Followers

Saturday, September 15, 2012

कोलेज डे'स

आज सुना इंजीनियर्स डे है...
हम इंजिनियर तो नहीं , पर इस से मिलता जुलता गणित हमारा विषय था
तो कोलेज दिन को याद कर लिया...


कालेज के दिन
हम स्नातक विज्ञान के छात्र
वो भी गणित में प्रतिष्ठा 
ये कैलकुलस 
स्टेटिक्स डायनामिक्स
अलजेब्रा, अस्ट्रोनोमी या मेट्रिक्स 
2 -डी, 3-डी फिगर 
कब तक कॉपी में भरती 
त्रिकोणमिति की रेखाएं 
हमसे आँख मिला कर कहती 
बच्चे कर इंतज़ार 
कभी तो आएगी प्रीत या प्रीति
हर क्लास में होता 
तकरार का विषय
हम हैं कितने दब्बू
नहीं है यहाँ कोई चार्म
कितना बोरिंग है गणित
क्यूँ करें मेहनत
कोई तो नहीं
जो दे सके प्रेरणा
नहीं थी एक भी अबला
जो होती हमारे लिए सबला
नहीं थी कोई "नारी"
जो बोरिंग लेक्चर में दिख जाती तो
रहता इंतज़ार, रहती बेकरारी...
.
बस हम गणित के छात्र
करते इंतज़ार
राष्ट्रभाषा हिंदी के क्लास का 
वो हर तीन दिन बाद आता
कालेज के सबसे बड़े हाल में
मिल जाते सारे विज्ञानं के  छात्र
और बहुत सी खुबसूरत
तरुणी छात्राएं दिख जाते 
तभी तो हम सर की गूंजती आवाज में
लैला मजनू को तौलते 
आखिर हम छात्रो का जीवन 
हो रखा था नीरस
गलती से कभी मिलती
खूबसूरती और काव्य में प्रेम रस
तभी तो खुद में मजनू दिखता
लैला के फ्रेम में हर बार
नयी नयी बालाओं का चेहरा मचलता
पचास मिनट में दिल रम जाता
रहती हमारी चेहरे पर मुस्कान
क्योंकि जो भी गलती से मुस्काती
हमें उसमे लैला होने का हो जाता गुमान
हम छात्रों में होता तकरार
क्यूं न हो आखिर
हर हसीनो के लिए सारे रहते जो बेक़रार
.
ऐसे ही लड़ते झगड़ते 
आहें भरते
कब बीते दिन, बीते रैना
वो तीसरे दिन का इंतज़ार
खो गया सब कब और कहाँ
इस खोने पाने में हमने 
ढूंढा नया जहाँ 
क्यूंकि ज्ञान के मंच से
कर्म के  क्षेत्र का सफ़र
है जुदा, सबसे जुदा....



43 comments:

Dimple Kapoor said...

bhut sajeev chitran college days ka ...:))

Pallavi saxena said...

बढ़िया पोस्ट कॉलेज के दिनों का सही नक्शा खींचा है आपने ...:)

रश्मि प्रभा... said...

बस यादें यादें यादें...यादें रह जाती हैं

s.tiwari said...

un beete dino ki yaado ko itne sahaj shabdo me piro kar vyakt kar diya.....bahut sundar..

वन्दना said...

बडी प्यारी यादें साझा की हैं …………सुन्दर रचना

सदा said...

खूबसूरत शब्‍दों का संगम यादों के आईने में ...

Anju (Anu) Chaudhary said...

मुकेश आज की कविता सच में लाजवाब है
मज़ा आ गया पढ़ कर ...:)))

ऋता शेखर मधु said...

:):)
बहुत बढ़िया...कॉलेज के दिनों की याद दिला गई|

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत मजेदार ..अपने कालेज के दिन याद आ गए ...बहुत ही मिलते जुलते दिन होते हैं न सबके यह ..:)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

हिन्दी पखवाड़े की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
--
बहुत सुन्दर प्रविष्टी!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (16-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Anupama Tripathi said...

bahut sundar collage ....rango ka aur bhavo ka aur yado ka ...:))

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) said...

कॉलेज के दिन तो ऐसे ही होते है मगर उनको जताने का अंदाज बड़ा अनोखा है..... बहुत ही बढ़िया..... मन एकदम खुश हो गया..... ;-)

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब, यादें ताजा कर दीं..

ashish said...

हा हा बढ़िया है , तुमने तो पूरी तस्वीर खीच दी.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हिन्दी कशा का कुछ तो फायदा था .... सुंदर रचना

Minakshi Pant said...

यादों में सजा गुलदस्ता कितना खूबसूरत होता है कि बीते दिनों को बहुत आसानी से सजीव कर देता है इस कविता के माध्यम से आपने इसका खूबसूरत उदाहरण दिया बहुत अच्छी रचना |

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

क्यूंकि ज्ञान के मंच से
कर्म के क्षेत्र का सफ़र
है जुदा, सबसे जुदा....
जी हाँ ..... हर क्षेत्र में ऐसा ही है....बढ़िया लगी कविता

abhi said...

:) :) majedaar!!

Archana said...

उफ़्फ़!! कहाँ गए वो दिन...:-(

रश्मि प्रभा... said...

http://vyakhyaa.blogspot.in/2012/09/blog-post_16.html

दिगम्बर नासवा said...

कोलेज के दिनों की यादें हमेशा ताज़ा रहती हैं ...
आसद पास ही रहती हैं ... लाजवाब पोस्ट ...

Reena Maurya said...

कॉलेज के दिनों की तो बात
ही अलग है..
मौज मस्ती.... मजेदार...
:-)

expression said...

यादें कम अफ़सोस ज्यादा है :-)

अनु

मन्टू कुमार said...

बहुत ही रोचक और यादों से भरी पड़ी रचना |

सादर |

rajat said...

yaad ke benishaa jazeeron se.... teri awaz aa rahi hai abhi.... kya kahne kumar saab!!!!

Rajesh Kumari said...

कालेज की मटरगस्ती को कितनी शालीनता के साथ लिख डाला वाह बहुत रोचक संस्मरण पुरानी यादें बस याद बन कर रह जाती हैं और दिल कहता है कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

संजय भास्कर said...

आपकी हर रचना की तरह यह रचना भी बेमिसाल है !
एक और सुन्दर कविता आपकी कलम से !

Bhavna....The Feelings of Ur Heart said...

yadein yaad aati hain ....batein bhul jati hain :)

रेखा श्रीवास्तव said...

यादों को खोजना शुरू करें तो एक प्यारा सा अहसास मिलता है और उस अहसास को पूरी तरह से जिया है तुमने.

Tulika Sharma said...

कॉलेज के दिन याद करा दिए आपने

shikha varshney said...

:):)..किसने कहा था गणित लेने को ..ली होती राजभाषा.
मजेदार...

सुज्ञ said...

अतिसुन्दर संस्मरणात्मक!1

डॉ. जेन्नी शबनम said...

कॉलेज डेज़ की यादें जीवन की सबसे सुहानी यादें होती हैं, और ऐसे में तब और भी जब गणित विषय हो :-)क्योंकि जोड़ घटाव गुना भाग तो बचपन की बातें हैं जो जीवन में साथ चलती है लेकिन अल्फ़ा बीटा गामा त्रिज्या कैलकुलस स्टेटिक्स डायनामिक्स अलजेब्रा अस्ट्रोनोमी मेट्रिक्स ये सब किस काम की? ''2-डी 3-डी फिगर'' :-) बस यही साथ रह जाती हैं जो मजनुओं को लैला की याद दिलाती है. बहुत मजेदार है यादें और रचना. बधाई मुकेश.

anilanjana said...

jeevan ke behtareen pal ...jo kabhi bhi kahin bhi..ek muskaan dene aur urja badhane mein shayak...
zindgi ke behtreen palo ko samete...pyari sehaj si rachna..badhayi

Vibha Rani Shrivastava said...

खो गया सब कब और कहाँ
इस खोने पाने में हमने
ढूंढा नया जहाँ
क्यूंकि ज्ञान के मंच से
कर्म के क्षेत्र का सफ़र
है जुदा, सबसे जुदा....
हकीकत तो यही है ...
जो छुट गया वो ,
सुनहला ख़्वाब था !!

KAHI UNKAHI said...

college ke dino ka aaina hai yah kavita...badhiya...

KAHI UNKAHI said...

college ke dino ka aaina hai yah kavita...badhiya...

Mukesh Kumar Sinha said...

Shalini Gupta: bhaiya..kya baat hai..poori kavita mein laila hi dhoond rahe ho..hahaha ..thodi padhai bhi kar lete
16 September at 18:43 · Like

Mukesh Kumar Sinha said...

Shalini Gupta: sare chatron ko apne jaisa kyon samajhte ho..waise jo hum padhte hain..zindagi mein lago bhi karte hain..par bahut kuch aisa hota hai jo kisi school ya colledge mein nahi padhaya jata..woh hum zindagi se sikhte hain..jaisa ki apne aakhri panktiyon mein kaha hai
22 minutes ago · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Ranjan Sahai : Bahut khub Mukesh bhai.....
वो भी गणित में प्रतिष्ठा
ये कैलकुलस
स्टेटिक्स डायनामिक्स
अलजेब्रा, अस्ट्रोनोमी या मेट्रिक्स b
2 -डी, 3-डी फिगर
कब तक कॉपी में भरती
त्रिकोणमिति की रेखाएं
.
apna bhi yahi haal tha :)
16 hours ago · Unlike · 1

Mukesh Kumar Sinha said...

Shweta Agarwal: Sach mein safar hai judaa...sabse judaa....wo athkheliyon ke din the....mauz masti k din the...."College Days".....ab seekh rahe hain zindagi ka arthsaar.....
11 hours ago via mobile · Like

नीलिमा शर्मा said...

poorani yaade taja ho gyi umda post

Aparna Sah said...

yadon ka sajiv chitran...har shabd atit me khinche le jata hai...wah