जिंदगी की राहें

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Wednesday, October 7, 2015

अंतिम सांसें.

पिछले दिनों जिस  तरह  से एक व्यक्ति की हत्या बेवजह हो गयी .........हाँ बेवजह ही तो कहूँगा इस वजह को

सिर्फ ये शंका की उसने क्या खाया है !! एक सभ्य समाज में हत्या का उद्देश्य ये नहीं हो सकता !
बस इसी पर मेरी ये कविता !!




अख़लाक़
बूढ़े तो हो ही चुके थे तुम,  मर ही जाते ऐसे भी
कुछ वर्षों बाद !!

ऐसे सोचो न, बुरा नहीं लगेगा.....
क्योंकि हर दिन तो मरते हैं लोग
बेवजह की हत्याएं........एक तुम भी सही !!

सरकार ने दे दिया न दस लाख,
अख़लाक़ !

पर, बस, अख़लाक़
मैं सोच रहा, तुमने मरने से पहले
कितनी सही होगी, झूठ की लाठियां
हर अंग प्रत्यंग ने झेला होगा !!

कैसे ली होंगी तुमने अंतिम सांसें...
अपनी पत्नी के सामने,कराहते हुए...
तिस पर, अपने सामने कैसे देखा होगा
तुमने बेटे को पिटता
उफ़ !!

उफ़ !
मांस के नाम पर
मांस के सौदागरों ने
काट दिया मांस को .....!!
तड़पते, जिस्म को ठंडा होने के हद तक !!

विदा अख़लाक़ !!
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वहशी दरिंदों ने मार डाला एक इंसान को !!
भीड़ किसी की नहीं होती
संवेदनाएं लाठियों में नही होती
उसमे तो बस होता है
बल और क्रूरता !