जिंदगी की राहें

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Thursday, January 6, 2011

नारी या पुरुष??


चल रही थी बहस
नारी या पुरुष??
एक सुदर्शना नारी
जो थी बड़ी प्यारी
लरजते हुए बोली
सज्जनों!
माटी की बनी मैं
पर माटी  में ही सिमट कर रह गयी मैं

कभी बेटी का फर्ज निभाया
कभी बहन के रूप में घर को चहकाया
कभी अर्धांगिनी बन कर निभाया
या माँ की ममता का नेह बरसाया
कर दिया अपने को अर्पित
जीवन समर्पित
पर न बन पाई पहचान
क्यूंकि इन पुरुषो के आगे
बिखर गये हमारे अरमान!!!

तभी पीछे की पंक्ति से
आई एक कड़कती आवाज
हमारी भी सुनो
बेशक हम कहलाते हों जंवाज
हमने शिद्दत से छिपा रखा है दर्द
वो अब हो गयी है सर्द
ये दुनिया है बेदर्द
बहुत हो गयी पौरुष की बात
अब नही हो पाता दर्द आत्मसात

हे नारी!!  जब तुम थी बेटी!
पापा ने तुम्हें जिंदगी के पथ पर चलना सिखाया
जब तुम थी बहन
हर पल राखी के बंधन
की रक्षा, तेरे भाई के मन में रहा
जैसे ही तू बन के आयी अर्धांगिनी
ता-जिंदगी तुझे खुश रखने का
सातो वचन तेरे पति ने निभाया
फिर माँ की अनमोल ममता
और दूध के कर्ज में
जीवन-पर्यंत बेटे ने बिना कुछ कहे
अपना जीवन लुटाया!!!

सच तो ये है
जिंदगी है एक तराजू
जिसमे एक के साथ करो न्याय
तो दुसरे के साथ दिखता है अन्याय
और इस तराजू के दोनों पलडो
से कर सकते हो तुलना
नारी और पुरुष की.................!

अब बोलो
नारी या पुरुष?
नारी या पुरुष?
नारी या पुरुष ???????



वैसे तो बस कुछ शब्द बुने हैं मैंने, क्यूंकि मैंने बराबर पढा की हर नारी का पूरी जिंदगी शोषण हुआ है.....उसके  हर रूप के साथ! बेशक हम भारत वासी उससे देवी के रूप में पूजते हैं, लेकिन आज की जिंदगी में हम पुरुषों का भी तो शोषण होता है..हम किसे कहेँ.....हमारी पीड़ा को कौन समझेगा....................

पढ़े और बताएं....अगर त्रुटी बताएँगे तो जायदा ख़ुशी होगी...............:)



वैसे एक बात और आज मेरे छोटे सुपुत्र "ऋषभ कीर्ति सिन्हा (रिशु)" का जन्मदिन भी है.
आपकी शुभकानाएं मुझे ख़ुशी देगी और उसे जिंदगी में सफलता  ...:)