जिंदगी की राहें

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Thursday, September 3, 2015

प्रेम समर्पण



रस्सी.. कूदते समय
ऊपर से उछल कर
पैरों के नीचे से
निकलती जाती है
जगाती है 
अजब सनसनाती सिहरन
एक उत्कंठा कि वो घेरा
तना रहे लगातार
एक दो तीन ... सौ, एक सौ एक
इतनी देर लगातार !!


जैसे एक कसा हुआ घेरा
गुदाज बाहों का समर्पण
आँखे मूंदें खोये
हम और तुम !!
उफ़, वो सी-सॉ का झूला
ऐसे ही झूलते रहा मैं
तुम भी शायद !
चलो !
फिर से गिनती गिनो, बेशक ...
बस पूरा मत करना !!



5 comments:

Unknown said...

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कविता रावत said...

सुन्दर प्रस्तुति
जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनायें!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (05-09-2015) को "राधाकृष्णन-कृष्ण का, है अद्भुत संयोग" (चर्चा अंक-2089) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तथा शिक्षक-दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Himkar Shyam said...

बहुत ख़ूब

Unknown said...

khubsurat prastuti...