जिंदगी की राहें

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Saturday, February 17, 2018

भागी हुई लड़की


भागी हुई लड़की
मिली थी ट्रेन में, सामने वाली बर्थ पर बैठी थी सकुचाई हुई
शायद नहीं था पता उसे गंतव्य का
तभी तो नहीं था ट्रेन टिकट
या फिर ये भी हो सकता कि नहीं थे पैसे
क्योंकि उसने नहीं खाई एक बार भी मूंगफली
या नहीं पीया चाय !
जैसे सोचते हो न, भागी हुई लड़की
होगी बहुत बहुत खूबसूरत
पर, बेवकूफ हो, वो उलझे बालों वाली बालिका
नहीं थी सुन्दर, न ही इंटेलिजेंट
भूख से तिलमिलाई ताक रही थी
बस टुकुर टुकुर
नहीं समझ पा रही थी वो
स्वयं के अन्दर चल रहा था शायद अंतर्द्वंद
क्यों भागी वो अपने अम्मा और बाबा को छोड़ कर
क्योंकि घर में भी नहीं मिला था खाना
या फिर इस शक्ल के साथ, दूर के रिश्ते का मामा
आँखों से बींध देता था रोज
बुरे स्पर्श की नियति आखिर झेले कब तक
उदर की भूख और भूखी बद नजर से
बचने को ..........
भागी थी लड़की
वो बात थी दीगर
भागी हुई लड़की फिर से झेल रही थी
पेट का दर्द व घूरती नजर
अब ठप्पा भी लग गया था कि
वो है "भागी हुई लड़की"
क्या क्या झेले आखिर !
भागी हुई लड़की !
~मुकेश~


Saturday, September 23, 2017

गुड बाय 'पापा'



'पापा' तो होते है 'आसमान'
एक बेहद संजीदा अभिव्यक्ति
कहती है ये 
फिर अंतिम बार उनसे मिलने
समय के कमी की वजह से
कर रहा था हवाई यात्रा
बेहद ऊंचाई पर था शायद
पड़ रहा था दिखाई
विंडो के पार दूर तलक
फटा पड़ा था आसमान
बिखड़े थे बादलों के ढेर इधर-उधर
पापा दम तोड़ चुके थे।
तेज गति से भाग रही थी ट्रेन
उसके स्लीपर कूपे में बैठा
द्रुत गति से भाग रहा था अशांत मन
टाइम फ़्रेम को छिन भिन्न कर
बना रहा था रेतीली मिट्टी के घरौंदे
पर, गृह प्रवेश से पहले
टूट चुके थे ख़्वाब
मिट्टी में ही तिरोहित हो चुके थे पापा
ट्रेन फिर भी भाग रही थी
अपने सहज वेग के साथ।
अब ऑटो से चल पड़ा
रेलवे स्टेशन से पापा के करीब तक
खटर-पटर करता रिक्शा
उछल कूद कर रही थी 
सुषुप्त संवेदनाएं,
सड़कों ने चिल्ला कर बताने कि
की कोशिश
स्मृति पटल पर चल पड़ी
पापा की 'मोपेड'
उनके कमर पर हाथ था मेरा।
मर चुके थे पापा
फिर भी उनकी ठंडी हथेली ने
भर दी थी गर्माहट
बेशक आंखे छलछलाई
पर रो नहीं सका एक भी पल
कंधे पे था स्नेहसिक्त हाथ
छोटे भाई का,
कहना चाहता था कुछ
लेकिन कुंद हो गयी आवाज
रुआंसा हो कह पाया
बस
गुड बाय 'पापा'

~मुकेश~

दैनिक जागरण, पटना में प्रकाशित