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Wednesday, January 18, 2017

आइना झूठ नहीं बोलता



आईना
है वो चश्मदीद गवाह
कटघरे में खड़े अभियुक्त जैसे
अपने सामने दिख रहे चेहरे के लिए
जो बता पता है, या यूं कहें, बता सकता है 
अपराध से अभियुक्त का कोई वास्ता नहीं
आईना
बेशक हो 'एलीबी'
अपराध न करने की,
लेकिन कहते हैं न
झूठ के हज़ार मुंह
और एक चुप सच का
शख्सियत को
जानने समझने के लिये
उतरना पड़ता है
आँखों की गहरायी में
महसूसना पड़ता है
पनियल आँखों की तराई को
जिससे नज़रों का
परावर्तन/अपवर्तन
जोड़ पाये कुछ दरकते बंध
आईना !
मैंने खुरच दी है
तुम्हारे दूसरे तरफ की
सिल्वर सुरमई कलई
जिससे खुल न पाये कलई
तुम्हारी गवाही से
ताकि डाल सकूँ खुद की आँखों में आँखें
बेपरवाह बिंदास ..
आईना!
डरता हूँ तुमसे ...
तुम्हारी सच्चाई से
कह सकते हो कभी भी
हर व्यक्ति
होता है गुनाहगार
अरे रुको !!!
कमियों के भण्डार तुम भी कम नहीं
जानते हो ने
कितनी कमज़ोर है तुम्हारी याददाश्त
और उल्टा ही दिखाते हो
मेरा सीधा हो जाता है तुम्हारा उल्टा
आखिर सजा देना/पाना
इतना आसान भी तो नहीं

3 comments:

daisy jaiswal said...

आखिर सजा देना पाना उतना आसान भी तो नहीं बहुत सुंदर रचना

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’दलबदल ज़िन्दाबाद - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Onkar said...

बहुत खूब