जिंदगी की राहें

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Monday, September 24, 2018

बेटे "यश" को चिट्ठी



आज 
पार कर लिया है तुमने 
उम्र का सत्रहवां घेरा भी
बेशक नहीं है कोई बड़ी घटना
न ही हमने उसको खास बनाने की..की कोशिश
पर जो पहली उम्मीद मुझमें जगी वो ये कि
अब हर बार यात्राओं में
सूटकेस लेकर चलोगे तुम आगे
हर बार याद दिलाओगे तुम कि
रुकिए पापा
मम्मी रह गयी है पीछे

हर थमते-रुकते-भागते स्टेशन पर
बिसलरी की बोतल लाने की जिम्मेवारी
होगी तुम्हारी
अब तो टीटी को ट्रेन टिकट भी चेक
तुम ही करवाना
आखिर ऐसे शुरुआती उम्मीदें ही तो
आगे समृद्ध होंगी

मम्मी से पूछना
एक किलो सात सौ साठ ग्राम के थे तुम
जब हॉस्पिटल के ऑपेरशन थियेटर के सामने
नर्स ने पकडाते हुए कहा था
लो पकड़ो इसको, बेटे के पापा
और स्तब्ध-आश्चर्यचकित सा मैं बहुत देर तक समझ नहीं पाया
कि पापा बन जाने के बाद होता क्या है परिवर्तन
मेरे कुछ समझने या अनुभव करने से पहले
तब तक तुम्हे इन्क्युवेटर में सुलाया जा चुका था
अंडर ग्रोथ चाइल्ड होने के वजह से

रहे थे तुम एडमिट तब भी,
जब तुम्हारी मम्मी आ चुकी थी घर
और हम संदेह के लम्बे गलियारे में खड़े बस ताकते रहते
कहीं बदल गए तुम तो
हर बच्चे पर नजर रखते चौकीदार बन गए थे उन दिनों?

हॉस्पिटल से घर लाते समय
एक बित्ते के थे तुम और
हम ढूंढ रहे थे वो खास निशान
जो बता पाए बेटा है हमारा

आज सत्रह वर्षों बाद
जब उस पहले दिन के सहेजे खास क्षणों की तुलना
करता हूँ आज वाले तुमसे
तत्क्षण फील कर पाता हूँ पितृत्व

दिख जाती है ढेरों वो रातें
जब ब्रोंकाइटिस से भींच जाती थी
तुम्हारी छाती
तुम्हारी तेज साँसे बढ़ाती थी हमारी धड़कन
और आज भरे हुए तुम्हारे कुल्हे
बता रहे तुम एक शानदार प्लेयर हो टीटी के

हर बाप की तरह हूँ आज
अनिश्चित भरे तुम्हारे भविष्य के लिए चिंतित
जन्मदिन पर बढ़ती मोमबत्तियों की कतारें
आगाह करती है
बेटा बड़ा होने ही वाला है
या यूँ कहें कि एक युवा बेटे का बाप हूँ

पर चाहता हूँ आज भी
रुक जाए समय
ताकि बस स्वयं
अनुभव करता रहूँ उम्मीदों का जवां होना
और तुम भी ताजिंदगी खिलखिलाते हुए कह सको
- नया स्पोर्ट्स शूज चाहिए पापा।

वो सभी तस्वीरें आज भी पसन्द हैं
मुझे व मम्मी को,
जिनमें तुम केंद्र हो
व तुम्हारी दोनो बाहें हैं त्रिज्यात्मक दूरी में
और हमदोनों परिधि में रहे ।
जिंदगी तुमसे है, जीवन रेखा ही रहना


- तुम्हारा पापा !

~मुकेश~


पटना बिट्स पर मेरी कविता सिमरिया पुल

पटना बीट्स पर मेरी कविता सिमरिया पुल

Thursday, November 19, 2015

दिवाली के दुसरे दिन

दिवाली के दुसरे दिन प्रदूषित आसमान

दिवाली  के दूसरे दिन की सुबह
अजीब सी निरुत्साहित करने वाली सुबह
चमकती रात के बाद बुझे-बुझे सूर्य के साथ
कुछ नहीं बुझी लड़ियों की दिखती ख़ामोशी
बुझ चुके दीपक,  और पिघली मोमबत्तियां
बिना चमक के हो चुकी होती है सुबह !!

चारो और फैले पटाखों के अवशिष्ट
रद्दी, चिन्दी चिन्दी हुए कागज़,
मिठाई के खाली  डब्बे
काले कार्बन से बनते बिगड़ते सांप
जो किसी बच्चे ने देर रात जला कर
फैलाया था प्रदूषण का भभका
लग रहा था डंसेगा, फैला रखा था फन !

ऊबता हुआ दिल, थका हुआ मन
मुंदी मुंदी आँखों से, जलते प्रदूषण के आसमान  में
ऊँघते चेहरे के साथ झांकता बालकनी से मैं
देखता दीवाली के दूसरे दिन अजीब सी सुबह !

कुछ छोटे छोटे बच्चे
ढूंढ रहे थे कूड़े में
तभी इस उदास सुबह  में दिखा मुझे
एक चंचल प्यारी सी मुस्कराहट
चहक कर चिल्लाया, अपने साथ वाले को उसने बुलाया
देख भाई - बम !
नहीं है इसमें पलीता, पर फूटने से बचा रह गया न !

सच में कुछ खुशियाँ बिना पलीते के पटाखे सी
मुस्कराहट भरती है
हाँ फिर जब वो बच्चा उसको फोड़ने की जुगत लगाएगा
तो वो हो जाएगी फुस्स !!

माँ लक्ष्मी को भी शायद नहीं लगता मनभावन
तभी तो ऐसे बच्चे के बीने-चुने हुए पटाखे भी
नहीं करते आवाज !!

काश बेशक दिवाली के दिन नहीं बिखरी खुशियाँ
हर जगह
पर काश !!
कुछ तो फैले ख़ुशी, हर नन्हे के मन में
अमीरी गरीबी से इतर !!

माँ !! या देवी सर्व भूतेषु !!
बस पटाखे की आवाज गौण कर, सिर्फ खुशियाँ की आवाजें भर दो
हर नन्हों के मन !!

इतनी सी उम्मीद !!

दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल 2015 के लिए चयनित मेरी कविता