एक बेहद संजीदा अभिव्यक्ति
कहती है ये
फिर अंतिम बार उनसे मिलने
समय के कमी की वजह से
कर रहा था हवाई यात्रा
बेहद ऊंचाई पर था शायद
पड़ रहा था दिखाई
विंडो के पार दूर तलक
फटा पड़ा था आसमान
बिखड़े थे बादलों के ढेर इधर-उधर
उसके स्लीपर कूपे में बैठा
द्रुत गति से भाग रहा था अशांत मन
टाइम फ़्रेम को छिन भिन्न कर
बना रहा था रेतीली मिट्टी के घरौंदे
पर, गृह प्रवेश से पहले
टूट चुके थे ख़्वाब
मिट्टी में ही तिरोहित हो चुके थे पापा
अपने सहज वेग के साथ।
रेलवे स्टेशन से पापा के करीब तक
खटर-पटर करता रिक्शा
उछल कूद कर रही थी
सुषुप्त संवेदनाएं,
सड़कों ने चिल्ला कर बताने कि
की कोशिश
स्मृति पटल पर चल पड़ी
पापा की 'मोपेड'
उनके कमर पर हाथ था मेरा।
फिर भी उनकी ठंडी हथेली ने
भर दी थी गर्माहट
बेशक आंखे छलछलाई
पर रो नहीं सका एक भी पल
कंधे पे था स्नेहसिक्त हाथ
छोटे भाई का,
लेकिन कुंद हो गयी आवाज
रुआंसा हो कह पाया
बस
गुड बाय 'पापा'
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| दैनिक जागरण, पटना में प्रकाशित |











