Friday, January 29, 2021
प्रेम
Friday, November 27, 2020
मोनालिसा
सुनो
सुन भी रही हो
सुनोगी भी
उफ़ सुनो न यार !
मैंने अपने जिंदगी के कैनवास पर
नोकदार डबल-एच पेंसिल से
खिंचा था, सिर्फ एक ही स्कैच
थी बहुत हल्की सी आभासी स्कैच
फिर मेरी दुनिया में तुम आ गयी
तुमने कोशिश की रंग भरने की
शुरूआती दिनों में, स्कैच के आउट लाइन पर
तुम्हारे भरे रंग, नहीं जंच रहे थे
पर जैसे जैसे, बीते दिन, बीती जिंदगी
ब्रश चला, रंग भरते चले गए, सुनहले
और, फिर, वो स्कैच, उसमे दिखने लगा
तुम्हारा अक्स !
बहुत बार, बदरंग सी लगी कैनवास
लगा, नहीं बेहतरीन बन पायी पेंटिंग
न तो कोई शउर, न ही कोई नजाकत
फिर,
मेरे अन्दर के पुरुष चित्रकार का विचलित मन
बनाऊं कुछ दूसरा, फिर से करूँ कुछ अलग कोशिश
पर मिली निराशा,
या तो पेंसिल की ग्रेफाईट टूट गयी
या जिंदगी का कैनवास ही मुड़-तुड गया !
अब अंततः, मुझे वही स्कैच
जो बनाई थी, पहली और अंतिम बार
मेरी लगती है सबसे बेहतरीन व सर्वोत्तम कलाकृति
अनमोल !
सुन रही हो न
अतिम बार कह रहा हूँ
गाँठ बाँध कर याद रखना
किसी ने कहा भी,
चित्रकार
जिंदगी में सर्वोत्तम कलाकृति एक बार ही गढ़ता है
मोनालिसा हर दिन नहीं गढ़ी जाती न !
~मुकेश~
Wednesday, October 21, 2020
प्रेम कविता लिखने की शर्त
प्रेम कविता लिखने की शर्त लगी थी
इस तंज के साथ कि
आज तक मुझ पर नहीं रच पाया कोई
प्रेम कविता !
बिन कहे कुछ
सोचा कि
लिखूं तो क्या लिखूं
होंठ लिखूं या लिखूं गुलाब की गुलाबी पंखुडियां
जो कभी हुआ करते थे प्रेम पत्र के साथ
रुमानियत भरने के लिए
हुआ करता था जो जरूरी
या फिर लिखने से पहले
ताकूं सुरमई आँखों में
हाँ, नजरों में अटकना ही तो है शायद
प्रेम के पहले पग पर ठिठकना
अगर अटका तो खोया
फिसला तो, हमें पता है
कह ही दोगी
ओये लड़के उतनी दूर तक नहीं !
खैर, रहने दी कविता
कर ली अपनी आँखे बंद
और फील करने लगा मुस्कराहट
तभी तो फैले बाहों से इंद्रधनुषी आसमान के साथ
महसूसने लगा तुम्हारी आहट
थे मेरे हाथो में तुम्हारे हाथ
थी स्पर्श की उष्णता
शायद कहीं प्रेम कविता की मांग में था
छिपा हुआ विस्मयकारी प्रेम भी तो
सोचा लिखूं तुम्हारे भरे हुए कंधे
और लिखूं तुम्हारी आवाज सुरीली
तभी आवाज सोचते ही फना होने लगी रूह
धधकने लगा अलिंद और निलय के बीच
बहने वाला रुधिर
टूटती नींद के साथ खिलखिलाते सपने भी तो
तकिये के अगल बगल से चिढाते हुए कह उठे
कवि तुम प्रेम में तो नहीं हो उसके
कब आ चुकी थी निद्रा
कब नींद में भी बहकने लगा था मन
पता चला तब,
जब तकिये में दबाये चेहरे को
करने लगा देह की यात्रा
देह से देह तक
कमनीयता से नज़ाक़त तक
मन से मन तक पहुँचने से पहले
पर, कुछ अजब गजब सोच भी
होती है प्रेम में निहित
किसी ने बताया था कभी
फिर जैसे चुप्पी होती है वाचाल
वैसे ही सोया हुआ जिस्म दौड़ता है अत्यधिक
चलो हो चुकी है अब भोर
फिर कभी लिखूंगा तुम पर
प्रेम और प्रेम कविता
आज तो बस जान लो
कवि के मन की बात कि
खिलखिलाते हुए लोग होते हैं खूबसूरत !
हाँ फिर से कह रहा हूँ
मुझे प्रेम कविता लिखते रहनी हैं
हर नए दिन में नए नए
झंकार था टंकार के साथ !
समझी ना !
~मुकेश~
Saturday, September 12, 2020
परिधि प्रेम की
पर फिर भी,
एक निश्चित त्रिज्यात्मक दूरी में
लगा रहा हूँ वृताकार चक्कर
खगोलीय पिंडों सा
Wednesday, August 19, 2020
स्वरों को मिला सुर
उम्मीदों की बात कहूँ तो
कभी लगा था, वो'ह्रस्व उ' की तरह घूम फिर कर लौटेगी
पर 'दीर्घ उ' की सरंचना सरीखी
एक बार जो मोड़ से घूमी
दूर तक चली गयी
'ए-कार' सा रह गया अकेला
पर 'ऐ-कार' बनने की उम्मीद में
ताकता रहा हर समय एक आंख से 'चन्द्रबिन्दु' जैसा
किंतु परन्तु के सिक्के को उछाले
दरवज्जे से तिरछी हो, झांकी ऐसे, जैसे हो
'अ:' की तरह, दुपट्टा से खुद को छिपाए
बस, बेशक दरवाजा था बन्द 'ह्रस्व इ' सा
पर आ कार सा खुला, 'अ' आया और
'दीर्घ इ' की तरह अंदर से बहते प्रेम संग बन्द हो गया
जिंदगी फंसी रही 'ऋ' जैसे दुविधाओं में
पलटती तो कभी खोलती रही
पर अंततः 'ओ-कार' के झंडे में
आना ही पड़ा 'औ-कार' की तरह उसको भी।
इस तरह, स्वरों को मिल ही गया सुर।
~मुकेश~ #poetryonpaper
Wednesday, July 15, 2020
न्यूज एंकर : कोरोना काल
Wednesday, July 1, 2020
हार्मोनल चेंज ड्यू टू लव
हाँ संबोधित करने के लिए कहना ही होगा
सुनो न !
जब, तुम्हें देखने भर से
बनने लगता है मुझमे, अत्यधिक मात्रा में
अड्रेनलिन व कार्टिसोल
जो धड़कनों के प्रवाह के आयाम को
पहुंचा देता है उच्चतम स्तर पर
बेशक जिससे शायद कहीं अंदर रहता है तनाव
पर वो होता है रुमानियत भरा
जब उछाल मारती है ऊर्जा
उल्लास की फूटती है चिंगारी
जब तुम्हारे आगोश के आलिंगन का सुख
मिलता है तुमसे !
पलछिन, घंटे, दिन, रात बीतते रहे
मेरे खयालातों में बना रहा तुम्हारा बसेरा
क्योंकि तुम ही तो हो वो वजह
जिसने बढ़ाया सेरोटोनिन मुझमें
.... है न सही
जिस कारण स्त्रावित होता रहा
ऑक्सीटोसिन हार्मोन
जिसने किया कुछ ऐसा कि
जिंदगी के गुलाबी बहाव में
महसूसता रहा तुम्हारे चुंबन की तीव्रता
सब, सब
हाँ दिया तो तुमने
तभी तो सामीप्य की गुलाबी उम्मीदें
प्रेम से जलाता रहा देह
टेस्टोरोन व एस्ट्रोजोन की बढ़ती मात्रा
था पास, बेहद पास आने का कारण
मेरे अंदर का प्रेम रसायन
बहेगा हर समय
तुम्हारे वजूद के कारण
रहेंगी चाहतें प्रेम केमेस्ट्री की
केमेस्ट्री फ़िज़िक्स से इतर
अपने जिंदगी के मैथेमेटिक्स में
मेरी उपस्थिति के शून्य को
आंकना, स्वयं को दस गुना बना कर














