्थिति भांप गया और सिमट आई पीड़ा रचना बन ...यही दुआ कि शेष रहे अभी इंसानियत ..

Mukesh Kumar Sinha said...

Swati Bhalotia: ek bahut contemprory saa kataaksh likha hai mukesh jee.....aur bahut hi saarthak laga hamen....bhaav drishti se to hamaari tarah sabhi ko behad pasand aaya hai kintu hamen iski kavyaatmak pehlu bhi bahut mazboot laga...
2 hours ago · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Shweta Agarwal: uff.....na jaane ye media insaanon ko insaan kab samjhna seekhegi.....khud kab dekhegi apni hi sharmnaak harkatein....jo mare hue ko bhi maar jaati hai.....bahut hi maarmik rachna hai Mukesh ji is baar aapki....aansu nikal gaye us maa ki kismat par....aur yahi dua hai ke piditon ko bhagwaan media se bachaye
34 minutes ago · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Neeta Mehrotra: एक कड़वा सच .... जिन्दगी तार - तार हुई जाती है और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ....
गजब सच का लयात्मक वर्णन किया है आपने .
3 minutes ago · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Rumi Bagga: marm' sparshi ..
..
ik dukhas ghatna ka ..bhaavpurn varnan..
6 hours ago via mobile · Unlike · 1

Dimple Kapoor said...

how touching :(..sach mein jo khota hai bas vahi samaj sakta baaki uski manosthiti nhi bhaamp paate :(